गीता अध्याय 1 श्लोक 38, 39, 40
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कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥
यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?
॥38-39॥
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥
कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है
॥40॥
अर्जुन कृष्ण के मौन से परेशान सा हुआ लगता है। जब हम तर्क देते हैं तो चाहते हैं कि सामने वाला हमारे तर्क को समर्थन दे, बोलकर नहीं तो अपने हाव भाव से ही सही। लेकिन जब सामने वाला एकदम से कोई प्रतिक्रिया ही न दे तो हम क्या करते हैं? यदि हम थोड़े पढ़े लिखे हैं , थोड़ा बहुत अनुभव भी है तो खुद को बड़ा ज्ञानी साबित करने में लग जाते हैं और लगते हैं तर्क पर तर्क करने भले ही हमारा तर्क कुतर्क ही क्यों न हो।कम ज्ञान की भरपाई हम अधिक बोलकर, कुछ ऊँची आवाज में बोलकर, कुछ आलंकारिक भाषा में बोलकर पूरा करने की कोशिश करते हैं। कुरुक्षेत्र में हू ब बहू यही हो रहा है। अर्जुन लागातार तर्क पर तर्क दिए जा रहा है। अब वो क्या तर्क कर सकता है, इसे भी समझें। मन में भ्रम है, अत्याचारी, अधर्मी, अनाचारी, अन्यायी सम्बन्धियों के लिए मोह है, उनके प्राणों का मोह है, खुद अपने मन में सम्बन्धियों सहित राज पाट भोगने की लालसा है तब सोचिये कि अर्जुन क्या तर्क कर रहा होगा।
वह वही कह रहा है जो इस अवस्था में पड़ा इंसान करेगा। वो अपने तर्कों की शृंखला को आगे बढ़ाते हुए कहता है कि सम्बन्धियों की मृत्यु से उसके कुल का विनाश हो जाएगा, और कुल नाश का पाप उसे लगेगा। मित्रों से युद्ध मित्रों से घात करना होगा। कुल का नाश होने से कुलधर्म खत्म हो जाएगा और सम्पूर्ण कुल में पाप का प्रभुत्व हो जाएगा। अर्जुन का मानना है कि सम्बन्धी चाहे आतताई ही क्यों न हों उनकी रक्षा होनी ही चाहिए ताकि कुल/परिवार चलता रहे। अर्जुन का धर्म सिखाता है कि अधर्म करने वाला अगर सम्बन्धी है तो उसी अधर्मी के बल पर कुल धर्म की रक्षा की जा सकती है। आप देख रहें हैं कि मोहग्रस्त अर्जुन जिसके पास अपने पक्ष में कोई तर्क नही है किस प्रकार निर्भीक हो कर कुतर्क कर रहा है। अर्जुन के अनुसार कुलधर्म ही सनातन धर्म होता है। सनातन धर्म की उसकी समझ उसे बताता है कि हमारा कुलधर्म ही सनातन है अर्थात ऐसा धर्म जिसका न कोई प्रारम्भ है न ही अंत। उसके अनुसार पारिवारिक परम्पराएँ ही धर्म कहलाती हैं, सनातन धर्म। अर्थात सनातन धर्म वही कुछ है जो हमारा परिवार हमें सिखाता है।
अर्जुन ये मानता है कि कुलधर्म के नाश और परिणामस्वरुप सनातन धर्म के नाश से पाप का प्रसार होता है। वह अधर्मी, अनाचारी , अत्याचारी, आतताई को दंडित करने को अधर्म मानता है और उनके नाश से सनातन धर्म के नाश का डर है उसे। उसे डर है कि आतताई के दाण्डित होने से पाप का प्रसार होगा!
