श्रीमद्भागवद गीता द्वितीय अध्याय प्रवेशिका
श्लोक 1 से 10
श्रीमद्भागवद गीता का द्वितीय अध्याय दूसरा सबसे बड़ा अध्याय है जिसमें 72 श्लोक हैं। अठारहवें अध्याय में कुल 78 श्लोक हैं और यह अध्याय सबसे बड़ा है। दूसरे अध्याय में गीता के सम्पूर्ण दर्शन से परिचय होता है। ध्यान रहे गीता किसी धर्म विशेष, सम्प्रदाय विशेष का ग्रंथ नहीं है अपितु यह उपनिषदों का सार है। गीता में एकीश्वरवाद की प्रधानता है जिसका कोई स्वरूप विशेष नहीं है । ये ग्रंथ व्यक्ति को परम् कल्याण का मार्ग बतलाती है।
प्रथम अध्याय में हम देखते हैं कि जब मन व्यथित और भ्रमित होता है तो हम विवेक खो देते हैं। नतीजा होता है कि अनिर्णय की स्थिति अथवा गलत निर्णय की स्थिति में फँस जाते हैं। यँहा प्रसंग युद्ध का है लेकिन विचलन की ये स्थिति जीवन के किसी भी प्रसंग में हो सकती है और उनसे पार पाने का रास्ता गीता बतलाती है। यूँ तो गीता की ढेरों बेहतरीन व्याख्याएँ मौजूद हैं सो किसी नई व्याख्या की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन गीता मात्र मोक्ष प्रदान करने का साधन भर नहीं है। हम किसी भी स्थिति से तभी पार पा सकते हैं जब यह समझ पाएँ की परिस्थिति विशेष में हमारी भूमिका क्या है। यदि हम अपने स्व यानी सेल्फ को नहीं जान पाते तो हमें सर्वाधिक भ्रम तो खुद के बारे में ही होता है कि हम तो निरीह हैं, साधन विहीन हैं अथवा हम ही सर्वज्ञ हैं। लेकिन जब हम अपनी स्थिति को जानते हैं , अपने सेल्फ को पहचानते हैं तो पता चलता है कि जीवन में हम जो भी हैं वो तो एक खास तरह के ज्ञानबोध के कारण हैं। इस सेल्फ को हम कर्म कर के ही जानते हैं । इसका मार्ग गीता बतलाती है। जब हम ये समझते हैं कि कर्म के माध्यम से हमें स्व यानी अपने सेल्फ की जानकारी हो सकती है , हम अपनी स्थिति को समझ सकते हैं तो फिर हम उस कर्म के मार्ग में चलने लगते हैं बिना किसी बाहरी दबाव के। ये रास्ता हमें परम् ज्ञान यानी परिणाम, उस परिणाम की तरफ लेकर जाता है जँहा हम अपने इस सेल्फ का विस्तार सम्पूर्ण विश्व में देखने लगते हैं। हम बड़े या छोटे ओहदे पर हो सकते हैं , अमीर या गरीब हो सकते हैं लेकिन खुद के सेल्फ का विस्तार पूरे जगत में देखने से हमारा विवेक जागृत होता है। तब हम उस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं जिसे पाना हमारे प्रत्येक कर्म का अंतिम लक्ष्य होता है। गीता के महान टीकाकारों ने इसे साँख्ययोग, ज्ञानयोग कर्मयोग, भक्तियोग सन्यास योग जैसे नामों से पुकारा है। हम आप यदि इतना नहीं भी समझ पाते तो भी गीता को आत्मसात कर सकते हैं। इसीलिए गीता सबके लिए है।
गीता से हमारा परिचय भ्रम की अवस्था में ही होता है। अपने उहापोह को काट कर हम जीवन को जब सार्थक बनाने चलते हैं तो गीता ही हमारा पथप्रदर्शक है। इसका कोई भी सम्बध किसी सम्प्रदाय विशेष से नहीं है। प्रत्येक इंसान का लक्ष्य अपनी आत्मिक उन्नति है भले इसे व्यक्त करने की भाषा और माध्यम अलग अलग हो। ऐसा कौन होगा जो अत्याचार, अनाचार, अविवेक, असत्य, हिंसा में अपनी उन्नति देखना चाहेगा? जो ऐसा चाहता भी है तो उसका नाश वैसे ही होता है जैसे दुर्योधन का होता है। आप परिवार में हों, छात्र जीवन में हों, व्यवसाय में हों , राजनीति या नौकरी में हों या फिर सक्रिय जीवन से अवकाश लेकर रह रहे हों हर जगह आप पाते हैं कि झूठ फरेब की नींव पर खड़ी जिंदगी दरक जाती है, इंसान बर्बाद हो जाता है। आप प्रत्येक धड़ी ऐसे अगिनत उदाहरण देख सकते हैं। पर आप ये सब देखने समझने की क्षमता भी गीता से ही प्राप्त करते हैं। सो गीता सभी सम्प्रदायों से ऊपर का ज्ञान है जो मनुष्य मात्र के लिए है।
अब हम यथा सम्भव गीता के दूसरे अध्याय का अध्ययन श्लोक वार प्रारम्भ करेंगे और बिना हड़बड़ी के प्रत्येक श्लोक/श्लोक समूह को आत्मसात करने और आज के जीवम में इसका व्यवहारिक प्रशिक्षण भी लेंगे भले समय जो लगे। तभी हम वास्तव में इंसान बन पाएंगे।
गीता अध्याय 2 श्लोक 1
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( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥
संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा
॥1॥
किसी विषय का बड़ा से बड़ा जानकार, बहुत बड़ा विद्वान, व्यवसायिक दृष्टिकोण से बहुत सफल आदमी भी जीवन में लड़खड़ा जाता है। आप अपने पारिवारिक, छात्र या व्यवसायिक जीवन में अचानक पाते हैं कि आप किसी बड़ी परेशानी में आ गए। ऐसा होता क्यों है कि बहुत ही जानकार आदमी भी समझ नहीं पाता कि उसे करना क्या है? और दूसरे आपके टूटे हुए मनोभाव को समझ जाते हैं? युद्ध कला में अर्जुन की कोई सानी नहीं। बड़े बड़े योद्धाओं को उसने पूर्व में पराजित भी किया है। उसकी धनुर्विद्या का लोहा सब मानते हैं। जीवन में उसने कई बुरे अनुभव भी पाए हैं और अपनी विद्या के बल पर, अपने सामर्थ्य के बल पर नाम भी खूब कमाया है लेकिन चिर प्रतीक्षित युद्ध जिसमें उसे बहुत कुछ करना है में आते लड़खड़ा जाता है। और लड़खड़ाता भी ऐसा है कि संजय भी समझ जाता है कि अर्जुन बुरी तरह व्यथित, दुखी और अनिर्णय की स्थिति में है, यानी उसकी दयनीय हालत जगजाहिर है, ठीक वैसे ही जैसे हम मुँह लटका कर बैठे हों और हर कोई समझ लेता है कि हम तो हैरान परेशान हैं , समझ ही नहीं पा रहें हैं कि आखिर करना क्या है। अर्जुन की युद्ध में ये हालत विरोधियों और अपने पक्ष में लड़ने आये उन लोगों को देख कर होती है जिनको वो शत्रु या मित्र की तरह नहीं देखता, जिनको वो धर्म और अधर्म के रक्षकों की तरह नहीं देखता बल्कि उनको परिजनों, गुरुजनों और मित्रजनों की तरह देखता है। अर्जुन की कमी व्यवसायिक ज्ञान यानी उज़के मामले में युद्ध कौशल में कमी नहीं है, उस कार्य में वह पूर्ण दक्ष है लेकिन सही गलत , अच्छा बुरा, धर्म अधर्म, न्याय अन्याय की समझ समाप्त होना उसकी कमी है। उसकी कमी है उसकी अच्छाई पर उसकी बुराई यानी भ्रम, मोह, असत्य आदि का हावी होना। यही हाल हर उस इंसान का होता है जो अपनी बुराई को खुद पर हावी होने देता है। उस समय आपकी व्यवसायिक दक्षता धरी की धरी रह जाती है।
