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Showing posts from December, 2020

Creche Can Produce Positive Results

Creche Can Produce Positive Results Crèche has a very important role in the development process but unfortunately India and Indians have still not learnt it's role. At the policy level we usually focus on financial indicators but most of our policy makers have ignored the fundamental importance of human resources for economic development. Although it's true that Indian economy is a surplus economy in terms of both skilled and unskilled labour force. We have labour force, both skilled and unskilled but we have no  sufficient work opportunity to offer them. Lack of crèche only adds another dimension to surplus labour economy where many male and female workers though interested in doing work  and also capable of doing work, both as paid employee and as self employed but lack of child care facilities , particularly in urban centers compel them to remain unemployed. And this only enhances unemployment, lack of income and ultimately poverty. If we are ready to take challange  i...

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 UPSANHAR

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 उपसंहार ----------------------------------------------- युद्धक्षेत्र में अपने विरोध में अपने बंधु बांधवों, इष्ट मित्रों को देखकर व्यथित अर्जुन जब युद्ध करने से मना कर श्रीकृष्ण से उसे उचित मार्ग बताने को कहता है तब श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन का लक्ष्य और उसे प्राप्त करने का मार्ग बताते हैं। वस्तुतः द्वितीय अध्याय एक तरह से गीता का सारांश है जिसमें श्रीकृष्ण जीवन की समस्त शिक्षा का निचोड़ प्रस्तुत करते हैं और तत्पश्चात आगे उनकी व्यख्या करते हैं। द्वितीय अध्याय में संक्षिप्त में दी गई शिक्षा का क्रम निम्न है 1.सर्वप्रथम श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन के लक्ष्य को बताते हैं और इस क्रम में उसे आत्मा यानी सेल्फ का अर्थ समझाते हुए उसे ही प्राप्ति योग्य लक्ष्य बताते हैं। 2. तत्पश्चात उसे प्राप्त करने का मार्ग यानी कर्मयोग का ज्ञान देते हैं। यह स्वाभाविक भी है कि जब तक लक्ष्य पता न हो चलने का औचित्य क्या! 3. फिर श्रीकृष्ण त्याग, उपासना, वैराग्य और सन्यास को समझाते हैं जिससे होते हुए हम अंतिम लक्ष्य यानी अपनी आत्मा तक पहुंचते हैं 4.श्रीकृष्ण व्यक्ति के पतन का कारण भी बताते हैं...

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 72

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 72 ----------------------------------------------- एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।  स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥ हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है  ॥72॥  ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः           इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन के आग्रह पर उस व्यक्ति के लक्षण अथवा उस व्यक्ति की विशेषताओं को बताए हैं जिसे अर्जुन स्थितप्रज्ञ कहता है, जिसे हम बोलचाल में सिद्ध पुरुष कहते हैं या फिर जिसे REALIZED MASTER अर्थात जिसने सब प्राप्त कर लिया है । क्या इस संसार में ऐसा भी कोई होता है जिसे सबकुछ प्राप्त हो? हाँ , होता है। उसके पास सांसारिक वस्तुओं का सांसारिक नजर से अभाव या प्रचुरता तो हो सकती है लेकिन इस व्यक्ति को सबकुछ इस कारण प्राप्त होता है क्योंकि उसे स्...

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 71

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 71 -------------------------------------------------- विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।  निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥ जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है  ॥71॥ श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षणों को विस्तार से समझाने के पश्चात एक बार पुनः बताते हैं कि  1. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को कोई कामना नहीं होती, क्योंकि हम पहले ही देख चुके हैं कि उसकी इन्द्रियाँ पूर्ण रूप से बुद्धि के नियंत्रण में होती हैं, 2.यह व्यक्ति अहंकार और ममता से मुक्त होता है, उसके अंदर ""मैं""का भाव नहीं होता  क्योंकि उसका मैं तो सम्पूर्ण संसार के साथ मिला हुआ है, 3. उस व्यक्ति को किसी भी चीज को धारण करने की यानी पोजेसिवनेस की भावना नहीं होती, उसका कोई #MY# यानी "मेरा" नहीं होता, उसे किसी भी वस्तु , व्यक्ति आदि से कोई लगाव यानी ATTAcHMENT नहीं होता है।        इन्हीं गुणों से लैस व्यक्ति को शांति मिल पाती है क्योंकि तब ...