आखिर अर्जुन जैसा शिक्षित, दीक्षित, सदाचारी, वीर इस तरह का कुतर्क क्यों करने पर उतारू हो चला है। दरअसल युद्ध तो हम सबके अंदर है,अर्जुन के भी अंदर है। वह स्वाभावतः वीर है सो शत्रु दल की सम्मलित शक्ति भी उसके वीरोचित शौर्य को नहीं हिला सकी थी। हम देखते हैं कि अर्जुन विरोधियों के बल से तनिक भी नहीं डरा है। लेकिन मन के अंदर चलने वाले अच्छे बुरे के संघर्ष में वह हारता हुआ दिखता है। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। वह कमजोर पड़ रहा है तो मन के कारण। उसके अंदर की बुराई उसकी अच्छाई पर भारी पड़ रही है। हम सभी के अंदर दैवी गुण(सद्गुण) और आसुरी गुण ( अवगुण) होते हैं। इन गुणों की विस्तृत व्याख्या श्रीकृष्ण सोलहवें अध्याय में करते हैं लेकिन इनकी चर्चा दूसरे अध्याय से ही शुरू कर देते हैं। भ्रम, माया, मोह, क्रोध, असत्य, लोभ, वासना, हिंसा, कामना, भोग , भय इत्यादि आसुरी गुण हैं जबकि सत्य, अहिंसा, प्रेम, सद्भाव, अभयता, दया, क्षमा, कामना का त्याग आदि दैवी गुण हैं। जब दुर्गुण सद्गुण पर भारी पड़ते हैं तो सही निर्णय ले पाने की , सत्य को देख समझ पाने की हमारी क्षमता खत्म हो जाती है और हम भयभीत होकर आत्म रक्षा के लिए अनाचार, अत्याचार , का रास्ता पकड़ लेते हैं और इसी अवगुण से उपजे तर्क को ज्ञान समझने की भूल कर बैठते हैं। ठीक यही अर्जुन के साथ हो रहा है। तभी तो वह धर्म को पारिवारिक परम्परा भर समझता है और इसी पारिवारिक परम्परा को अनंत काल से चलने वाला सनातन धर्म समझकर इसकी रक्षा में पल्याणवादी हो जाता है। जिस वीर अर्जुन को समस्त कौरव सेना मिलकर नहीं डरा सकी उसी वीर अर्जुन की वीरता उसीके भ्रम, मोह, अज्ञान से धाराशायी होकर तार तार जाती है। इतनी कि उसका मुख्य शस्त्र तक उससे नहीं उठ पा रहा है, जिससे उसने समस्त भारत भूमि के वीरों को धूल चटाया था। अर्जुन भ्रम में पड़कर इस तरह लाचार हो चला है। यही हाल हर उस व्यक्ति का होता है जिसे हो सकता है कि ज्ञान बहुत हो लेकिन उसे मुठ्ठी भर भ्रम और मोह मिल जाये तो सारा ज्ञान मटियामेट होकर रह जाता है। मन के युद्ध में आसुरी शक्तियों के विजय में ही जीवन की हार बसती है।
ध्यान देने की बात है कि अर्जुन का चरित्र दुर्योधन से भिन्न है। दुर्योधन को ज्ञान है ही नहीं , उसे अहंकार ही है। उसे सही गलत का भान तक नहीं सो वह तर्क नहीं कर पाता सीधे युद्ध पर उतरता है। दूसरी तरफ अर्जुन को ये तो ज्ञात है ही कि उसे क्या करना चाहिए क्या नहीं सो जब उसपर भ्रम हावी होता है तो वह युद्ध नही करने के नतीजे पर पहुँचने के लिए तर्क का सहारा लेता है। हाँ, उसके तर्क बेतुके और खतरनाक हैं क्योंकि ये तर्क कि वअधर्म , अनाचार, अत्याचार, अन्याय, असत्य को खत्म करने के स्थान पर उनकी रक्षा की दलील दिया जाय अत्यंत ही खतरनाक और समाज विरोधी है क्योंकि परिणाम में तो अधर्म और अन्याय ही जीतेगा न।
अभी अर्जुन थका नहीं है। आगे के श्लोकों में अभी वो और तर्क देगा।