जब भी कोई कार्य करने के लिए प्रवृत्त होते हैं और सही और गलत, जैसे धर्म और अधर्म/सत्य और असत्य/न्याय और अन्याय/सदाचार और अनाचार के अंतर को भूलकर अन्य बाहरी स्थितियों के प्रभाव मैं आ जाते हैं हम विचलित, दुखी और असहाय हो कर दुखी स्थिति में पहुँच जाते हैं , निर्णय नहीं ले पाते। घर हो विद्यालय हो, समाज हो या हमारे नौकरी पेशा की जगह हो कँही भी हम यदि अपने से बाहरी माहौल से यदि प्रभावित होकर व्यवहार करने लगते हैं तो हमारा व्यवहार हमारी क्षमता के अनुसार नहीं होकर बाहरी कारणों से प्रभावित होने लगता है। ऐसी स्थिति में हम एक मनोरोगी की तरह व्यवहार करने लगते हैं। एक बहुत काबिल सर्जन आपके अपेंडिक्स का ऑपरेशन करने वाला है और चीरा लगाने के पश्चात उसके मन में अपेंडिक्स के प्रति मोह जागृत हो जाये कि ये अपेंडिक्स तो बेचारा शरीर में जन्म से ही है तो वो इसे क्यों हटाने की कोशिश करने में लगा है, तब उस सर्जन के मन में बीमार वयक्ति की वृहत्त अच्छाई के बदले पेट दर्द का कारण बने अपेंडिक्स के प्रति करुणा का उतपन्न होना उस बीमार का अहित कर देगा। करुणा दर्द से पीड़ित के प्रति न होकर दर्द के कारण के प्रति होना भ्रम है और इस भ्रम से नुकसान उस व्यक्ति का है जो बीमार है।
इस प्रकार से विचलित मन ही चाहे वो जिसका हो एक मनोरोगी का ही है। सब सामर्थ्य रहते हुए भी मन की पीड़ा के कारण कार्य नहीं हो पा रहा है। ऐसी अवस्था में गुरु कौन हो सकता है, मार्गदर्शक कौन बन सकता है? वह जो इस तरह के दुष्ट मनोभाव को नष्ट करता हो। श्रीकृष्ण ने मधु नाम के राक्षस का वध किया था सो मधुसूदन कहलाये। आपके अंदर के इस भ्रम रूपी राक्षस को मारने वाले में मधुसूदन की क्षमता होनी जरूरी है, यानी आपके गलत विचारों के नाश करने की ताकत और समझ होनी जरूरी है। हर कोई हमारी इस मनोदशा को खत्म भी नहीं कर सकता।
सो हम सभी को चाहे हम जिस आयु वर्ग में हों, चाहे हमारी कोई भी पृष्ठभूमि हो हम सब को चाहिए कि अपनी बाहरी परिस्थितियों का आकलन करते समय हम उन्हीं से प्रभावित होकर अपना सयम खो कर सही गलत समझने की अपनी क्षमता ही नहीं खो दें।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 2
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श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।
श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है
॥2ll
श्रीमद्भगवद्गीता में सर्प्रथम श्रीकृष्ण पूरे श्लोक में बोल रहे हैं। हमने देखा कि प्रथम अध्याय में अर्जुन तरह तरह से युद्ध के विरुद्ध अपने तर्क प्रस्तुत कर रहा था, और अपने ही तर्कों में बुरी तरह उलझा उसका मन व्यथित हो जाता है। परंतु श्री कृष्ण कुछ बोल नहीं रहें है, चुपचाप ध्यान से उसकी बात को सुन रहें हैं। अर्जुन श्रीकृष्ण की तरफ से अपने तर्कों को सांकेतिक समर्थन भी न पाकर और भी व्यथित, दुखी और विचलित हो रहा है।
याद करें श्रीकृष्ण प्रथम अध्याय में अर्जुन को उसी के निदेश पर दोनों सेनाओं के मध्य ले आ कर खड़ा कर मात्र इतना ही कहें हैं कि, "पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥" यानी कि "हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख"। उसके पश्चात अर्जुन जो भी कह रहा होता है वह उसकी मनोस्थोति है। वह जिस दृष्टिकोण से युद्ध को देख रहा होता है उसी के अनुसार उसकी मनःस्थिति हो रही है। उसका दृष्टिकोण तात्कालिक परिस्थितियों पर उसकी समझ की व्याख्या है। हम जो समझते हैं, परिस्थितितियों का आकलन करते हैं वह इसपर निर्भर करता है कि हम कितने विवेक से अपने दैवी गुणों अथवा अपने आसुरी गुणों के अनुसार उपयोग में लाते हैं। एक ही परिस्थिति को अलग अलग इंसान अपने अलग अलग दृष्टिकोण की वजह से अलग अलग तरह से देखते हैं। जब हम परिस्थिति का आकलन/मूल्यांकन अपने भ्रम, मोह, असत्य, अहंकार के अनुसार करते हैं तो वह परिस्थिति प्रतिकूल नजर आती है, जबकि यदि उसी को यदि हम विवेक, स्तय, न्याय आदि की दृष्टि से देखते हैं तो उस परिस्थिति को हम अपने अनुकूल पाते हैं।
जब हम भ्रम में मनोरोग की अवस्था तक चले जाते हैं तो मनोचिकित्सक शॉक ट्रीटमेंट देता है, ठीक वही शॉक ट्रीटमेंट श्रीकृष्ण अर्जुन को दे रहें हैं।
इंसान का भ्रम उसकी कमजोरी है। भ्रम से उतपन्न मोह अविवेक को बढ़ाता है। इस अवस्था में हम अपने ही ज्ञान को भूल जाते हैं। तब हम जो करते हैं वह हमारे भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों के लिए हानिकारक ही होता है। यह परिस्थिति जीवन के किसी भी प्रसंग में उतपन्न हो सकती है। जैसे ही हम भ्रम और भ्रम जनित मोह में फंसते हैं हम अपना ही भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों बिगाड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं।