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 70

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 70 ------------------------------------------------ आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-  समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌।  तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे  स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं  ॥70॥ अब श्रीकृष्ण स्तित्प्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए कहते हैं जिस प्रकार नदियों के समुद्र में गिरने से समुद्र को फर्क नहीं पड़ता है उसी प्रकार जो व्यक्ति अपने आत्मा में स्थिर होता है उसे कोई कोई कामना नहीं होती, उसकी इन्द्रियाँ पूर्ण नियंत्रण में होती हैं,  मन बुद्धि के वश में होता है उसे कोई भोग प्राप्त भी हो तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, उससे आप कुछ सुविधा वापस भी ले लें तब भी उसपर कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन जिन व्यक्तियों के अंदर कामनाएँ होती हैं, नई कामनाओं के लिए कामनाएँ होती हैं वे त...

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 69

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 69 ------------------------------------------------- या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।  यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥ सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है  ॥69॥ स्थितप्रज्ञ मनुष्य की विशेषताओं का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि सेल्फ/आत्मा/स्व का ज्ञान नहीं होना ही अंधकार है और इसका ज्ञान होना प्रकाश है। रात्रि अंधकार का और दिन प्रकाश का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंधकार वो अवस्था है जिसमें सबकुछ अस्पष्ट होता है, ढँका होता है , कुछ भी दिखता नहीं है, चीजों में भेद करना नहीं हो पाता, वे फहचान में नहीं आ पाती हैं। इस अवस्था में सामान्य व्यक्ति जो संसार में ही रमा बसा है वह कुछ नहीं समझ पाता और ऐसा लगता है कि सुसुप्ता अवस्था में होता है। यह आज्ञान की अवस्था होती है क्योंकि कुछ सूझता नहीं है। यह आज्ञान आखिर है क्या? विभ...

SHRIMADMAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 68

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 68 ----------------------------------------------- तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।  इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है  ॥68॥ इतनी व्यख्या करने के पश्चात श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस व्यक्ति का इन्द्रियों पर सब प्रकार से नियंत्रण होता है वही स्थिर बुद्धि होता है अर्थात जिसका नियंत्रण अपनी इन्द्रियों पर नहीं है उसका पतन निश्चित है। यह नियंत्रण जबरन नहीं बल्कि कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार ही होना चाहिए तभी ये नियंत्रण चिरस्थाई होता है। इस तरह के व्यक्ति की बुद्धि इन्द्रीयिओं के विषय से अलग होती है और बुद्धि बड़े लक्ष्य की पूर्ति में लगी होती है। इस तरह का व्यक्ति सभी इन्द्रियों के साथ रहते हुए भी अपने स्व /आत्मा/सेल्फ में स्थिर रहता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 68 ----------------------------------------------- तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।  इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है  ॥68॥

SHRIMADBHADWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 67

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 67 ---------------------------------------- इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।  तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥ क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है  ॥67॥ आगे श्रीकृष्ण समझते हैं कि इस प्रकार के अयुक्त व्यक्ति की इन्द्रियाँ बिना किसी नियंत्रण के, बिना किसी लगाम के अपने विषयों में डूबी रहती हैं। एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि उच्च जीवन लक्ष्यों के साथ  मन को नियंत्रित करती है और मन इन्द्रियों को वश में रखता है लेकिन अयुक्त व्यक्ति के साथ उल्टा होता है, विषयों में डूबी इन्द्रियाँ मन को उधर ही खिंचती हैं और इस प्रकार विषयों में रमा मन बुद्धि को भी उसी में डुबाये रखता है और बुद्धि उच्च लक्ष्यों से दूर विषयों में डूबी रहती है। ऐसी स्थिति में बुद्धि विषयों में डूब कर उसको तर्क से सही साबित करने का प्रयास करती है। इस प्रकार बुध्दि अपना काम छोड़कर मन की कामना और इन्द्रियों की वासना...

