दोनो सेनाओं के प्रमुख वीरों का नाम गिनाने के बाद दुर्योधन गुरु द्रोण से कहता है कि भीष्म द्वारा रक्षित कौरव सेना भीम द्वारा रक्षित पांडव सेना को जीतने में सक्षम है, सो आप सभी लोग अपनी निर्धारित जगह पर रहकर भीष्म की ही रक्षा करें।
भीष्म भ्रम के और भीम भाव यानी श्रद्धा के प्रतीक हैं।कौरव दुर्गुणों के प्रतीक हैं। विभिन्न आसुरी समदाओं यानी दुर्गुणों की रक्षा कौन करता है? इन दुर्गुणों यानी माया, मोह, कामना, क्रोध , अहंकार, हिंसा, असत्य जैसे दुर्गुणों को इंसान का भ्रम ही बचाता है। सो सारे दुर्गुण मिलकर भ्रम की रक्षा करते हैं और भ्रम इन दुर्गुणों को जीवित रखने में सहायक होता है। भ्रम से ईक्षा का जन्म होता है। एक ईक्षा पूरी नहीं हुई कि दूसरी आ धमकती है। इंसान लागातार ईक्षा पर ईक्षा की पूर्ति में लगा रहता है। दरअसल इक्षाएँ यानी कामनाएँ अनंत होती हैं। इसी कारण भीष्म को इक्षामृत्यु का वरदान है। इन ईक्षों से मोह होता है। जब इंसान को मोह होता है, इक्षाएँ होती हैं तो उनकी पूर्ति की कोशिश भी करता है। पूर्ति होने की स्थिति में नई ईक्षा जन्म लेती हैं। नहीं पूरी होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से झूठ और हिंसा की भावना जन्म लेती है। दुर्योधन इसी का प्रतीक है। इसीलिए सारी बुराइयाँ मिलकर भ्रम को बचाना चाहती हैं।
दूसरी ओर जिनमें श्रद्धा होती है वो सदगुणों की रक्षा करते हैं। वो सत्य, अहिंसा, प्रेम, सद्भाव की बात करते हैं। लेकिन भ्रम में लिप्त दुर्गुण इस अहंकार में होते हैं कि वे सदगुणों को हरा देंगे। हम देखते हैं कि जो दुर्गुणी आपराधिक किस्म के आदमी होते हैं वे हमेशा इसी प्रयास में लगे रहते है कि कैसे किसी को क्षति पहुँचाकर अपना उल्लू सीधा किया जाए। जरूरी नहीं कि ऐसे हर आपराधिक काम कानून की नजर में अपराध ही। हों लेकिन हर बार ये अपराध इंसान की नैतिकता के खिलाफ जरूर होते हैं। ऐसे लोग घर परिवार समाज राजनीति व्यवसाय सब जगह होते हैं। जरा ध्यान से देखिएगा तो पाइयेगा कि हम सभी के अंदर ये प्रवृत्ति होती है। लेकिन जिनमें सदगुणों पर श्रद्धा होती है यानी जो भीम हैं और जिनमें सदगुणों के प्रति अनुराग होता है यानी जो अर्जुन होते हैं वे तो हमेशा सत्य, अहिंसा, प्रेम, के आयुयायी होते हैं। अवगुण ताकत के बल पर इनको हराना चाहते हैं लेकिन अंततः हरा नही पाते क्योंकि एक इंसान की अच्छाई हमेशा उसकी बुराई से मजबूत साबित होती है। जो सच्चाई को अपना नही।पाते वे अंततः समाप्त हो जाते हैं। ध्यान से देखिएगा तो पाइयेगा की हर काल देश के हर उस इंसान का चरित्र जो दुर्गुणों को बढ़ाता है एक सा ही होता है भले वो किसी भी प्रचलित धार्मिक मान्यता वाला हो। उसी तरह हर सद्गुणी इंसान भी एक ही तरह के गुण रखते हैं। सद्गुण और दुर्गुणों। का कोई पंथ नही होता।