एक ज्ञानी व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह खराब स्थिति को भी अपनी समझ से अनुकूल कर सकता है लेकिन अज्ञानी तो अनुकूल को भी प्रतिकूल कर सब का नाश कर देता है। यँहा देखते हैं कि श्री कृष्ण अर्जुन के सारे तर्कों यथा कुलधर्म ही सनातन धर्म है, कुलधर्म नष्ट होने से सनातन धर्म नष्ट होगा, समाज में वर्णसंकर पैदा होंगे जो पितरों को रुष्ट करेंगे आदि आदि को श्रीकृष्ण एक झटके से नकार देते हैं और अर्जुन की भर्त्सना करते कहते हैं कि ये सब तर्क अज्ञान हैं जो मोह से उतपन्न है। मोह से इंसान का अतीत, वर्तमान और भावी तीनों खराब होता है। हर इंसान तीन बातों से उत्प्रेरित होकर अपना कार्य करता है। वह चाहता है कि उसके कार्यों से उसके खानदान का नाम रौशन हो (अतीत) , उसका नाम रौशन हो(वर्तमान) और उसका और उसकी आने वाली पीढियीं को अच्छी व्यवस्था मिले(भविष्य)। लेकिन मोह और भ्रम वश जो कार्य किये जाते हैं उनसे ये तीनों लक्ष्य पूरे नहीं होते हैं। अन्याय एवम अनाचार को सहना अज्ञान ही है । जीवन की किसी भी परिस्थिति में जब हमारा कार्य मोह और भ्रम से उतपन्न मनोभाव पर आधारित होता है तो फिर वह निर्णय उचित नही होता है। परिवार के मामले हों , व्यवसाय के मामले हों, सामाजिक मामले हों , छात्र जीवन के मामले हों या फिर कुछ और, जब हम अपना कर्तव्य व्यक्ति/वस्तु/विचार विशेष के प्रति मोह से निर्धारित करते हैं तो फिर हमारा वो कर्तव्य हमें रास्ते से भटकाने वाला होता है, जिसके परिणाम में हम लक्ष्य से भटक जाते हैं। आसुरी गुण यानी भ्रम और मोह से किसी भी व्यक्ति का चरित्र यानी उसकी अपनी शख्सियत यानी उसका अपना स्व(सेल्फ) समाप्त हो जाता है और वह उटपटांग और आत्मघाती निर्णय लेता है।
ध्यान दें कि श्रीकृष्ण के कथन को गीताकार ने भगवान उवाच का नाम दिया है, न कि श्रीकृष्ण उवाच। अर्थात गीताकार का मानना है कि श्रीकृष्ण उसी स्तर के साधक हैं जिस स्तर पर ईश्वर स्वम् हैं। श्रीकृष्ण उस समस्त ज्ञान, विभूति और ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं जिसे प्राप्त कर इंसान हर चीज को साध लेता है।
श्रीकृष्ण के कथन से स्पष्ट है कि , एक तो हमें भ्रम और मोह के प्रभाव में निर्णय नहीं लेना चाहिए। दूसरे कि हमें अन्याय , अनाचार का समर्थन नहीं करना चाहिए। तीसरे कि हमें कुरूतियों से बचना चाहिए। चौथा जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है वो ये है कि व्यक्ति का सेल्फ सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। व्यक्ति का आकलन उसके कार्यों के अनुसार होता है न कि उसके साथ हमारे सम्बन्ध से। इसी प्रकार किसी भी स्थिति में स्थूल का महत्व उसके द्वारा किये गए कार्य के मूल्यांकन से होता है। किसी भी स्थिति में हमें चाहिए कि हम अपने विवेक पर माया , मोह, भ्रम को हावी नहीं होने दें क्योंकि इससे हमारी स्वाभाविक निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है और तब हम निराशा में डूब जाते हैं।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 3
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥
इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा
॥3॥
श्रीकृष्ण अपनी बात आगे बढाते हुए अर्जुन को चार बातें कहते कहते हैं
---नपुंसकता को मत प्राप्त हो
----नपुंसकता तुम्हारे लिए उचित नहीं है
----- हृदय की दुर्बलता को छोड़ो
-------युद्ध के लिए उठ खड़े हो जाओ
अर्जुन युद्ध नहीं करने के तमाम तर्क प्रस्तुत कर चुका है। बन्धु बाँधवों से युद्ध करना, भले ही वो आतताई ही क्यों न हों, उचित नहीं , क्योंकि इससे कुलधर्म यानी सनातन धर्म नष्ट होगा, स्त्रियाँ दूषित होंगी, वर्णसंकर जनमेंगे जिससे पितर नाराज होंगे, जो सम्पत्ति और राज मिलेगा उसे साथ भोगने वाले बन्धु और मित्र नहीं होंगे आदि आदि उसके तर्क रहें हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस प्रकार की सोच नपुंसकता दर्शाती है जो अर्जुन जैसे व्यक्ति के लिए उचित नहीं। ये हृदय की कमजोरी की निशानी हैं सो अर्जुन का आह्वान करते हैं कि इसे छोड़कर वह युद्ध के लिए प्रस्तुत हो जाये।
विषयगत प्रसंग युद्ध का है सो चर्चा युद्ध की है। जैसा हम देख चुके हैं कि हर परिस्थिति में जब भ्रम और मोह हावी होते हैं तो विवेक नष्ट होता है जिससे निर्णय लेने की हमारी क्षमता प्रभावित हो जाती है। कार्य करने की तमाम तकनीकी योग्यता और ज्ञान रहने के बावजूद हम कार्य करने से भागते हैं क्योंकि हम मानसिक तौर पर उस कार्य को करने के योग्य नही रह जाते, भ्रम और मोह जनित मनोविकारों के। तब हम बहाने बनाने लगते हैं। परिवार, व्यवसाय, छात्र जीवन, समाज हर जगह लोग इस बीमारी के शिकार बराबर होते रहते हैं। ऐसे ही लोगों को श्रीकृष्ण सम्बोधित कर रहें हैं। अर्जुन तो शारीरिक रूप से नपुंसक नहीं है तब श्री कृष्ण उससे नपुंसक बनने की बात भला क्यों कहते हैं। नपुंसकता तो यही है कि जिस कार्य को करने के लिए आपको स्वाभाविक रूप से सक्षम होना होता है उसी में आप अक्षमता का प्रदर्शन कर रहें हैं। जैसे सैनिक लड़ने से डरे, छात्र पढ़ने से भागे, व्यवसायी का मन व्यवसाय में न लगे तो ये सभी उनके स्वाभाविक गुण से भिन्न ही तो है।।निर्धारित भूमिका को निभाने की अक्षमता ही नपुंसकता है क्योंकि इस अक्षमता से आगे बढ़ पाने का रास्ता बन्द हो जाता है। ये आता कँहा से है? जब हम अपने सेल्फ यानी स्व को नहीं पहचानते यानी अपनी ही आत्मा को जानने से इनकार कर देते हैं तो नपुंसकता का जन्म होता है। अर्जुन युद्ध भूमि में अन्याय अधर्म का प्रतिकार करने आया है और लगता है आतताइयों की रक्षा का उपाय करने। तो स्वाभाविक है कि यह तो नपुंसकता ही है। सो श्रीकृष्ण की शिक्षा है कि हमें कभी भी अपने निर्धारित कर्तव्य से नहीं मुँह मोड़ कर भागना चाहिए चाहे जीवन का कोई भी प्रसंग हो। यह बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब हमें उस कार्य को करने की पूर्ण तकनीकी योग्यता और सामर्थ्य भी हो। इसीलिए ये आचरण हमारे अनुकूल नहीं होता। अर्जुन तो युद्ध विद्या के साथ साथ शास्त्रों का भी ज्ञाता है, पूर्व में कई बार अपनी योग्यता का परिचय दे चुका है , उसे पता है कि उसकी क्षमताएँ क्या हैं तो फिर नपुंसकता का आचरण उसके लिए कैसे अपेक्षित हो सकता है। इस प्रकार श्री कृष्ण अर्जुन को उसके सेल्फ की याद दिलाने की कोशिश करते हैं।