व्यक्ति के पतन का कारण:श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 62, 63, 66, 67

व्यक्ति के पतन का कारण ---------------------------- ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।  संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है  ॥62॥ क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।  स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है  ॥63॥ अब श्रीकृष्ण इन्द्रियों में आसक्ति के कारण व्यक्ति के पतन की प्रक्रिया को भी समझाते हैं। उन्होंने बहुत ही आसान तरीके से समझाया है कि इन्द्रियों के राग रस में डूबे रहने के कारण किस प्रकार मनुष्य का पतन होता है। यह बहुत ही स्वाभाविक सी बात है कि हम जिस चीज के बारे में बहुत चिंतन करते हैं उनके प्रति हमारे मन में आसक्ति का भाव जन्म लेता है। वाह्य संसार की अनु...

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 66

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 66 ------------------------------------------------- नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।  न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌॥ न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?  ॥66॥ अब तक श्रीकृष्ण बता चुके हैं मनुष्य को परम् शांति और सुख तभी मिलता है जब मनुष्य कर्मयोग का आचरण करता हुआ अपने मन और  इन्द्रियों पर नियंत्रण रखता है। ऐसा व्यक्ति अपने स्व यानी सेल्फ यानी आत्मा में ही निष्ठ रतात अवस्थित रहता हुआ परम् सुख और शांति की स्थिति में रहता है। इस तरह के व्यक्ति को कोई कामना नहीं होती है। इस व्यक्ति को कोई कामना इसलिए नहीं होती है क्योंकि उसे अपना ही स्व मिल चुका होता है, उसे अपनी आत्मा से तारतम्य हो चुका होता है जिसके कारण उसे वह सुख, शांति, और आनंद मिल चुका होता है जिसके आगे कोई और सुख शांति या आनंद की इक्षा शेष नहीं होती। कामना रहित यह व्यक्ति अपनी इन्द्रियों पर...

SHRI MADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 64 & 65

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 64 & 65 ----------------------------------------------------- रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌।  आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥ परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है  ॥64॥ प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।  प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥ अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है  ॥65॥ व्यक्ति को पतन से बचने का जो रास्ता श्रीकृष्ण सुझाते हैं वह रास्ता भी कर्मयोग का ही है। श्रीकृष्ण पूर्व में कर्मयोग की बुद्धि को बताते हुए कहा चुके हैं कि परिणामों पर निर्भरता ही दुखों का कारण होता है और परिणामों पर सुख प्राप्त करने की ये निर्भरता इसलिए होती है क्योंकि हम समझते हैं हमारे सुख शांति और आनंद का स्रोत हमसे बाहर कार्य के परिणाम पर निर्भर होता ह...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 54 से 61--स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण

श्रीमद्भागवद्गीता  अध्याय 2 श्लोक 54 से 61 ----------------------------------------------------- स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण -------------------------------------   स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा  श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 54  अर्जुन उवाच  स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।  स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥ अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? ।।54।। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का अर्थ समझाया जिसके परिणाम में व्यक्ति परम् शांति, और अपने स्व को प्राप्त होता है। इस ज्ञान को पाकर अर्जुन के अंदर एक स्वाभाविक उत्कंठा उत्पन्न होती है। यदि हम कोई बात , कोई व्याख्यान बहुत मनोयोग से सुनते और समझते हैं तो हमारे अंदर और आगे जानने की इक्षा होती है, कई तरह के प्रश्न मन में उठते हैं। चूँकि श्रीकृष्ण की बात को अर्जुन ध्यान से सुन रहा है सो स्पष्टता के लिए वह आगे का प्रश्न भी कर देता है। अर्जुन के प्रश्न के मु...

