श्रीमद्भागवद गीता द्वितीय अध्याय प्रवेशिका
श्रीमद्भागवद गीता का द्वितीय अध्याय दूसरा सबसे बड़ा अध्याय है जिसमें 72 श्लोक हैं। अठारहवें अध्याय में कुल 78 श्लोक हैं और यह अध्याय सबसे बड़ा है। दूसरे अध्याय में गीता के सम्पूर्ण दर्शन से परिचय होता है। ध्यान रहे गीता किसी धर्म विशेष, सम्प्रदाय विशेष का ग्रंथ नहीं है अपितु यह उपनिषदों का सार है। गीता में एकीश्वरवाद की प्रधानता है जिसका कोई स्वरूप विशेष नहीं है । ये ग्रंथ व्यक्ति को परम् कल्याण का मार्ग बतलाती है।
प्रथम अध्याय में हम देखते हैं कि जब मन व्यथित और भ्रमित होता है तो हम विवेक खो देते हैं। नतीजा होता है कि अनिर्णय की स्थिति अथवा गलत निर्णय की स्थिति में फँस जाते हैं। यँहा प्रसंग युद्ध का है लेकिन विचलन की ये स्थिति जीवन के किसी भी प्रसंग में हो सकती है और उनसे पार पाने का रास्ता गीता बतलाती है। यूँ तो गीता की ढेरों बेहतरीन व्याख्याएँ मौजूद हैं सो किसी नई व्याख्या की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन गीता मात्र मोक्ष प्रदान करने का साधन भर नहीं है। हम किसी भी स्थिति से तभी पार पा सकते हैं जब यह समझ पाएँ की परिस्थिति विशेष में हमारी भूमिका क्या है। यदि हम अपने स्व यानी सेल्फ को नहीं जान पाते तो हमें सर्वाधिक भ्रम तो खुद के बारे में ही होता है कि हम तो निरीह हैं, साधन विहीन हैं अथवा हम ही सर्वज्ञ हैं। लेकिन जब हम अपनी स्थिति को जानते हैं , अपने सेल्फ को पहचानते हैं तो पता चलता है कि जीवन में हम जो भी हैं वो तो एक खास तरह के ज्ञानबोध के कारण हैं। इस सेल्फ को हम कर्म कर के ही जानते हैं । इसका मार्ग गीता बतलाती है। जब हम ये समझते हैं कि कर्म के माध्यम से हमें स्व यानी अपने सेल्फ की जानकारी हो सकती है , हम अपनी स्थिति को समझ सकते हैं तो फिर हम उस कर्म के मार्ग में चलने लगते हैं बिना किसी बाहरी दबाव के। ये रास्ता हमें परम् ज्ञान यानी परिणाम, उस परिणाम की तरफ लेकर जाता है जँहा हम अपने इस सेल्फ का विस्तार सम्पूर्ण विश्व में देखने लगते हैं। हम बड़े या छोटे ओहदे पर हो सकते हैं , अमीर या गरीब हो सकते हैं लेकिन खुद के सेल्फ का विस्तार पूरे जगत में देखने से हमारा विवेक जागृत होता है। तब हम उस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं जिसे पाना हमारे प्रत्येक कर्म का अंतिम लक्ष्य होता है। गीता के महान टीकाकारों ने इसे साँख्ययोग, ज्ञानयोग कर्मयोग, भक्तियोग सन्यास योग जैसे नामों से पुकारा है। हम आप यदि इतना नहीं भी समझ पाते तो भी गीता को आत्मसात कर सकते हैं। इसीलिए गीता सबके लिए है।
गीता से हमारा परिचय भ्रम की अवस्था में ही होता है। अपने उहापोह को काट कर हम जीवन को जब सार्थक बनाने चलते हैं तो गीता ही हमारा पथप्रदर्शक है। इसका कोई भी सम्बध किसी सम्प्रदाय विशेष से नहीं है। प्रत्येक इंसान का लक्ष्य अपनी आत्मिक उन्नति है भले इसे व्यक्त करने की भाषा और माध्यम अलग अलग हो। ऐसा कौन होगा जो अत्याचार, अनाचार, अविवेक, असत्य, हिंसा में अपनी उन्नति देखना चाहेगा? जो ऐसा चाहता भी है तो उसका नाश वैसे ही होता है जैसे दुर्योधन का होता है। आप परिवार में हों, छात्र जीवन में हों, व्यवसाय में हों , राजनीति या नौकरी में हों या फिर सक्रिय जीवन से अवकाश लेकर रह रहे हों हर जगह आप पाते हैं कि झूठ फरेब की नींव पर खड़ी जिंदगी दरक जाती है, इंसान बर्बाद हो जाता है। आप प्रत्येक धड़ी ऐसे अगिनत उदाहरण देख सकते हैं। पर आप ये सब देखने समझने की क्षमता भी गीता से ही प्राप्त करते हैं। सो गीता सभी सम्प्रदायों से ऊपर का ज्ञान है जो मनुष्य मात्र के लिए है।
अब हम यथा सम्भव गीता के दूसरे अध्याय का अध्ययन श्लोक वार प्रारम्भ करेंगे और बिना हड़बड़ी के प्रत्येक श्लोक/श्लोक समूह को आत्मसात करने और आज के जीवम में इसका व्यवहारिक प्रशिक्षण भी लेंगे भले समय जो लगे। तभी हम वास्तव में इंसान बन पाएंगे।