फिर हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके तर्कों और उसके मनोभावों को क्षुद्र यानी नीच श्रेणी का मानते हैं और इसे उसकी हृदय की दुर्बलता कहते हैं। विवेक और भावना दो महत्वपूर्ण कारक होते हैं जो हमारे कार्य करने की प्रवृत्ति को निर्धारित करते हैं। जब विवेक से लिये गए निर्णय में भावना को भी स्थान मिलता है और भावना भी विवेक से संचालित होती है तो फिर हम संयमित निर्णय पर पहुंचते हैं। लेकिन यदि ये दोनों अपनी मात्रा में असन्तुलित हो जाते हैं तो फिर हमारा निर्णय, कार्यप्रणाली भी असंयमित हो जाती है। यही हमारे हृदय की दुर्बलता है, यही हमारी नीचता है। उदाहरण स्वरूप जीवन में अधर्म, अन्याय के पक्ष में खड़े व्यक्ति के प्रति करुणा और अनुराग अहिंसा नहीं नीचता है , ज्यादा अंको के लिए छात्र का चोरी करते पकड़ कर उसे अपना सम्बन्धी जानकर छोड़ देना नीचता है, एक अपराधी को अपने लाभ के लोभ में बख्शना नीचता है। यही नीचता हमारी दुर्बलता का परिचायक है। श्री कृष्ण इस नीचता से उबरने की सलाह देते हैं।
और तब कहते हैं कि नपनुसकता और हृदय की नीचता को छोड़कर अर्जुन यानी हम सब खड़े हो जाएं, हताश न हों और युद्ध करें यानी अपने कर्तव्य निर्वाहन के लिए तैयार हो जाएं।
जीवन में जब कभी भी हमें लगे कि हमें अपने दायित्वों को निभाने में हिचक, निराशा, भय हो रहा है तब तब हमें स्मरण करनस चाहिए कि हम वास्तव में क्या हैं, हमारी क्षमताएँ क्या हैं और हमें श्री कृष्ण की इस शिक्षा को याद कर आगे बढ़ना चाहिए।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 4
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अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥
अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं
॥4॥
श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन को समझाना चाहा है तो अर्जुन पुनः प्रतिवाद करता है और वह स्पष्ट कहता है कि चूँकि भीष्म और द्रोण उसके लिए पूजनीय हैं सो वह उनसे युद्ध नहीं कर सकता है। श्रीकृष्ण को वह मधुसूदन और अरिसूदन नामों से सम्बोधित करता है जिसका अर्थ होता है शत्रुओं का नाश करने वाला। उसका तर्क है कि आप तो शत्रुहन्ता हैं , शत्रुओं को मारने वाले हैं लेकिन भीष्म मेरे पितामह और द्रोण गुरु हैं मेरे जो मेरे लिए पूजनीय हैं तो भला मैं उनसे कैसे युद्ध कर सकता हूँ। अर्जुन कोई नई बात नहीं कह रहा है, बस अपने पुराने तर्कों को दुहरा रहा है। श्रीकृष्ण के समझाने का स्पष्ट रूप से उसपर कोई असर नहीं हुआ है। जब हम सामने वाले को अपने ही स्तर का समझदार समझते हैं तो उसकी सलाह भी नहीं मानते। अगर वो कुछ कहता भी है तो उसकी समझ को ही चुनौती दे डालते हैं। जब तक आप अपने सलाहकार की बुद्धि पर भरोसा नहीं करते उसके सुझाव को नहीं मान सकते। तभी तो श्रीकृष्ण के कठोर वचनों को भी अर्जुन गम्भीरता से नहीं लेकर अपने पुराने तर्क ही प्रस्तुत कर देता है।
हमारा मन उसी को सत्य मानता है जो हम बचपन से देखते सुनते समझते आये हैं। जो नीति अनीति सीखे हैं उससे बाहर की बात सुनना हमें मंजूर नहीं होता भले समझाने वाला कितना भी ज्ञानी क्यों न हो।
बड़ों का और गुरु का सम्मान कँही से भी गलत नहीं सो एक दफा तो लगता है कि अर्जुन ठीक ही कह रहा है कि वह भला पितामह और गुरु से कैसे लड़े। लेकिन ध्यान देने की बात है कि पितामह और गुरु एक पद हैं जो किसी व्यक्ति के द्वारा किसी समय विशेष में धारित किये जाते हैं। अगर किसी अन्य समय या परिस्थिति में वही व्यक्ति किसी अन्य भूमिका में हो तो क्या वह इस पद के सम्मान का अधिकारी है? और हमारा खुद का पद अथवा स्थिति यानी स्टेटस उस समय विशेष या परिस्थिति विशेष में क्या पहले वाला ही है? वंश परम्परा में भीष्म अर्जुन के पितामह तो हैं, गुरु शिष्य परम्परा में द्रोण उसके गुरु भी हैं लेकिन जब भीष-द्रोण एक पक्ष ले कर एक सेना के साथ आ गए और अर्जुन एक अन्य पक्ष लेकर दूसरी सेना में आ गया और दोनों पक्षों के उद्देश्य, मान मर्यादा भिन्न हो गए तो क्या पुराने सम्बन्धों के अनुसार ही वर्तमान सत्य का निर्धारण हो पाना सम्भव है? हर परिस्थिति में हमारी भूमिका बदल जाती है। भीष्म और द्रोण अधर्म, असत्य, अनाचार, अन्याय का पक्ष ले चुके हैं। उन्होंने अपनी भूमिका तय कर ली है कि वे दुर्योधन के अनाचार के समर्थन में पांडवों के सत्य, न्याय के आग्रह का विरोध करेंगे ही तो क्या सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े अर्जुन को इस बात की आजादी हो सकती है कि वह अपने सत्य और न्याय के आग्रह को छोड़कर भीष्म और द्रोण की पूजा सिर्फ इसलिए करे कि वे पितामह हैं, वे गुरु हैं? इतनी समझ अर्जुन को क्यों नहीं आ रही है?