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 62 & 63

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 62 & 63 –--–----------------------------------- व्यक्ति के पतन का कारण ---------------------------- ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।  संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है  ॥62॥ क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।  स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है  ॥63॥ अब श्रीकृष्ण इन्द्रियों में आसक्ति के कारण व्यक्ति के पतन की प्रक्रिया को भी समझाते हैं। उन्होंने बहुत ही आसान तरीके से समझाया है कि इन्द्रियों के राग रस में डूबे रहने के कारण किस प्रकार मनुष्य का पतन होता है। यह बहुत ही स्वाभाविक सी बात है कि हम जिस चीज के बारे में बहुत ...

SHRI MADBHAGWADGEETA CHAPTER 2 SHLOKA 61

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोकन 61 ---------------------------------------------------- तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।  वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है  ॥61॥ अर्जुन के इस प्रश्न पर कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं श्रीकृष्ण उसे स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण समझाते हुए अब तक बताए हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण 1.कामना का सर्वथा अभाव 2.आत्मा में ही आत्मसंतुष्टि 3.सुख, दुख, राग, भय और क्रोध से मुक्त, 4.स्नेहरहित,शुभ अशुभ रहित, प्रसन्नता और द्वेष से रहित 5.इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण 6.इन्द्रियों की विषयों से अनासक्ति       उपरोक्त से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों पर नियंत्रण की शिक्षा दे रहें हैं क्योंकि इन्द्रियों पर नियंत्रण से ही उपरोक्त गुणों की प्राप्ति सम्भव है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जबरन इन्द्रियों पर नियंत्रण...

स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण

स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण 1.कामना का सर्वथा अभाव 2.आत्मा में ही आत्मसंतुष्टि 3.सुख, दुख, राग, भय और क्रोध से मुक्त, 4.स्नेहरहित,शुभ अशुभ रहित, प्रसन्नता और द्वेष से रहित 5.इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण 6.इन्द्रियों के विषयों से अनासक्ति

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 59, 60

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 59,60 -------------------------------------------- विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।  रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥ इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है  ॥59॥ यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।  इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥ हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं  ॥60॥ 6.  .श्रीकृष्ण अर्जुन को स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए एक बार पुनः इन्द्रियों पर नियंत्रण की महत्ता को निरूपित करते हुए बताते हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का इन्द्रियों पर इस तरह का नियन्त्रण होता है कि उसकी आसक्ति सदा के लिए समाप्त हो जाता है।      इसको समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण र...

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 58

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 58 ------------------------------------------------- यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः।  इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ और कछुवा सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिए)  ॥58॥ 5. जब व्यक्ति का कर्म स्वधर्म के अनुसार होता हो, जब कर्म समर्पण और श्रद्धा से हो, जब कर्म में आनंद की अनुभूति हो, जब कर्मों के परिणाम में समत्व का भाव हो तो निश्चित ही ऐसे व्यक्ति का अपने इन्द्रियों यानी सेंसेज पर भी पूर्ण नियंत्रण होगा ही। बिना इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण के कर्मयोग का अभ्यास भी असम्भव है। और यदि ये इन्द्रियाँ बाह्य जगत के क्रिया कलाप से नियंत्रित होंगी तो फिर कर्मयोग की शिक्षा का कोई अर्थ ही नहीं। चूँकि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वाह्य परिणामों और कारकों से अप्रभावित रहता है , यह उसी स्थिति में सम्भव है जब व्यक्ति का अपने इन्द्रियों के क्रियाकलापों पर पूर्ण नियन्त्रण हो, अर्थात इन्द्रियाँ व्यक्ति को नहीं चला...

