गीता अध्याय 2 श्लोक 1
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( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥
संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा
॥1॥
किसी विषय का बड़ा से बड़ा जानकार, बहुत बड़ा विद्वान, व्यवसायिक दृष्टिकोण से बहुत सफल आदमी भी जीवन में लड़खड़ा जाता है। आप अपने पारिवारिक, छात्र या व्यवसायिक जीवन में अचानक पाते हैं कि आप किसी बड़ी परेशानी में आ गए। ऐसा होता क्यों है कि बहुत ही जानकार आदमी भी समझ नहीं पाता कि उसे करना क्या है? और दूसरे आपके टूटे हुए मनोभाव को समझ जाते हैं? युद्ध कला में अर्जुन की कोई सानी नहीं। बड़े बड़े योद्धाओं को उसने पूर्व में पराजित भी किया है। उसकी धनुर्विद्या का लोहा सब मानते हैं। जीवन में उसने कई बुरे अनुभव भी पाए हैं और अपनी विद्या के बल पर, अपने सामर्थ्य के बल पर नाम भी खूब कमाया है लेकिन चिर प्रतीक्षित युद्ध जिसमें उसे बहुत कुछ करना है में आते लड़खड़ा जाता है। और लड़खड़ाता भी ऐसा है कि संजय भी समझ जाता है कि अर्जुन बुरी तरह व्यथित, दुखी और अनिर्णय की स्थिति में है, यानी उसकी दयनीय हालत जगजाहिर है, ठीक वैसे ही जैसे हम मुँह लटका कर बैठे हों और हर कोई समझ लेता है कि हम तो हैरान परेशान हैं , समझ ही नहीं पा रहें हैं कि आखिर करना क्या है। अर्जुन की युद्ध में ये हालत विरोधियों और अपने पक्ष में लड़ने आये उन लोगों को देख कर होती है जिनको वो शत्रु या मित्र की तरह नहीं देखता, जिनको वो धर्म और अधर्म के रक्षकों की तरह नहीं देखता बल्कि उनको परिजनों, गुरुजनों और मित्रजनों की तरह देखता है। अर्जुन की कमी व्यवसायिक ज्ञान यानी उज़के मामले में युद्ध कौशल में कमी नहीं है, उस कार्य में वह पूर्ण दक्ष है लेकिन सही गलत , अच्छा बुरा, धर्म अधर्म, न्याय अन्याय की समझ समाप्त होना उसकी कमी है। उसकी कमी है उसकी अच्छाई पर उसकी बुराई यानी भ्रम, मोह, असत्य आदि का हावी होना। यही हाल हर उस इंसान का होता है जो अपनी बुराई को खुद पर हावी होने देता है। उस समय आपकी व्यवसायिक दक्षता धरी की धरी रह जाती है।
जब भी कोई कार्य करने के लिए प्रवृत्त होते हैं और सही और गलत, जैसे धर्म और अधर्म/सत्य और असत्य/न्याय और अन्याय/सदाचार और अनाचार के अंतर को भूलकर अन्य बाहरी स्थितियों के प्रभाव मैं आ जाते हैं हम विचलित, दुखी और असहाय हो कर दुखी स्थिति में पहुँच जाते हैं , निर्णय नहीं ले पाते। घर हो विद्यालय हो, समाज हो या हमारे नौकरी पेशा की जगह हो कँही भी हम यदि अपने से बाहरी माहौल से यदि प्रभावित होकर व्यवहार करने लगते हैं तो हमारा व्यवहार हमारी क्षमता के अनुसार नहीं होकर बाहरी कारणों से प्रभावित होने लगता है। ऐसी स्थिति में हम एक मनोरोगी की तरह व्यवहार करने लगते हैं। एक बहुत काबिल सर्जन आपके अपेंडिक्स का ऑपरेशन करने वाला है और चीरा लगाने के पश्चात उसके मन में अपेंडिक्स के प्रति मोह जागृत हो जाये कि ये अपेंडिक्स तो बेचारा शरीर में जन्म से ही है तो वो इसे क्यों हटाने की कोशिश करने में लगा है, तब उस सर्जन के मन में बीमार वयक्ति की वृहत्त अच्छाई के बदले पेट दर्द का कारण बने अपेंडिक्स के प्रति करुणा का उतपन्न होना उस बीमार का अहित कर देगा। करुणा दर्द से पीड़ित के प्रति न होकर दर्द के कारण के प्रति होना भ्रम है और इस भ्रम से नुकसान उस व्यक्ति का है जो बीमार है।
इस प्रकार से विचलित मन ही चाहे वो जिसका हो एक मनोरोगी का ही है। सब सामर्थ्य रहते हुए भी मन की पीड़ा के कारण कार्य नहीं हो पा रहा है। ऐसी अवस्था में गुरु कौन हो सकता है, मार्गदर्शक कौन बन सकता है? वह जो इस तरह के दुष्ट मनोभाव को नष्ट करता हो। श्रीकृष्ण ने मधु नाम के राक्षस का वध किया था सो मधुसूदन कहलाये। आपके अंदर के इस भ्रम रूपी राक्षस को मारने वाले में मधुसूदन की क्षमता होनी जरूरी है, यानी आपके गलत विचारों के नाश करने की ताकत और समझ होनी जरूरी है। हर कोई हमारी इस मनोदशा को खत्म भी नहीं कर सकता।
सो हम सभी को चाहे हम जिस आयु वर्ग में हों, चाहे हमारी कोई भी पृष्ठभूमि हो हम सब को चाहिए कि अपनी बाहरी परिस्थितियों का आकलन करते समय हम उन्हीं से प्रभावित होकर अपना सयम खो कर सही गलत समझने की अपनी क्षमता ही नहीं खो दें।