जीवन में यही असमंजस हमें परिस्थिति के सत्य से विचलित कर देती है। और हम नहीं जानते हुए भी गलत के साथ खड़े हो जाते हैं। भ्रम से उपजे ज्ञान में अहंकार की मात्रा सबसे अधिक होती है। इस अहंकार की धुंध में सच नहीं सूझता और हम अपनी रूढ़ियों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते। उसी रूढ़ि की वजह से हम नहीं समझ पाते कि हमारा विस्तार परिवार और परिवारजन्य संस्थाओं और मान्यताओं तक ही सीमित नहीं है। मूल बात सम्बन्धों से नहीं तय होते बल्कि मूल बात तय होते हैं सत्य के प्रति हमारे आग्रह से। रक्त सम्बन्ध से सत्य तय नही होते, मित्रता और सम्मान के सम्बन्धों से सत्य नहीं तय होते। सत्य तो शाश्वत है, ये हमपर निर्भर करता है कि हम किधर जाना तय करते हैं। एक बलात्कारी सम्बन्धी का समान आवश्यक है या पीड़िता के पक्ष में खड़ा सत्य है ये हमें तय करना होता है। हमारे इसी निर्णय से तय होता है कि समाज में भविष्य में शांति होगी या अशांति, अनाचार फैलेगा या सदाचार। यदि हम भ्रम और अहंकार से निकल कर अपने को सदाचार, सत्य, , न्याय के प्रति समर्पित करेंगे तो हो सकता है कि हमें उन लोगों के खिलाफ भी खड़ा होना हो जो हमारे प्रिये तो हैं लेकिन असत्य और अन्याय अनाचार के साथ खड़े हैं। ये तय करने की जबाबदेही हमारी है कि हम व्यक्ति और व्यक्तिगत सम्बन्धों को ज्यादा महत्व देंगे या फिर उस सत्य को जिससे समाज में न्याय की स्थापना होने में मदद मिलेगी। ये तय तभी कर पाते हैं जब हम भ्रम से बाहर निकल कर निर्णय लेते हैं। परिवार हो , मित्रमण्डली हो, सामाजिक या व्यवसायिक रिश्ते हों हर जगह दो पक्ष मिलते है। अब उन परिस्थितियों में ये तय करना हमारी जबाबदेही है कि हम किस पक्ष में जाते हैं। यदि क्षुद्र स्वार्थ वश हम गलत का साथ देते हैं तो अंततः स्वयम भी उसी गलत के शिकार हो जाते हैं। यदि सही का साथ देते हैं तो कुछ देर के विप्लव के पश्चात हम भी उस सामाजिक उन्नति का लाभ लेते हैं जो हमारे सत्य का साथ देने से उतपन्न होती है। लेकिन पहले भ्रम और भ्रम जनित अहंकार से तो खुद को निकालें, माया , मोह के मकड़जाल को तो तोड़ें।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 5
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गुरूनहत्वा हि महानुभावा-
ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुंजीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥
इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा
॥5॥
जब भी हम किसी कार्य को करने के लिए प्रवृत्त होते हैं तो उस कार्य करने का उद्देश्य हमारे मानस पटल पर स्पष्ट होना अति आवश्यक होता है अन्यथा हम विभन्न प्रकार के संशय के शिकार हो जाते हैं। यदि हमारे कार्य करने का उद्देश्य निजी और अल्पकालीन स्वार्थ होता है तो कार्य का परिणाम कुछ और निकलता है और यदि उसी कार्य का उद्देश्य व्यपक सामाजिक हित हो तो परिणाम एकदम भिन्न होता है। इसके साथ ही हमारे उद्देश्य की प्रकृति के कारण हमारे कार्य करने का उत्साह और तौर तरीके भी भिन्न हो जाते हैं। अर्जुन युद्ध में क्यों खड़ा है? क्या ये तथ्य अर्जुन को स्पष्ट है? यदि अर्जुन का उद्देश्य राज्य और राजपाट से मिलने वाले सुख भोग हैं तो बात और हो जाती है और यदि अर्जुन का उद्देश्य अन्याय, अनाचार, अत्याचार, असत्य का विरोध करना होता है तो दूसरी बात होती है। अर्जुन के तर्क को देखें तो पता चलता है कि उसे लगता है कि वह तो युद्ध में मात्र राजपाट और राजपाट से मिलने वाले सुख, और भोग के लिए आया है। अगर उद्देश्य ये सब हैं तो अर्जुन का तर्क कि भीष्म और द्रोण सरीखे महान गुरुओं की हत्या कर राजपाट लेने से ज्यादा अच्छा तो भीख माँगकर जीवनयापन करना है। लेकिन क्या कुरुक्षेत्र का मैदान मात्र आपसी वैर का हिसाब किताब करने के लिए सजा है? आखिर इतने बड़े युद्ध का उद्देष्य क्या है? यही प्रश्न जीवन में हर घड़ी हम सब के सामने है। हम क्यों कुछ कर रहें हैं? हम क्यों पढ़ाई कर रहें हैं, क्यों नौकरी व्यवसाय कर रहें हैं , क्या कँही हम नौकरी या व्यवसाय या पढ़ाई करते वक़्त निजी सफ़लता को ही अपने जीवन की सफलता असफलता का पैमाना मान रहें हैं या वृत्तर उद्देश्य के प्रति सजग भी हैं आदि आदि। इन्ही सब उद्देश्यों से हमारे आचरण की परीक्षा हर पल हो रही है। हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी गतिविधि में ये प्रश्न खड़ा है। अगर हमारी दृष्टि में व्यक्तिगत लाभ ही सब कुछ है , जीवन का सम्पूर्ण उद्देश्य है तो उद्देश्य के प्रति हमारा आचरण भिन्न हो जाता है और यदि उद्देश्य न्याय , सदाचार, सत्य जैसा बृहत्तर है तो आचरण भिन्न होता है। कार्य की महत्ता उसके उद्देश्य से निर्धारित होती है। अर्जुन अपने उद्देश्य के सम्बंध में भ्रमित है, हम सब भी अधिकांश समय अपने जीवन के उद्देश्यों के प्रति भ्रमित ही होते हैं। कौरव अपने उद्देश्य में निजी स्वार्थ को अधिक महत्व दे रहें है जबकि युद्ध शुरू होने के पूर्व तक पांडवों के लिए राज्य से अधिक न्याय और सत्य का महत्व अधिक था। इस दृष्टिकोण से जो कौरव पक्ष में है वह अन्याय और असत्य की रक्षा के लिए खड़ा है , फिर ये बात गौण हो जाती है कि कौन गुरु है कौन पितामह है। सभी असत्य के रक्षक ही तो हैं। ऐसी स्थिति में यदि अर्जुन को सत्य और न्याय की रक्षा करनी है तो उसे भीष्म और द्रोण से भी लड़ना ही होगा। भीष्म और द्रोण गुरु या पितामह की भूमिका में नहीं हैं। वे तो अन्याय और असत्य के रक्षक की भूमिका में हैं। लड़ाई भीष्म या द्रोण से नहीं है, उनकी प्रवृत्ति और उद्देश्य से है। हमारे जीवन में भी यही महत्वपूर्ण है कि हम किसके साथ खड़े हैं आसुरी प्रवृत्तियों के साथ या दैवी प्रवृत्तियों के साथ। जब हमको इसका ज्ञान हो जाता है तो फिर हम निर्णय भी सही ले पाते हैं। अन्यथा हमारा भी हाल भ्रम में फँसे अर्जुन जैसा ही होता है, माया मोह में लिपटा एक नपुंसक और क्षुद्र प्रवृत्ति वाला इंसान!
