गीता अध्याय 2 श्लोक 17
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अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥
नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्- दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है
॥17॥
अनश्वरता और अवश्यम्भावी परिवर्तन के सिद्धान्त से जो मूल बात निकल कर सामने आती है वो है इस निरन्तर परिवर्तनशील संसार में कुछ ऐसा भी है जो निरन्तर अपरिवर्तनशील है, सनातन अनश्वर है। यँहा एक बा त बात बहुत मायने रखती है। हम ऊर्जा को देख नहीं सकते, लेकिन ऊर्जा व्याप्त है। ऊर्जा का मेनिफेस्टेशन हम देखते हैं, जैसे अग्नि, विधुत, गति, प्रकाश , स्थिरता आदि। इसे हम जानते भले न हो लेकिन मानते जरूर हैं। दुनिया के बहुतेरे बातों को जिनको हम समझ नहीं पाते मानते हैं, फिर जैसे जैसे हमारे वैज्ञानिक ज्ञान का स्तर बढ़ता है हम धीरे धीरे गलत से सही को जानने लगते हैं। विज्ञान वह विशेष ज्ञान है जिसके पीछे अकाट्य तर्क होता है, सार्वभौमिक प्रमाण होता है। यह ज्ञान स्वयम में निरन्तरता लिए हुए होता है। इसकी खोज का जो प्रमाणिक तरीका है उसके अनुसार सबसे पहले हम अपने अनुभव से, उस अनुभव से जिसमें निरन्तरता होती है उससे एक परिकल्पना यानी HYPOTHESIS गढ़ते हैं।।तत्पश्चात उस परिकल्पना के आधार पर प्रयोग करते हैं । यह प्रयोग हमेशा प्रयोगशालों के नियंत्रित वातावरण में ही हो जरूरी नहीं। कई बार हमारी प्रयोगशाला हमारा मस्तिष्क ही होता है। हम तरह तरह की गणनाएँ उपयोग में लाते हैं, फिर हिट ऐंड ट्रायल के तरीके से हम उन गणनाओं को व्यवस्थित कर एक अंतिम गणितीय सिद्धान्त गढ़ते हैं । तत्पश्चात अलग अलग समय काल और स्थान में उसका उपयोग कर ये देखते हैं कि क्या हमारी गणना का परिणाम हर समय काल और स्थान में एक ही है। यदि ऐसा है तो फिर हम एक सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं जो हर समय काल स्थान में एक समान होता है। यही प्रक्रिया प्रयोगशालाओं के नियंत्रित वातावरण में भी की जाती है, जिनमें हो सकता है कि गणना के अतिरिक्त या उसके बिना सिर्फ पदार्थ का उपयोग किया जाता हो। उसके सर्वव्यापी परिणाम को ही मान्यता दी जाती है। इन प्रक्रियाओं में कुछ तथ्य समान हैं
1.सर्वप्रथम एक परिकल्पना की आवश्यकता होती है जो संसार के निरन्तर पर्यवेक्षण से सम्भव होता है।
2.प्रयोग की विधि निर्धारित होती है।
3.परिणाम सर्वकालिक होता है अर्थात स्थाई होता है निरन्तर परिवर्तित नहीं होता।
ज्ञान प्राप्ति की इसी विधा को जिसमें परिकल्पना, प्रयोग, परिणाम और सर्वकालिकता हो उसे ही विज्ञान कहा जाता है। इसके परिणाम में स्थाई सत्य को प्राप्त किया जाता है जो निरन्तर परिवर्तनीय नही होता बल्कि हमेशा एक ही रहता है।
अब ठीक यही बात जीवन विज्ञान को समझने के लिए भी अपनाई जाती रही है। श्रीकृष्ण ने इसी वैज्ञानिकता का सहारा लिया है अर्जुन को समझाने के लिए। सर्वप्रथम उन्होंने अर्जुन को संसार का पर्यवेक्षण करने के लिए प्रेरित किया यानी उसे ये देखने के लिए प्रेरित किया कि वह स्वयम देखे कि संसार कैसे चलता है। हमने देखा कि पूरा संसार गीता की भाषा में सत और असत में बंटा है। असत यानी जो निरन्तर परिवर्तनीय है। इस असत को हम तब देखने में सक्षम होते हैं जब सत को समझते हैं यानी ये समझते हैं कि कुछ ऐसा है जो परिवर्तित नही होता, जो स्वरूप नहीं बदलता, जो अनश्वर होता है। इसे ऐसे समझे। कोई वस्तु गति में है ये तभी समझा जा सकता है जब हम गतिहीन यानी स्थिर होते हैं।
अब दूसरे स्तर पर हम ये समझते हैं कि इस सम्पूर्ण चलायमान संसार को चलायमान रखने के लिए कोई एक सत्ता तो होगी जो उनकी गति और परिवर्तन का कारण होगी। यही सत्ता सर्व्यापी और सर्वकालिक होती है। अभी आपको ये बात कल्पना लग सकती है, लेकिन लक्षित ज्ञान को जानने समझने के लिए इस कल्पना पर परिकल्पना की तरह आपको भरोसा करना होगा।भरोसा होगा तो आप अन्वेषण के लिए बढ़ेंगे और सत्य को पाएंगे। नही। भरोसा करेंगे तो इस परिकल्पना को कोरी कल्पना मानकर छोड़ देंगे और सत्य का अन्वेषण अधूरा छूट जाएगा, आप कँही नही। पहुंचेंगे। जीवन भर भटकते रह जायेगे। यदि आप इस परिकल्पना पर भरोसा करते हैं तो आप ये देखने में सक्षम होंगे कि इस सर्वकालिक सर्वव्यापी सत्ता ही है जिसके कारण आप खुद को और खुद के बाहर के परिवर्तन को देख समझ पाते हैं। आप इस सत्ता की समझ के कारण सर्वाधिक ऊर्जा संग्रहण के स्थिर अवस्था में आ जाते हैं, परिवर्तन के प्रभाव से एकदम मुक्त। यही तो परम् वैज्ञानिकता है और गीता की भाषा में परम् योग की अवस्था भी।
इस परम् सत्ता को जो पूर्णतः अनश्वर, अविनाशी, अव्यय(जिसका व्यय नहीं होता हो) होती है यही हमारे अंदर से हमारे परिवर्तनशील बुद्धि और भावना को निकालकर हमारे आत्मबोध यानी SELF को बाहर लाता है। यही वह सेल्फ है जो अपरिवर्तनीय अनश्वर अविनाशी है और जो सभी में समान रूप से मौजूद है। यह आत्मा उस परमसत्ता का ही स्वरूप है जिसे आप ब्रह्म, परमब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर, भगवान या फिर अपने धार्मिक-सम्प्रदाय के मतानुसार और भाषानुसार अलग अलग नामों से सम्बोधित करते है और यही सता सब में व्याप्त होकर सभी परिवर्तनों को नियंत्रित करता है।