श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 66
-------------------------------------------------
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥
न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
॥66॥
अब तक श्रीकृष्ण बता चुके हैं मनुष्य को परम् शांति और सुख तभी मिलता है जब मनुष्य कर्मयोग का आचरण करता हुआ अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखता है। ऐसा व्यक्ति अपने स्व यानी सेल्फ यानी आत्मा में ही निष्ठ रतात अवस्थित रहता हुआ परम् सुख और शांति की स्थिति में रहता है। इस तरह के व्यक्ति को कोई कामना नहीं होती है। इस व्यक्ति को कोई कामना इसलिए नहीं होती है क्योंकि उसे अपना ही स्व मिल चुका होता है, उसे अपनी आत्मा से तारतम्य हो चुका होता है जिसके कारण उसे वह सुख, शांति, और आनंद मिल चुका होता है जिसके आगे कोई और सुख शांति या आनंद की इक्षा शेष नहीं होती। कामना रहित यह व्यक्ति अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण में रखता है । इस स्थिति में व्यक्ति के सेनेज/इन्द्रियाँ उतना ही अनुभव उसे सम्प्रेषित कर पाती हैं जितना वह चाहता है। तब इन्द्रियाँ मन के वश में नहीं होती। मन पूरी तरह से स्थिर होता है । उसे इधर उधर भागने की जरूरत नहीं होती है क्योंकि यह व्यक्ति अपनी इन्द्रियों के माध्यम से कोई सुख प्राप्ति की कामना रखता है नहीं। स्थिर मन इस व्यक्ति की बुद्धि भी परमात्मा में एक निष्ठ स्थिर होती है, भटकती नहीं। इस तरह के व्यक्ति को इस अवस्था में आनंद की प्राप्ति होती है जिसे श्रीकृष्ण ने प्रसाद कहा है जिसे प्राप्त व्यक्ति शांत चित्त हुआ, प्रसन्न और सुखी मन हुआ ध्यानरत हो पाता है। इस प्रक्रिया को श्रीकृष्ण ने पहले विस्तार से समझाया है।
अब वे आगे कहते हैं कि जिस व्यक्ति की ये अवस्था नहीं होती है अर्थात जिस व्यक्ति की अपने इन्द्रियों पर, मन पर कोई नियंत्रण नहीं होता है उसकी बुद्धि भी स्थिर नहीं होती है। इस तरह की विशेषता वाले व्यक्ति को आत्मज्ञान नहीं होता जिसके कारण उसका पतन होना तय होता है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के विपरीत यह व्यक्ति अयुक्त व्यक्ति होता है जिसकी बुद्धि, जिसके मन और जिसकी इन्द्रियाँ एक लड़ी में नहीं होती हैं बल्कि सभी तीनों एक दूसरे से स्वतंत्र इधर उधर भटकती रहती हैं। न बुद्धि स्थिर रहती है। बुद्धि भटकती रहती है, कभी इधर सुख खोजती है, कभी उधर। इस कारण बुद्धि मन को नियंत्रित नहीं कर पाती। अनियंत्रित मन का इन्द्रियों पर कोई वश नहीं होता और इन्द्रियाँ उच्छऋंखल व्यवहार पर उतर आती हैं। इस तरह के व्यक्ति का जीवन इन्द्रियों के वश में होता है , हमेशा अनिश्चित इक्षाओं के पीछे भागता रहता है। नतीजा ये होता है कि व्यक्ति का जीवन तरह तरह की कामना पूर्ति के प्रयासों का झुंड बन कर रह जाता है और अंततः बिखर जाता है। इस तरह अस्थिर चित्त हुआ व्यक्ति आत्मज्ञान नहीं पा सकता क्योंकि उसकी इक्षाएँ, उसका मन और उसकी बुद्धि एक ही समय में सभी दिशाओं में भटकती रहती है। उसे भौतिक मैटर में ही लक्ष्य दिखता है जबकि भौतिक मैटर तो निष्प्राण हैं। भौतिक मैटर को एक पहचान जीवन देता है। यह जीवन मैटर को आत्मा से प्राप्त होता है जो मैटर का सेल्फ होता है। निष्प्राण भौतिक मैटर को जीवन उसका सेल्फ देता है। यदि सेल्फ की पहचान नही हो पाई तो प्राणी भी जीवित रहकर भी भौतिक मैटर का समूह भर रह कर हो जाता है, उसके अंदर कोई भावना यानी ध्यान की क्षमता ही नहीं पनप पाती है। अतएव स्थिर बुद्धि होने के लिए अनिवार्य है कि हम अपनी आत्मा को , अपने स्व, अपने सेल्फ को पहचाने तभी हम वह सब कर सकते है जो एक ज्ञानी व्यक्ति को करना चाहिए अन्यथा हम कुछ नहीं कर पाते और इन्द्रियाँ हमसे कराती रहती हैं , हम कामनाओं के पीछे इधर उधर भागकर मृत्यु की तरफ अकारण ही बढ़ते जाते हैं।
सो जरूरी है कि हम स्व को पहचाने और ध्यानरत हों। अगर ऐसा नहीं कर पाते तो जीवन में शांति नहीं मिल पाती। ये वो शांति होती है जिसके पश्चात कोई विवाद, कोई संघर्ष नहीं , कोई युद्ध नहीं। इसी अवस्था में परम् सुख मिल पाता है। विवाद, संघर्ष, युद्ध से रहित शांत मन जो स्व प्राप्त ध्यान से सम्भव है परम् सुख देता है । स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इसी अवस्था में होता है।
अगर व्यक्ति ऐसा करने से बचता है, बुद्धि, मन और इन्द्रियों को एक लड़ी में नहीं ला पाता है, यानी कर्मयोग की बुद्धि से क्रियाशील नहीं हो पाता है तो उसका विखराव, उसका पतन अवश्यम्भावी है।