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 6
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न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं
॥6॥
वस्तुस्थिति की स्वीकारोक्ति ही सत्य का मार्ग दिखाती है। हम सच को तब तक नहीं जान पाते जब तक अपने झूठ को नहीं पकड़ लेते। हम आप सही रास्ते पर तब बढ़ते हैं जब हमें पता हो कि दूसरा रास्ता गलत है। लेकिन इस स्थिति तक पहुँचने के ठीक पहले तक हमारे अंदर ये द्वंद्व तो रहता ही है कि न जाने कौन सा रास्ता सही है। अर्जुन तमाम तरह के तर्क देकर अब थका हुआ प्रतीत होता है। मन में उपजा भ्रम जब आपकी योग्यता पर और आपके तकनीकी ज्ञान पर हावी होता है तो आप अपनी योग्यता या ज्ञान के अनुसार निर्णय नहीं ले पाते, बल्कि भ्रम और मोह के अनुसार निर्णय लेते हैं और अनिर्णय की स्थिति में फँस जाते हैं। भ्रम से कार्य के परिणाम की चिंता होती है। जैसे ही आप हम परिणाम के प्रति जागरूक होते हैं, हमारी कार्य दक्षता गिरने लगती है। आप जब इस मनोस्थिति में आते हैं कि आपके फलाना काम का क्या पता क्या परिणाम निकलेगा, अच्छा होगा या बुरा तब आप उस काम को करने से हिचकिचाने लगते हैं। परिणाम की चिंता आपके ज्ञान और दक्षता पर हमेशा ही भारी पड़ जाती है। नतीजा में हम निष्क्रिय होने लगते हैं। क्रियाशीलता का स्थान कुतर्क ले लेता है। यही वह स्थिति होती है जँहा से हम दो में एक मार्ग चुन सकते हैं, भ्रम को सदा सदा के लिए मिटा भी सकते हैं और सदा सदा के लिए अपना भी सकते हैं।
अर्जुन अब स्पष्ट रूप से मानसिक द्वंद्व के इस चरम पर पहुँचता दिख रहा है। वो साफ साफ स्वीकार करता है की वो अनिश्चय और अनिर्णय की हालत में है, युद्ध करना या नहीं करना कौन सा मार्ग सही है उसके लिए वो नहीं समझ पा रहा है। अब तक तो वह युद्ध करने का ही विरोध कर रहा था। अब वह स्वीकार कर रहा है कि उसे नहीं पता कि युद्ध करना सही है कि नहीं करना सही है, क्योंकि परिणाम अनिश्चित है और मारना उनको है जिनके बिना(यानी भीष्म और द्रोण ) वह जीना भी नहीं चाहता। इससे स्पष्ट होता है कि
---अर्जुन युद्ध से अधिक युद्ध के परिणाम को लेकर चिंतित है और उसी सम्भावित परिणाम के अनुसार अपने कर्तव्य तय करना चाहता है,
--- वह युद्ध का उद्देश्य राज और सुख भोग की प्राप्ति समझ रहा है,
----सुख भोग और राज पाट के लिए बन्धु बांधवों को मारना उसकी नजर में गलत है,
-----इस प्रकार उसके मन में युद्ध को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियाँ हैं।
अब आप अपने जीवन में घट रही घटनाओं की समीक्षा कीजियेगा तो पाइए कि हम जीवन का अधिकांश समय अर्जुन की तरह ही उहापोह में गंवा देते हैं। दोस्त, सम्बन्धी के कुकर्मों को जानते हुए भी आँख बंद कर लेते हैं, उनका विरोध नहीं करते, जब कि कर्तव्य निर्वाहन का समय आता है नफा नुकसान का तराजू लेकर बैठ जाते हैं और भूल जाते हैं कि हमारे लिए क्या करना उचित है और अनुचित है। हम सब अर्जुन की तरह दिग्भ्रमित ही बने फिर रहें होते हैं जीवन भर।
लेकिन परिवर्तन का मार्ग तब खुलता है जब हमें अपने भ्रमों की स्वीकारोक्ति होती है।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 7
----------------------------------------कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥
इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए
॥7॥
जब हमें आभास हो जाता है कि हम भ्रम में जी रहें हैं और इस भ्रम के कारण हम सही निर्णय नहीं ले पा रहें हैं तब हमारे अंदर सत्य जानने समझने की ईक्षा उतपन्न होती है और तब हम ऐसे व्यक्ति को खीजते हैं जो हमारे भ्रम को दूर कर हमें सही मार्ग दिखा सके। अर्थात तब हम गुरु की शरण खोजते हैं। जब तक ये भान नहीं होता कि हम अलग हैं परमात्मा अलग तब तक उस परम पिता परमात्मा से मिलने की उत्कंठा उतपन्न नहीं होती। जब तक हमें भ्रम का ज्ञान नहीं होता हमारे अंदर सच के प्रति अनुराग नहीं उतपन्न होता। जब ऐसा होता है तब हम ज्ञान, परमात्मा, सत्य आदि के लिए लालायित हो उठते हैं। तभी हमें गुरु यानी ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है जो हमारेआ मार्गदर्शन कर हमें ज्ञान, सत्य और परमात्मा से मिला सके।
लेकिन इस स्थिति में हम आते कब हैं? यह स्थिति तब आती है जब हम महसूस करते हैं कि हमारा ज्ञान अधूरा है, जब हम ये समझते हैं कि हमारे पास क्षमता तो है लेकिन अपने अज्ञान के कारण हम अपनी क्षमता के अनुसार अपना कर्तव्य नहीं कर पा रहें हैं, जब हमें लगता है कि हमारा आचरण और हमारा स्वभाव में मैंन नहीं बैठ रहा है। अर्थात जब हमें अपनी अज्ञानता, अपने भ्रम का भान होने पर ही हमारे अंदर ज्ञान, सत्य, धर्म, और परमात्मा के प्रति अनुराग होता है, उसके पहले नहीं। परिवार, समाज, छात्र जीवन, व्यवसाय किसी भी क्षेत्र को ले लें हम तभी सत्य के प्रति , तभी अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक होते हैं जब हमें लगता है कि हम जो हो सकते हैं, हम जो कर सकते हैं वो वास्तव में हम हो नहीं पा रहें हैं, कर नहीं पा रहें हैं। ऐसी स्थिति में हम किसी ज्ञानी, अनुभवी की शरण में जाना चाहते हैं। इसी तड़प से सन्मार्ग का मार्ग खुलता है।
