गीता अध्याय 1 श्लोक 27 के उत्तरार्ध से 29
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान्॥
कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्।
उन उपस्थित सम्पूर्ण बंधुओं को देखकर वे कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले।
॥27वें का उत्तरार्ध और 28वें का पूर्वार्ध॥
मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन )
अर्जुन उवाच
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते॥
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है
॥28वें का उत्तरार्ध और 29॥
आप कोई कार्य प्रारम्भ करने वाले हों , उसी समय उस उस कार्य के प्रति आपको भ्रम हो जाये, तो आपकी मानसिक स्थिति कैसी हो सकती है? यदि आप उत्साह से भरकर अपराधी को दण्डित करने वाले हों उसी समय आपको ज्ञात हो/आभास हो कि ये अपराधी तो आपके ही परिवार के सदस्य हैं तो आपकी मानसिक स्थिति क्या होगी?
युद्धक्षेत्र के बीच खड़ा अर्जुन इसी तरह की स्थिति में फँस गया पाता है अपने आपको। विपक्ष उसे शत्रु के रूप में नहीं दिख रहा है। कँहा तो वो युद्ध में शत्रुओं को हराकर अपना राज्य वापस पाने चला था गांडीव थामे और कँहा उसे विरोधी के रूप में स्वजन और मित्रगण ही दिख रहे हैं। जब अपराधी में स्वजन और मित्र दिखने लगे, जब गलत और दुर्गुणी व्यक्ति के दुर्गुण नहीं दिखे, उनका अधर्म और अपराध नहीं दिखे बल्कि इसके बदले सम्बन्ध दिखने लगे तो क्या हम में से कोई वस्तुनिष्ठ हो सकता है, क्या हमसे आपसे न्याय की उम्मीद की जा सकती है? चेहरा देख कर, अपना पराया के आधार पर , मित्रता शत्रुता के अनुसार धर्म, सद्गुण,न्याय का पक्ष नहीं लिया जा सकता है। किसी का अवगुण, किसी का अपराध, किसी का अधर्म, किसी का अन्याय सिर्फ इसलिए क्षम्य कैसे हो जा सकता है कि वो व्यक्ति हमारा मित्र या परिवार का है? तब तो न कुछ धर्म होगा न अधर्म।
लेकिन अर्जुन इसी का शिकार हो जाता है युद्ध के मैदान में।उसे अधर्मी ,अन्यायी, अपराधी में अपने स्वजन और मित्र दिखते हैं। जब हमें सत्य की समझ पूरी तरह से नहीं हो, जब हमारा ज्ञान अधूरा हो, जब विवेक का जोर नहीं चल रहा हो तब ऐसा वयक्ति भ्रम में पड़ता ही है।
सत्य धारण करने का दम्भ भरते भरते जब हम अधर्म के मार्ग पर बढ़ जाते हैं तो हमारा बल, हमारी शक्ति क्षीण होने लगती है, पहले मन मस्तिष्क साथ छोड़ता है, फिर शरीर भी शिथिल होने लगता है। अभी तो अर्जुन कौरवों से युद्ध करने के लिए उत्साहित हो कर सैन्य निरीक्षण पर निकला था कि उसके अंदर अपना पराया का भ्रम आ गया। इस भ्रम बे उसकी बुद्धि को भ्रष्ट किया। हर जगह यही होता है। जैसे ही सत्य के प्रति भ्रम होता है, सबसे पहले बुद्धि और विवेक का पतन होता है। इससे मन के अंदर डर जन्म लेता है। ये डर खुद के अंदर होता है न कि बाहर। अर्जुन अपने युग का महानतम योद्धाओं में शामिल था लेकिन सत्य के प्रति जैसे ही उसे भ्रम होता है उसकी शक्ति क्षण भर में क्षीण हो जाती है। शक्ति सत्य में होता है, शरीर में नहीं। निडरता तभी तक साथ देती है जब तक हम सत्य के साथ खड़े होते हैं। दैनिक जीवन के किसी भी उदाहरण को उठा कर देख लीजिए, जब कभी आप झूठ का सहारा लेते हैं, जब कभी आप अन्याय का साथ देते हैं , जब कभी आप गलत काम का समर्थन करते हैं आप खुद को अपने ही अंदर कमजोर पाते हैं, मन ही मन डरे हुए होते हैं, आपका आत्मविश्वास डिगा रहता है।
सच जानने वाला यदि सच से मुँह मोड़ता है तो उसका पतन उस आदमी से भी अधिक होता है जो शुरू से ही असत्य के साथ है। जो शुरू से असत्य, अन्याय, अधर्म, और अवगुण यानी आसुरी शक्तियों के साथ है उसका भला क्या पतन होगा, गिरा हुआ कँहा गिरेगा, सो दुर्योधन को भला क्या अज्ञान का डर होता। लेकिन जिसने हमेशा असत्य, अन्याय, अधर्म, अवगुण का विरोध किया हो वो अगर भ्रमवश सत्य से विचलित होता है तो वो तो गिरेगा हीं, निश्चित गिरेगा, उसके भी हाथ पैर काँपने लगेंगे, मुँह सूखने लगेगा, दिमाग सुन्न पड़ने लगेगा। यही तो अर्जुन को हो रहा है। उसकी माया, उसके मोह उसकी शक्ति को खाय जा रहें हैं। इसी स्थिति में इंसान मनोरोगी की तरह व्यवहार करने लगता है। और अज्ञान को ही ज्ञान बताकर विरोधाभाषी तर्क करना प्रारम्भ कर देता है यानी कुतर्क पर उतर आता है। वह भोग और सन्यास को एकसाथ भोगना चाहता है। इस स्थिति में गिरा आदमी चाहता है कि उसे कोई कार्य होने का जिम्मेदार भी न माने और उसे उस कार्य का फल भी भोगने को मिल जाये। उसका अपना कोई अधर्म, अन्याय करे तो उसे वो दंडित न करे लेकिन उसे ही धर्म और सत्य का मीठा फल भी मिल जाये। वाह! ऐसा सोचने वाला पतनशील नही तो क्या कहलायेगा भला!
अर्जुन की हालत मनोरोगी की हो रही है। जब भी धर्म, न्याय, देवी गुणों, (सद्गुण) और सत्य के रास्ते चलने वाला किसी परिस्थिति विशेष में ज्ञान के अभाव में सत्य , धर्म , न्याय के प्रति भ्रम में पड़ता है किसी कारण वश तो विवेक और बुद्धि और उन्ही से नियंत्रित शरीर भी भय से व्याकुल हो उठते हैं।