विकास की डेमोक्रेसी बनाम डेमोक्रेसी का विकास एक सवाल बार बार उठता है कि भारत में 1990 के दशक से प्रारम्भ हुई आर्थिक समृद्धि का दौर क्या अब जा चुका है? इस सवाल का जबाब हम सरकार की आर्थिक नीतियों में खोजते हैं और अपनी अपनी विचारधारा के अनुसार बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का समर्थन और विरोध भी करते हैं। लेकिन भारत के आर्थिक विकास के विमर्श से जो विचार योग्य सबसे महत्वपूर्ण विषय हीं गायब रहता है वह है आर्थिक विकास के लिए आवश्यक सामाजिक बदलाव का विषय। भारतीय आर्थिक नीति ने आजादी के बाद से ही हर दौर में इस सबसे महत्वपूर्ण विचारणीय विषय से परहेज किया है, फिर चाहे वह तथाकथिक समाजवादी विचारधारा के बोलबाले का दौर रहा हो या बाज़ार अर्थव्यस्था का दौर। जो बात सबसे जरूरी है समझनी वह यह है कि किसी भी देश का आर्थिक विकास उस देश के शिक्षा के विकास, स्वास्थ्य सुविधा के विकास, परिवहन, संचार और ऊर्जा स्रोतों के विकास और भू सम्बन्धों और भूमि वितरण के स्वरूप में परिवर्तन और लैंगिक सम्मानता के विकास, नस्लीय/धार्मिक/जातीय समानता और गरिमा के विकाद के समानुपातिक ही होता ह...