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 57

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 57 ------------------------------------------------ यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌।  नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है  ॥57॥ 4. कर्मयोग की बुद्धि को बताते समय श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म करने में परिणामों के प्रति समत्व का भाव होना चाहिए अर्थात सभी तरह के परिणाम में स्थिर होना चाहिए, चाहे वो अच्छे हों या बुरे। साथ ही उन्होंने ये भी समझाया है कि जो भी परिणाम आये उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और पूर्ण समर्पण और श्रद्धा के साथ स्वधर्म के अनुसार अपना कर्म करते रहना चाहिए। इस तरह की बुद्धि से युक्त व्यक्ति को न तो किसी से लगाव होता है न विलगाव यानी इस तरह का व्यक्ति स्नेह रहित होता है। स्नेह तो तब होता है जब लगाव हो अर्थात अटैचमेंट हो। यँहा ध्यान देने की बात है कि श्रीकृष्ण ने स्नेह से रहित होने की शिक्षा दी है न कि विलगाव से रहित होने की। अर्थात श्रीकृष्ण ने पॉजिटिव रूप से बातों को कहा है यानी ...

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 56

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 56 ----------------------------------------------- दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।  वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥ दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है  ॥56॥ 2. श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए आगे बताते हैं कि यह व्यक्ति दुखों से उद्वेलित नही। होता है और न ह सुखों में अतिरेक उत्साह ही होता है उसे।      वस्तुतः सुख और दुख लगाव यानी ATTACHMENT के परिणाम होते हैं। जब हम परिणाम की कामना से मुक्त होकर स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं तो कर्म से कोई लगाव नही। होता है बल्कि कर्म हम इसलिए करते है क्योंकि वह करना हमारा स्वधर्म है। ऐसी स्थिति में हम कर्मों के परिणाम से नहीं बंधे होते हैं। जब परिणाम से हमारे कर्म बंधे नहीं हों तो फिर परिणाम से सुख या दुख भला कैसे मिल सकता है। सो यह व्यक्ति इस बात से प्रभावित ही नही होता है कि जो परिणाम उसे मील रहें हैं...

SHRIMASBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 55

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 55,  श्रीभगवानुवाच  प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌।  आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥ श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है  ॥55॥          अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण उस व्यक्ति के विशेषताओं को बताना प्रारम्भ करते हैं जो स्थितप्रज्ञ है अर्थात जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है , जिसे हम REALIZED MASTER कहते हैं।           पूर्व में हम देख चुके हैं कि श्रीकृष्ण ने समझाया है कि कर्मयोग की बुद्धि से युक्त व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसके कर्म की निम्न विशेषताएँ होती हैं:-- 1. स्वधर्म के अनुसार ही कर्म करना चाहिए, न कि किसी की नकल कर या न कि पसन्द नापसन्द के आधार पर।अगर हम अपनी अच्छाई चाहते हैं तो हमारे कर्म दूसरों की अच्छाई के लिए ही होना चाहिए। 2.परिणाम के सम्बंध में समत्व का भाव रखना अनिवार्य है अर्थात हर परिणाम के प्रति ...

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 54

  स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा  श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 54  अर्जुन उवाच  स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।  स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥ अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? ।।54।। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का अर्थ समझाया जिसके परिणाम में व्यक्ति परम् शांति, और अपने स्व को प्राप्त होता है। इस ज्ञान को पाकर अर्जुन के अंदर एक स्वाभाविक उत्कंठा उत्पन्न होती है। यदि हम कोई बात , कोई व्याख्यान बहुत मनोयोग से सुनते और समझते हैं तो हमारे अंदर और आगे जानने की इक्षा होती है, कई तरह के प्रश्न मन में उठते हैं। चूँकि श्रीकृष्ण की बात को अर्जुन ध्यान से सुन रहा है सो स्पष्टता के लिए वह आगे का प्रश्न भी कर देता है। अर्जुन के प्रश्न के मुख्य भाग निम्न हैं--- 1.समाधि में अवस्थित स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की परिभाषा/लक्षण क्या हैं? 2.वह स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है।   ...