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SHRI MADBHAGWAT GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 15.

गीता अध्याय 2 श्लोक 15
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यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
 समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥

क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है
 ॥15॥
    अभी तक की व्याख्या में श्रीकृष्ण  ने शोक,विषाद एवं हर्ष के कारणों को स्पष्ट कर दिया है। अब  वे दो तथ्य और बताते हैं, पहला की किस प्रकार के व्यक्ति को हर्ष या विषाद नहीं हो पाता और  दूसरा की इस प्रकार के व्यक्ति की क्या उपलब्धि होती है जीवन में।
      हमने देखा कि जब इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति और भौतिक चीजों को महसूस करने और उस अनुभव को हमारे मस्तिष्क की अनुभूतियों द्वारा व्यख्या की जाती है तब  हमें सुख या दुख का अनुभव होता है। इन्द्रियों को हम प्रकृति से जितना विलग करेंगे इस सुख दुख की अनुभूति से हम उतना ही दूर होंगे क्योंकि इन्द्रियाँ यानी सेंसेस ही सुख और दुख जैसी भावनाओं की उत्पादक और वाहक हैं। लेकिन ये अचानक नहीं हो सकता। इसके लिए सतत अभ्यास की जरूरत होती है। इन्द्रियों को उनके विषयों से समेटने का अभ्यास तब तक करना होता है जब तक इन्द्रियाँ बाह्य प्रकृति से स्वतंत्र न हो जाएं। जब तक ये अभ्यास पूरा नहीं होता तब तक पूरी सावधानी जरूरी है। साथ ही परिवर्तन के अपरिवर्तनिय सिद्धांत को याद रखना अनिवार्य है। याद रखना होता है कि हर वो  चीज जो प्रकृति से निकलती है, हर वो चीज जो भौतिक है वो सतत परिवर्तनीय है । वो बिना परिवर्तित हुए नहीं रह सकता। और ये परिवर्तन अंततः स्वरूप परिवर्तन का कारण बनता है। ये सब इतना स्वाभाविक होता है कि इसपर हर्ष या विषाद करने का कोई कारण नहीं । जिसे बदलना है उसे बदलना ही है।
           अब देखें कि इस स्थिति को जो इंसान हासिल करता है क्या वो पत्थर की तरह होता है। जी नहीं। अगर वो इंसान पत्थर की तरह हो गया तो फिर उसे ये भी नहीं पता चल सकता कि उसकी वास्तविक प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। वस्तुतः ऐसा इंसान धैर्यवान होता है। दरअसल वो जानता है कि उसे करना क्या है। उसे पता होता है कि उसे परिवर्तन को स्वाभाविक रूप में लेना है और अपनी इन्द्रियों यानी अपने सेन्स को प्रकृति से किस तरह विलग रखना है। 
    जब हम अभ्यास कर इस परिवर्तन के अपरिवर्तनीय सिद्धान्त को आत्मसात कर लेते हैं तब हमारी इन्द्रियाँ वाह्य संसार से मुक्त हो जाती हैं, बाहरी प्रकृति से प्रभावित होकर न तो सुख दे सकती हैं न ही कोई दुख। यही वो अवस्था होती है जब इंसान प्रकृति से मुक्त हो जाता है। वो अपने जीवन काल में ही प्रकृति से मुक्त हो सकता है। प्रकृति से उसकी यही मुक्ति उसका मोक्ष कहलाता है। ऐसा इंसान वाह्य संसार से अपने को नहीं निर्धारित करता। इस स्थिति में उसका ईगो जो उसके शरीर, उसके इन्द्रियों/भावना और उसकी बौद्धिकता से बने होते हैं तिरोहित हो जाते हैं, उसका अहम और वहम दोनों समाप्त हो जाता और तब उसे मोक्ष यानी मुक्ति मिलती है।
     ध्यान दें कि ये शिक्षा श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के परिपेक्ष्य में दिया है। लेकिन जब आप नितांत अकेले होते हैं, समाज में होते हैं, व्यवसाय में होते हैं, या किसी भी अन्य अवस्था में होते हैं अपनी इन्द्रियों के प्रकृति के संयोग के कारण हमें बराबर सुख और दुख मिलते रहते हैं, जिस कारण से हम हम अतिरिक्त तनाव या अत्यधिक लापरवाह और दम्भ की अवस्था में रहते हैं। इससे हमारा जीवन निरुदेश्य हो जाता है। हमें पहुँचना होता है कँही और पहुँच जाते हैं कंहीं। रास्ते से भटकना सिर्फ इसिलए हो पाता है क्योंकि हम सब वाह्य प्रकृति को खोज कर उसी के साथ हम अपने ईगो को जोड़ लेते हैं।
इससे मुक्ति ही मोक्ष है।
      अर्जुन को श्रीकृष्ण ने पुरुष श्रेष्ठ कह कर सम्बोधित किया है। दरअसल हम खुद को वैसा ही देखते हैं जैसा लोग हमें देखते हैं। ये प्रवृत्ति हम सब में होती है जो हमारे सेन्स के दूसरों से सम्पर्क के कारण होता है। अतएव अगर हम किसी को प्रोत्साहित करना चाहते हैं तो जरूरी है कि हम उसे अहसास दिलाये कि उस इंसान में बहुत अच्छी क्षमताएँ हैं। अगर उस व्यक्ति को खुद पर भरोसा बढ़ता है तो वह निश्चित ही अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित होता है। 

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It's a hard fact that more than common masses it's the elite, which ditches idea of India as enshrined in the Indian National Movement and in  the  Indian  Constitution. Role of the judiciaal elite in this context has been more objectionable considering the weight of onus she has to carry to carry on the democracy.     It's the elite which sets the course of actions in most of the cases. And among all elites judicial elites are of paramount importance. In india it's judicial elite which has been responsible for killing of democratic credentials.     And when elite fails masses step in and then elite becomes useless. Farmers movement is it's example. Success of farmers mov is not less than a revolution.