युद्ध क्षेत्र में किसी पक्ष के किसी भी योद्धा को भ्रम नहीं हुआ है। भ्रम का शिकार मात्र और मात्र अर्जुन ही हुआ है जिसके टक्कर का योद्धा विरले ही है कोई। अर्जुन के अंदर अनुराग है, उसे तमाम ज्ञान और शक्ति हासिल होने के पश्चात भी अहंकार नहीं है। बल्कि उसे तो लगता है कि उसके ज्ञान और शक्ति का सही उपयोग होना चाहिए। सो उसे जितना सही लगता है उतना तर्क करता है लेकिन चूँकि उसके अंदर सत्य और धर्म के प्रति गहरी आस्था है सो वह चाहता है कि उसे वह सलाह मिल सके जिससे सत्य और धर्म का उसका मार्ग विचलित न हो। इसी कारण से उसे अपने मत पर भरोसा नहीं होता। हम सभी को भी चाहिए कि हम खुद से जरुर प्रश्न करें कि जो हम करने जा रहें हैं क्या वह सत्य और धर्म के अनुरूप होगा।
आखिर इस धर्म का तातपर्य है क्या। वस्तुतः धर्म कोई सम्प्रदाय नहीं। अब तक अर्जुन ने जो कुछ भी धर्म , सनातन धर्म या कुटुम्ब धर्म के बारे में कहा है यह उसकी परम्परागत सोच का परिणाम है। लेकिन धर्म की समझ के लिए हमें थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी। आगे श्रीकृष्ण बताएंगे कि धर्म है क्या। अभी तो इतना ही समझना जरूरी है कि एक जागरूक विद्यार्थी की भाँति अर्जुन अपने ज्ञान के प्रति शंकालु है और चाहता है कि उसकी शंका का समाधान हो। जब हमारे अंदर शंका समाधान की ईक्षा उतपन्न होती है तब हम गुरु की शरण में जाते हैं।
ध्यान दें कि अर्जुन श्रीकृष्ण से अनुरोध करता है कि वे उसे शिष्य के रूप में स्वीकार करें। वह श्रीकृष्ण को गुरु नहीं कहता बल्कि खुद को उनका शिष्य बताता है। अभिव्यक्ति की यह भाषा बताती है कि अर्जुन में सत्य और धर्म को, अपने कर्तव्य कों समझने और जानने की अद्भुत बेचैनी है। यही बेचैनी हमारे अंदर आ जाये तो हमारा अहंकार मिट जाए। जैसे ही हम स्वीकार करते हैं कि हमें सत्य नहीं पता और हम सत्य का ज्ञान चाहते हैं वैसे ही हमारा भ्रम और भ्रम जनित अहंकार समाप्त हो जाता है। यंही से सत्य का मार्ग प्रशस्त होता है।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 8
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न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥
क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके
॥8॥
प्रश्न प्रस्तुत हो तो उत्तर की उत्कंठा होती ही है। हर सोचने समझने, अच्छा बुरा की परवाह करने वाले के लिए ये जानना अति महत्वपूर्ण होता है कि अच्छा क्या है जो उसे करना होगा। हर विचारवान इंसान बुरा या गलत काम करने से बचना चाहता है और इसी कारण उसे जब भी कोई कार्य करना होता है तो वह पहले सोचता है कि उस कार्य को करना चाहिए या नहीं, उसके मन में ये प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जो वह करना है कँही वो कार्य ही तो गलत नहीं है। सो वह उस कार्य के प्रति तरह तरह से खुद से पहले तर्क करता है। यदि सन्तोषजनक उत्तर उसे अपने अंदर से ही मिल गया तब तो ठीक है, वह उसी के अनुरूप आगे बढ़ता है, लेकिन यदि वह अपने ही उत्तर से संतुष्ट नहीं हो रहा होता है तो वह किसी ज्ञानी को खोजता है जिसे वह गुरु मानकर उससे निर्देश माँगता है। यह प्रक्रिया उसी के मन में होती है जो सही गलत की परवाह करता है। एक पेशवर हत्यारा सुपारी लेकर हत्या करते वक़्त हत्या के सही या गलत होने की परवाह नहीं करता। उसी प्रकार एक ऐसा विद्यार्थी जिसे विषय का ज्ञान नहीं वह उस विषय के प्रश्न से विचलित ही नही होता क्योंकि वह तो पढा ही नहीं है तो फिर कौन सा उत्तर सही होगा, कौन गलत उसे क्या पता, सो जो समझ में आता है उसे ही उत्तर में लिख देता है। एक जागरूक व्यवसायी या कृषक अपने हर कदम को परखता है तब आगे बढ़ता है। जब आपको एक महत्वपूर्ण पालिसी बनानी होती है तो आप उस ज्ञानी, जानकार विशेषज्ञ को खोजते हैं जिसे विषय के सैद्धान्तिक और प्रायौगिक ज्ञान हो। अब भला दुर्योधन को क्या दुविधा होनी है। वह तो सिर्फ एक ही काम जानता है कि छल से राज्य हड़पना है और यह नहीं हुआ तो मारकाट कर हड़पना है लेकिन अर्जुन को राज पाट से ज्यादा चिंता इस बात की है कि जिस विधि से राज पाट लेने के लिए या उसे बचाने के लिए वह युद्ध के मैदान में शस्त्रों को धारण कर के आया हुआ है क्या वो विधी जायज है , धर्म संगत है , सत्य के अनुरूप है अथवा नहीं। उसके लिए साध्य(END) से ज्यादा महत्व साधन(MEANS) का है। उसके अनुसार यदि साधन गलत है तो साध्य भी गलत है। सो वह साधन की शुचिता के बारे में चिंतित है, सो वह पहले तो खुद से , और श्रीकृष्ण को सुनाकर तर्क करता है , ताकि श्रीकृष्ण उसके मत का समर्थन कर दें। हर व्यक्ति यही चाहता है कि लोग बाग उसके ही तर्कों को सही मान लें। सो हर व्यक्ति अपने तर्कों को मित्रों आदि के समक्ष रखता ही है।लेकिन अपने सारे तर्कों से अर्जुन खुद को संतुष्ट नहीं कर पा रहा है तो भला श्रीकृष्ण को क्या संतुष्ट कर पायेगा बेचारा। वह खुद को खुद के तर्कों से संतुष्ट नहीं कर पाता है इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि अपने सारे तर्कों का प्रयोग कर के भी उसे शांति नहीं मिल पा रही है, वह उसी तरह से उद्विग्न है जैसे प्रारम्भ में प्रश्न रखने वक़्त था। यदि उत्तर मिल गया होता , यदि वह अपने उत्तर से अपने को संतुष्ट कर लिया होता तो श्रीकृष्ण की तरफ कभी नहीं देखता। घरबपरिवार, समाज, कार्यक्षेत्र में हम भी तो यही करते है, ऐसे हीं करते हैं। जब सही या गलत हम अपने तर्कों से खुद संतुष्ट होते हैं तब निर्णय लेते वक्त कँहा किसी की परवाह करते हैं। लेकिन जब साध्य से अधिक साधन के महत्व और उसकी शुचिता की चिंता करते हैं तो हम अपने निर्णय को साफ सुथरा, सत्यनिष्ठ, और धर्म आधारित रखना चाहते हैं। इसी सोच का परिणाम है कि अर्जुन के मन में राजपाट, यँहा तक की स्वर्ग का राज मिलने से भी प्रसन्नता नहीं मिल पाने की बात है। यदि साध्य अर्थात लक्ष्य राजपाट होता, यदि लक्ष्य सुख सुविधा को हासिल करना