गीता अध्याय 1-श्लोक-20 से 23
-------------------------
(अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का प्रसंग)
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
अर्जुन उवाचः
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥
हे राजन्! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-संबंधियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा- हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए
॥20-21॥
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥ 22।।
और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥
दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आए हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा
॥23॥
शंखनाद के पश्चात वास्तविक युद्ध के पूर्व अर्जुन युद्ध हेतु अपना आकलन करने हेतु दोनों पक्षों की सेनाओं का स्वयम निरीक्षण कर लेना चाहता है। दरअसल कोई भी समझदार व्यक्ति जब किसी समस्या का हल करना चाहेगा, अथवा जब भी किसी परिस्थिति से मुकाबला करना चाहेगा तो सबसे पहले क्या करेगा? सबसे पहले वह समस्या के हर पहलू को परखेगा, हर पहलू के ताकत और कमजोरी का आकलन कर लेना चाहेगा। उसी के बाद अपनी रणनीति तय करेगा। बिना समस्या को समझे सीधे जाकर सिर भिड़ा देना निरी मूर्खता के अतिरिक्त कुछ और नहीं होता। बड़ी से बड़ी समस्या, बड़े से बड़े ताकतवर का कोई कमजोर पक्ष भी होता है, जिससे निपट कर इंसान उस बड़ी से बड़ी समस्या या बड़े से बड़े ताकतवर आदमी को हरा सकता है, हरा भी देता है। अर्जुन युद्ध के लिए तटपर है, लेकिन वो इस पक्ष का जिससे उसे लड़ना है उसकी समग्र ताकत को तौल लेना चाहता है ताकि उसे युद्ध करने में सुविधा हो। अपने विरोधी के संगी साथियों की भी पहचान कर लेना जरूरी होता है ताकि ये पता रहे कि आपके वैरी कौन और किस तरह के लोग हैं। इसी प्रकार जब आप कोई बड़ी समस्या सुलझाने चलते हैं तो आपको मालूम होना चाहिए कि किस किस तरह की अन्य समस्याएँ आपके रास्ते आ सकती हैं। सो अर्जुन विरोधी के हर पक्ष को जान समझ लेने के लिए उत्सुक है। सच तो ये है कि यदि आप सही में प्रयास करना चाहते हैं तो आपकी रणनीति में ये बातें शामिल होनी ही चाहिए। और ये बात जीवन के हर पहलू पर लागू होती हैं।
और ये भी सच है कि जब आपकी ही बुराई, आपके ही दुर्गुण, आपको घेरने लगे तो सावधानी पूर्वक आपको पहचान करनी होती है कि वो कौन से दुर्गुण हैं जो आपको घेर रहें हैं। तभी आप उनसे छुटकारा पाने का , उनसे पार पाने का रास्ता भी निकालेंगे। दवा करने के पहले मरीज के हर मर्ज की जाँच करना जरूरी है। ध्यान रखना चाहिए कि दुर्गुण हमेशा झुण्ड में आपको घेरते हैं , वो अकेले अकेले कभी नहीं आते।
अब देखिए , यँहा अर्जुन के लिए कपिध्वज शब्द का इस्तेमाल किया गया है। युद्ध की कथा के अनुसार हनुमान जी अर्जुन के रथ पर रहते हैं। हनुमान सम्पूर्ण कथा संसार में सबसे बुद्धिमान और शक्तिशाली किरदार माने गए हैं। साथ ही सबसे शीलवान भी। मतलब साफ है कि जब आप बड़ी समस्याओं से निपटने चलते हैं तो आपका शरीर स्वास्थ्य रहे, आपकी बुद्धि उत्कृष्ट स्तर की हो और चरित्र साफ सुथरा हो। इन तीन महत्वपूर्ण कारकों के अभाव में आपके प्रयास विफल हो जाएंगे। ये तीनों आपको अपराजेय शक्ति देते हैं।
इसीप्रकार हम देखते हैं कि कृष्ण के लिए अच्युत सम्बोधन का प्रयोग हुआ है और ये प्रयोग अर्जुन के द्वारा किया गया है। रथी अपने सारथी को अच्युत कह रहा है अर्थात जिसका पतन नहीं हो सकता हो। श्रीकृष्ण अर्जुन के फ्रेंड, फिलॉस्फर और गाइड की भूमिका में हैं और अर्जुन को उनपर इतना भरोसा है कि वो मानता है कि श्रीकृष्ण का पतन नहीं हो सकता अर्थात श्रीकृष्ण उसे कभी गलत सलाह नही। दे सकते। जीवन में। हम सभी को ऐसे ही मित्र होने चाहिए जो हर परिस्थिति में हमें सही सलाह दे सकें और जिनपर हमें भरोसा भी हो और जिनके प्रति हमारे मन में सम्मान भी हो। कठिन समय में इस तरह के मित्र की जरूरत ज्यादा होती है। बुरे व्यक्ति के मित्र भी बुरे ही होते हैं जबकि अच्छे व्यक्ति के मित्र अच्छे होते हैं।