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SHRIMADBHAGWAD GEETA SECOND CHAPTER SHLOKA 3

गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 3

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
 क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥

इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा
 ॥3॥

       श्रीकृष्ण अपनी बात आगे बढाते हुए अर्जुन को  चार बातें कहते कहते हैं
     ---नपुंसकता को मत प्राप्त हो
     ----नपुंसकता तुम्हारे लिए उचित नहीं है
     ----- हृदय की दुर्बलता को छोड़ो
     -------युद्ध के लिए उठ खड़े हो जाओ
         अर्जुन युद्ध नहीं करने के तमाम तर्क प्रस्तुत कर चुका है।  बन्धु बाँधवों से युद्ध करना, भले ही वो आतताई ही क्यों न हों, उचित नहीं , क्योंकि इससे कुलधर्म यानी सनातन धर्म नष्ट होगा, स्त्रियाँ दूषित होंगी, वर्णसंकर जनमेंगे जिससे पितर नाराज होंगे, जो सम्पत्ति और राज मिलेगा उसे साथ  भोगने वाले बन्धु और मित्र नहीं होंगे आदि आदि उसके तर्क रहें हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस प्रकार की सोच नपुंसकता दर्शाती है जो अर्जुन जैसे व्यक्ति के लिए उचित नहीं। ये हृदय की कमजोरी की निशानी हैं सो अर्जुन का आह्वान करते हैं कि इसे छोड़कर वह युद्ध के लिए प्रस्तुत हो जाये।
        विषयगत प्रसंग युद्ध का है सो चर्चा युद्ध की है। जैसा हम देख चुके हैं कि हर परिस्थिति में जब भ्रम और मोह हावी होते हैं तो विवेक नष्ट होता है जिससे निर्णय लेने की हमारी क्षमता प्रभावित हो जाती है। कार्य करने की तमाम तकनीकी योग्यता और ज्ञान रहने के बावजूद हम कार्य करने से भागते हैं क्योंकि हम मानसिक तौर पर उस कार्य को करने के योग्य नही रह जाते, भ्रम और मोह जनित मनोविकारों के। तब हम बहाने बनाने लगते हैं। परिवार, व्यवसाय, छात्र जीवन, समाज हर जगह लोग इस बीमारी के शिकार बराबर होते रहते हैं। ऐसे ही लोगों को श्रीकृष्ण सम्बोधित कर रहें हैं। अर्जुन तो शारीरिक रूप से नपुंसक नहीं है तब श्री कृष्ण उससे नपुंसक बनने की बात भला क्यों कहते हैं। नपुंसकता तो यही है कि जिस कार्य को करने के लिए आपको स्वाभाविक रूप से सक्षम होना होता है उसी में आप अक्षमता का प्रदर्शन कर रहें हैं। जैसे सैनिक लड़ने से डरे, छात्र पढ़ने से भागे, व्यवसायी का मन व्यवसाय में न लगे तो ये सभी उनके स्वाभाविक गुण से भिन्न ही तो है।।निर्धारित भूमिका को निभाने की अक्षमता ही नपुंसकता है क्योंकि इस अक्षमता से आगे बढ़ पाने का रास्ता बन्द हो जाता है।  ये आता कँहा से है? जब हम अपने सेल्फ यानी स्व को नहीं पहचानते यानी अपनी ही आत्मा को जानने से इनकार कर देते हैं तो नपुंसकता का जन्म होता है। अर्जुन युद्ध भूमि में अन्याय अधर्म का प्रतिकार करने आया है और लगता है आतताइयों की रक्षा का उपाय करने। तो स्वाभाविक है कि यह तो नपुंसकता ही है। सो श्रीकृष्ण की शिक्षा है कि हमें कभी भी अपने निर्धारित कर्तव्य से नहीं मुँह मोड़ कर भागना चाहिए चाहे जीवन का कोई भी प्रसंग हो। यह बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब हमें उस कार्य को करने की पूर्ण तकनीकी योग्यता और सामर्थ्य भी हो। इसीलिए ये आचरण हमारे अनुकूल नहीं होता। अर्जुन तो युद्ध विद्या के साथ साथ शास्त्रों का भी ज्ञाता है, पूर्व में कई बार अपनी योग्यता का परिचय दे चुका है , उसे पता है कि उसकी क्षमताएँ क्या हैं तो फिर नपुंसकता का आचरण उसके लिए कैसे अपेक्षित हो सकता है। इस प्रकार श्री कृष्ण अर्जुन को उसके सेल्फ की याद दिलाने की कोशिश करते हैं।  
     फिर हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके तर्कों और उसके मनोभावों को क्षुद्र यानी नीच श्रेणी का मानते हैं  और इसे उसकी हृदय की दुर्बलता कहते हैं। विवेक और भावना दो महत्वपूर्ण कारक होते हैं जो हमारे कार्य करने की प्रवृत्ति को निर्धारित करते हैं। जब विवेक से लिये गए निर्णय में भावना को भी स्थान मिलता है और  भावना भी विवेक से संचालित होती है तो  फिर हम संयमित निर्णय पर पहुंचते हैं। लेकिन यदि ये दोनों अपनी मात्रा में असन्तुलित हो जाते हैं तो फिर हमारा निर्णय, कार्यप्रणाली भी असंयमित हो जाती है। यही हमारे हृदय की दुर्बलता है, यही हमारी नीचता है। उदाहरण स्वरूप  जीवन में अधर्म, अन्याय के पक्ष में खड़े व्यक्ति के प्रति करुणा और अनुराग अहिंसा नहीं नीचता है , ज्यादा अंको के लिए छात्र का चोरी करते पकड़ कर उसे अपना सम्बन्धी जानकर छोड़ देना नीचता है, एक अपराधी को अपने लाभ के लोभ में बख्शना नीचता है। यही नीचता हमारी दुर्बलता का परिचायक है। श्री कृष्ण इस नीचता से उबरने की सलाह देते हैं।
    और तब कहते हैं कि नपनुसकता और हृदय की नीचता को छोड़कर अर्जुन यानी हम सब खड़े हो जाएं, हताश न हों और युद्ध करें यानी अपने कर्तव्य निर्वाहन के लिए तैयार हो जाएं। 
         जीवन में जब कभी भी हमें लगे कि हमें अपने दायित्वों को निभाने में हिचक, निराशा, भय हो रहा है तब तब हमें स्मरण करनस चाहिए कि हम वास्तव में क्या हैं, हमारी क्षमताएँ क्या हैं और हमें श्री कृष्ण की इस शिक्षा को याद कर आगे बढ़ना चाहिए।

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