होता तो फिर अर्जुन के मन में कोई शंका नहीं होती, जैसे दुर्योधन को नहीं है। लेकिन एक विचारवान व्यक्ति होने के नाते अर्जुन को लगता है कि जब गलत साधन से राजपाट हासिल किया जाएगा तो फिर भला मन को शांति कँहा से मिलेगी। और जिस लक्ष्य को हासिल कर शांति नहीं मिल सकती उसे हासिल कर ही क्या मिल जाएगा भला। कोई भी वस्तु जो शांति नही दे पाती हो उससे सुख क्या मिलेगा और जिस कार्य स शांति नहीं मिलने वाला उसे वह क्यों करे भला। अर्जुन तय नहीं कर पा रहा है कि वो जो कह रहा है वह सही है भी या नहीं। सो उसकी बेचैनी यथावत बनी हुई है। वह अपने ही तर्कों से हारा हुआ महसूस कर रहा है तभी तो उसकी इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो रहीं है अर्थात उसके SENSES काम नहीं कर रहें हैं और वह अनिर्णय से ग्रस्त हो रहा है। अधूरा ज्ञान पूर्ण होने के लिए छटपटा रहा है ,उसे गुरु की तलाश है जो उसके अधूरे ज्ञान को पूर्णता दे सके।
हर समझदार को अपनी अज्ञानता की जानकारी होनी ही चाहिए। यदि हम खुद को ज्ञानी मानते हैं तो हमारा पहला फर्ज है कि हमें इसका भी ज्ञान हो कि हमारे ज्ञान की सीमा कँहा तक है और हमें गुरु की आवश्यकता कब होगी। हमें जानना चाहिए कि हम जो करने जा रहें हैं, कर रहें हैं क्या उस साधन की सत्यता और शुचिता प्रमाणित है कि नहीं। अगर नहीं जानते तो जानने के लिए किसी की शरण में जाना बुराई नहीं है। जाना ही होगा अन्यथा गलत निर्णय लिए जाने की आशंका बनी रहेगी। लक्ष्य वही सत्य है जिससे हमें आत्मिक शांति मिलती है। धन, सम्पदा शांति नहीं देते। वे शांति के अनिवार्य शर्त नहीं हो सकते यदि उनको पाने का रास्ता असत्य और अधर्म से होकर जाता हो तो । आप खुद देखिये , परखिये अपने जीवन में, समाज के अन्य भागों में कि क्या गलत ढंग से अर्जित सम्पति, मान सम्मान, पद पदवी , डिग्री आदि से आपको या अन्य किसी को शांति नसीब हो रहा है। ये कोई सैद्धान्तिक या कागजी सत्य नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है। आप खुद व्यवहार में देखें।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 9 & 10
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संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥
संजय बोले- हे राजन्! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्री गोविंद भगवान् से 'युद्ध नहीं करूँगा' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गए
॥9॥
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले
॥10॥
अब तक तो स्पष्ट हो चुका है कि अर्जुन अपनी ही बुद्धि के तर्कों के कारण शोक , भ्रम और अनिर्णय की स्थिति में है सो हथियार डालकर चुप हो जाने के सिवा उसके पास अपनी बुद्धि के अनुसार कोई और मार्ग बचा नहीं है सो वह वही करता है। लेकिन गीताकार ने शब्दों के चयन से कई तथ्यों को रेखांकित कर दिया है। अर्जुन को दो नामों से सम्बोधित किया गया है, गुडाकेश और परन्तप यानी निंद्राविजयी और शत्रुओं का दमन करने वाला अर्थात अर्जुन के वास्तविक चरित्र को गीताकार में दिखाया है और हम सभी को यह भी याद दिलाया है कि महाज्ञानी, महाशक्तिशाली भी भ्रम में पड़कर अनिर्णय की स्थिति में आ सकते हैं। ये हमारे लिए वार्निंग बेल के समान है, खतरे की घण्टी है जो हमें सचेत करती है कि यदि हम भ्रम, मोह, माया में पड़े तो तमाम क्षमता के बावजूद हम कृपणता और कायरता के शिकार होकर नपुंसकता को प्राप्त कर सकते हैं जिस अवस्था में हमसे निर्णय नहीं लिया जा पाता और हम तमाम तकनीकी ज्ञान के बावजूद भी प्रयास से मुँह मोड़ लेते हैं।
लेकिन इस अवस्था में अर्जुन किससे मदद माँग रहा है जरा इसपर भी देखें। श्रीकृष्ण की शरण में आया है अपनी बुद्धि शोधन के लिए और श्रीकृष्ण कौन हैं गीताकार के शब्दों में! वे हृषिकेश यानी इन्द्रियों के स्वामी और गोविंद यानी सारी धरती उन्ही की है। अर्थात जब हमारा मन भ्रमित हो जाता है, जब हमें धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य का भान नहीं होता तब हमें किसके पास जाना चाहिए, किसकी मदद लेनी चाहिए इसपर विचार करना अत्यावश्यक है लेकिन उसके पहले हमें ये भी ध्यान रहे कि हम भ्रम में हैं इसकी स्वीकारोक्ति अनिवार्य है अन्यथा हम भी दुर्योधन की तरह अपने भ्रम और मोह , अहंकार और मूर्खता के प्रति बन्धे हीं रह जाएंगे जीवन भर। जिनको अपने जीवन के विभिन्न प्रसंगों में आने भ्रम का अहसास तक नहीं होता वो खुद गुरुओं को ज्ञान देते फिरते हैं और अंत में नाश को प्राप्त होते हैं जैसा दुर्योधन ने किया और भोग। लेकिन भ्रम के प्रति शंका और उसकी स्वीकारोक्ति हमें अर्जुन की तरह बनाती है, हम भले ही कुछ समय के लियर भ्रमित होते हैं लेकिन इन भ्रम को जैसे ही पहचानते हैं हमें चाहिए कि हम शीघ्रताशीघ्र उसके सम्पर्क में आना चाहिए जिसे खुद अपने इन्द्रियों यानी अपने सेंसेस पर नियंत्रण हो और जो अपने शरीर का खुद स्वामी हो । यानी कृष्ण की शिक्षाओं की शरण में आना चाहिए।
जब हम स्वीकारोक्ति के साथ और पूर्ण समर्पण के साथ गुरु की शरण में आते हैं तब हमें ज्ञान मिलता है, तभी गुरु के द्वारा प्राप्त ज्ञान हमारे अंदर टिकता भी है। हमारी इसी अवस्था में गुरु यानी श्री कृष्ण हमें ज्ञान देते हैं। अब चूँकि अर्जुन अपनी गलती को समझ कर पूर्ण समर्पण के साथ आ चुका है तो अब उसे परमगुरु यानी श्रीकृष्ण के द्वारा उसे दी गई शिक्षा भी मिलेगी। ज्ञान प्राप्त करने हेतु अपने अज्ञान को स्वीकारना और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण ही एक मात्र रास्ता है।