गीता अध्याय 2 श्लोक 16
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नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥
असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है
॥16॥
परिवर्तन के नियम को समझाने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि दो तरह की वस्तुएँ होती हैं-सत और असत यानी REAL और NOT REAL या UNREAL । श्रीकृष्ण के अनुसार ये तथ्य नया नहीं है बल्कि बहुत पहले से उन लोगों के द्वारा कहे गये हैं जिनको सत्य का ज्ञान रहा। जिनको सत्य का ज्ञान होता है उनको तत्वदर्शी कहते हैं।
सत, असत और तत्वदर्शी शब्दों के अर्थ आपस में जुड़े हुए हैं। इस निरन्तर परिवर्तनशील संसार में हर वो चीज जो निरन्तर परिवर्तनशील होती है वही असत है। परिवर्तनशील वस्तुओं की खाशियत है कि वे सिर्फ वर्तमान में होते हैं, अतीत में और भविष्य में उनका कोई वजूद नहीं होता है। अर्थात अस्थाई ही असत है। लेकिन इस असत का अनुभव तो होता ही है न। आखिर इस तथ्य का कैसे उद्घाटन हो पाता है । परिवर्तनशीलता को समझने के लिए जिसकी आवश्यकता है वही सत है, अर्थात सत हो है जिसका किसी काल में नाश नही होता, जो परिवर्तन के नियम से परे होता है। इसी सत की अनुभूति से असत का ज्ञान हो पाता है। जीवन बाल्यकाल, युवा अवस्था और वृद्धावस्था के अनुभवों का संकलन होता है जो निरन्तर बदलते रहते हैं। इस अनुभव को दो तरह से जीने की विधि होती है। एक है इस परिवर्तन को बिना समझे परिवर्तन को वास्तविकता मान कर जीते जाना जिसमें हम असत को ही जीते जाते हैं। हर परिवर्तन से , उसके अच्छे बुरे प्रभावों से प्रभावित होते कभी सुखी, कभी दुखी होते रहते हैं। इस अवस्था में सत का ज्ञान नहीं होता। दूसरा तरीका है जीवन में घट रहे परिवर्तन को देखते समझते , इन परिवर्तनों के प्रभाव से अलग रहते जीना। इस अवस्था में हमको पता होता है कि जो घट रहा है वह तो मात्र परिवर्तन है। उससे भला क्यों प्रभावित होंना। ये परिवर्तित स्वरूप आज कुछ और है, कल परिवर्तन के कारण कुछ और हो जाएगा और पहले भी कुछ और ही था। इस क्षमता को ही सत कहते हैं। यही हमारा आपका सबका सत है जो हमें परिवर्तनों से परिचित कराता है। ये सत ही आत्मबोध यानी हमारा SELF है। अपने SELF यानी अपने आत्मबोध से परिचित इंसान जीवन को, परिवर्तनों को उनसे विलग रहकर जीता है, उनके साथ रहकर भी उनसे लिप्त नहीं होता है। परिवर्तन यानी असत आते हैं जाते हैं वो हर स्थिति में अपने आत्मबोध से इनको देखता तो है लेकिन अपने आत्मबोध के कारण इनसे अप्रभावित ही रहता है। यानी ऐसा इंसान परिवर्तनों के साथ जीता तो है लेकिन परिवर्तन से विलग अपने स्व यानी अपने आत्मबोध यानी अपने सेल्फ में रहते हुए इन परिवर्तनों के प्रभाव से मुक्त होता है। जो सत और असत के इस भेद को जानता समझता है वही तत्वदर्शी होता है, क्योकि वह मूल तत्व को समझता है।
सत और असत के इस द्वैत यानी DUALITY की समझ ही हमें अपने सत की खोज में बढ़ने के लिए प्रेरित भी करता है।
इस DUALITY यानी द्वैत की समझ से जीवन के कठिन प्रश्नों का समाधान निकल आता है। जब हम समझने लगते हैं कि परिवर्तन अस्थाई है ,इसके प्रभाव भी अस्थाई ही हैं तो फिर इनके परिवर्तन से सूखी या दुखी नहीं होते। समभाव में स्थित रहकर ही अपना आचरण निर्धारित करते हैं।
इस सत-असत की समझ से उत्पन्न समभाव के कारण इंसान अपने वास्तविक रूप में आता है जिसके कारण उसे ज्ञात होता है कि उसमें असीम सम्भावनाएँ हैं जिनके कारण वह उन्नति के अंतिम शिखर , अर्थात जिसके बाद कोई शिखर नहीं होता वँहा तक जा सकता है।
परिवर्तन से अप्रभावित होने का अर्थ आप निष्क्रियता मत निकालें । इस शिक्षा को नहीं समझ पाने का ये खतरा तो है कि हम समझने लगे कि संसार तो निरन्तर परिवर्तनशील है तो फिर इस संसार में घटित घटनाक्रम से हमें क्या लेना देना, हम तो इनसे अप्रभावित रहकर बुद्ध हो गए हैं। इसी भ्रम को मिटाने के लिए श्रीकृष्ण आगे चलकर कर्मयोग का सिद्धांत समझाते हैं। बिना कर्म में प्रवृत्त हुए सत असत के सिद्धांत को आत्मसात करना असम्भव है और विनाशकारी भी।
अब आगे देखेंगे कि सत क्या है और सत को प्राप्त करने का कर्मयोग का सिद्धांत क्या है। ये शिक्षा क्रमिक है, , एक एक कर हम सीखते है, बढ़ते हैं। परिवर्तन के नियम को जानने समझने के बाद हम सत यानी आत्मा के ज्ञान की तरफ बढ़ते हैं और फिर तब कर्मयोग की तरफ।