गीता अध्याय 1 श्लोक 45
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अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥
हा! शोक! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हो गए हैं
॥45॥
अर्जुन गत श्लोकों में अपना सब तर्क देकर दुख के साथ अपना विचार प्रकट करता है कि--
एक कि वो बुद्धिमान है, दूसरे कि बुद्धिमान होकर भी राज पाट के लोभ और सुख के लोभ में वे लोग अपने ही कुटुम्बियों और मित्रों को मारने पर उतारू हो गए हैं, और अंत में तीसरा और अंतिम की बुद्धिमान होकर भी इन लोभों के कारण बहुत भारी पाप करने जा रहें हैं।
निश्चित रूप से बुद्धिमान को इस प्रकार के लोभ नहीं ही करने चाहिए और यदि इसप्रकार के लोभ के फेरे में कोई पड़ता है तो वह पाप ही करता है जो उसे नहीं करना चाहिए। अब सवाल उठता है कि अर्जुन किस तरह से तय कर लेता है कि वो बुद्धिमान है ही। अब तक तो श्रीकृष्ण जिनको वो अपना ज्ञान दे रहा है एकदम चुप हैं, सिर्फ उसकी सुन रहें हैं। तो क्या यदि हमारे तर्क को कोई सुन भर ले तो हम बुद्धिमान हो जाएंगे? तय है कि नहीं। फिर भी अर्जुन को अपनी बुद्धि के बारे में ये गलतफहमी हो गई है। जब हम कुछ जानते ही नहीं तो बड़ा ज्ञानी होने का दम्भ भरने से बाज नहीं आते। जब तर्क खत्म हो जाता है तो सिर्फ गाल बजाना ही बाकी रह जाता है कि हम तो बुद्ध हो गए हैं, हमसे कोई क्या बात करेगा हम तो ज्ञान के भंडार है।
अब देखते हैं कि अर्जुन को क्या गलत लगता है। उसे लगता है कि युद्ध में कौरव और पांडव दोनों पक्ष सिर्फ राज पाट हथियाने के लिए लड़ने कटने आ गए हैं। उसे युद्ध का लक्ष्य सम्पत्ति और सुख प्राप्ति ही लगता है, उसे कौरव पक्ष और पांडव पक्ष के उद्देश्य एक से लगते हैं। निश्चित रूप से ये एक भ्रम की स्थिति है। जब हम खुद के अंदर की अच्छाई और बुराई में फर्क नहीं कर पाएं तो तय है कि हम दिग्भ्रमित हो गए हैं और भ्रम के असर से सही और गलत, न्याय और अन्याय के फर्क को समझना भूल जाते हैं। इस अवस्था में कोई भी आदमी जब होता है, चाहे वो अर्जुन ही क्यों न हो उसे यही नहीं पता चलता कि उसका दायित्व क्या है, उसकी अपनी भूमिका क्या है, उसे क्या करना और क्या नहीं करना है। तब ऐसा इंसान मूर्खता पर उतर आता है। लेकिन कोई भला अपने को मूर्ख क्यों मान ले, सो खुद को बुद्धिमान ही कहता फिरता है। आये दिन हम अपने समाज में देखते हैं कि लोग ऐसी बेवकूफियाँ करते ही हैं। जब हम आप खुद के अंदर के गुण अवगुण को नहीं समझ पाएंगे तो निश्चित है कि इसी तरह से व्यवहार करेंगे।
पाप और पुण्य को समझने के पूर्व कर्म के पीछे की मंशा को ध्यान में रखा जाना जरूरी है। एक स्त्री हरण रावण ने किया, एक स्त्रिहरण खुद अर्जुन ने भी किया, और एक स्त्रिहरण श्रीकृष्ण ने भी किया। अब यदि मात्र स्त्री हरण की बात की जाए तो तीनों का दोष एक समान लगेगा। लेकिन तीनों के इन क्रियाओं के पीछे की परिस्थिति पर विचार करेंगे तो भिन्न भिन्न स्थिति पाएंगे। इस बात को समझने के लिए अच्छे बुरे की समझ की आवश्यकता होती है। युद्ध या कोई भी अन्य कार्य जरूरी भी हो सकता है और गैर जरूरी भी। लेकिन देखने समझने की बात है कि वास्तव में हम किस गुण या अवगुण से प्रेरित होकर उस क्रिया विशेष को करते हैं। अर्जुन ने अपने युद्ध को जिन कारणों से गलत और पापयुक्त कहा है, उन कारणों को स्वीकारने में किसी को भी दिक्कत है। जैसे अर्जुन के मुख्य तर्क हैं
1.कुल की रक्षा अनिवार्य है।
2.कुल की रक्षा के लिए कुल के आतताई सदस्यों को भी हानि नहीं पहुंचाना चाहिए।
3. कुल के नाश से स्त्री शारीरिक रूप से दूषित होती है जिससे वर्णसंकर पैदा होते हैं।
4. वर्णसंकर कुल के नाश के कारण होते हैं
5. इससे जाति व्यवस्था टूटती है।
6. कुल के नाश से कुलधर्म का नाश हो जाता है।
7.कुलधर्म ही सनातन धर्म है, और इस कारण युद्ध से सनातन धर्म नष्ट हो जाएगा।
अब युद्ध के विरुद्ध इतने बेसिर पैर के तर्क को देकर अर्जुन खुद को बुद्धिमान भी घोषित कर देता है।
हर जगह, लोग मूर्खता को ज्ञान और अनाचार को धर्म का नाम देकर ही ढकने की कोशिश करते हैं और एक अति अज्ञानी और दम्भी इंसान का आचरण का उदाहरण है अर्जुन का व्यवहार।