गीता अध्याय 2 श्लोक 53
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श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥
भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा
॥53॥
अब श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि की पराकाष्ठा बताते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर जिज्ञासा होती है, जानने की इक्षा होती है। यही जिज्ञासा व्यक्ति को अन्वेषण के मार्ग पर ले जाती है। इस संसार में कर्म करने के सम्बंध में भी तरह तरह के सिद्धान्त, ज्ञान मौजूद हैं। व्यक्ति अपने जिज्ञासा वश इनके सम्पर्क में आता है और भाँती भाँति के तर्कों को सुनकर, जानकर दिग्भ्रमित भी हो जाता है। किंतु यदि वह अपनी बुद्धि कर्मयोग में स्थिर करता है और अब तक बताए गये मार्ग पर चलता है तो उसकी बुद्धि का भ्रम दूर होता है जैसा कि पूर्व की चर्चा से स्पष्ट हो जाता है। जब बुद्धि का भ्रम छँट जाता है तो उसे पता चलता है कि उसका सेल्फ/स्व/उसकी आत्मा क्या है, उसे ज्ञात होता है कि वह वास्तव में कौन है। उसे समझ में आ जाता है कि वह देह नहीं है, दिमाग भी नहीं है, किसी कुल का प्रतिनिधि भी नहीं है , किसी जाति और धर्म का सदस्य नहीं है, कोई पेशेवर नहीं है बल्कि वह तो विशुद्ध आत्मा यानी परमात्मा स्वरूप ही है। ये बात पढ़कर, रट कर समझने की बात नहीं है बल्कि कर्मयोग के रास्ते चलकर अनुभूत करने वाला ज्ञान है और इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद इस व्यक्ति की बुद्धि संसार से मुक्त होकर परमात्मा में स्थिर हो जाती है यानी व्यक्ति की आत्मा और परमात्मा का संयोग हो जाता है। यही अवस्था योग की है। उसी अवस्था में व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ कर्म भी करता है जिसका एकमात्र उद्देश्य जनकल्याण ही होता है क्योंकि ईश्वर जन जन में होता है। यह बात वह व्यक्ति पढ़कर , रट कर नहीं बल्कि अनुभूति कर समझता है।
इसकी प्रक्रिया को समझने की आवश्यकता है। इसे निम्न चरणों में सरलता से समझा जा सकता है।
(1) व्यक्ति स्वाभाविक रूप से जिज्ञासु होता है। जिज्ञासा की हद तो देखिए, दूध पीता शिशु भी चाँद और तारों की जिद्द करता है। आप खुद देख लें कि व्यक्ति अपने शैशव अवस्था से ही कितना कुछ जानने के लिए विकल रहता है।
(2) अब समझने वाली बात है कि सत्य तो एक ही होता है, बाकी सब असत्य ही होते हैं। हर व्यक्ति इस सत्य को पकड़ने और जानने के लिए प्रश्नवाचक मानसिकता/बौद्धिकता लिए अपनी समझ के अनुसार सत्य खोजते रहता है।
(3) व्यक्ति की जिज्ञासा उसे तरह तरह के ज्ञान और अनुभव से रु ब रु कराती है। लेकिन होता ये है कि सत्य पाने की जगह वह इन भाँति भाँति के ज्ञान और अनुभव के चक्कर में पड़कर भ्रम और आज्ञान का शिकार हो जाता है। इस अवस्था में उसकी भ्रमित बुद्धि उसे एकलौते सत्य से दूर लेकर चली जाती है। आज भी आप सामाजिक विज्ञान पढिये या दर्शन या भौतिकी, रसायन या जीवशास्त्र, आप हम सब अंतिम सत्य की खोज में लगे होते हैं लेकिन ज्ञान के नाम पर अज्ञानता के कचड़े में फंस जाने की वजग से सत्य तक नहीं पहुँच पाते।
(4) अज्ञानता के मकड़जाल में फड़फड़ाते हम सब तो अर्जुन हीं है न! श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि इतने अज्ञानता से पार पाना है तो हमें कर्मयोग की बुद्धि पर भरोसा करना होगा जो अपने तकनीक से हमारी बुद्धि के भ्रम और भ्रम की जननी माया को समाप्त कर देता है। तब हम सत्य को देख पाते हैं। तब हमारी जिज्ञासाएँ शांत होने लगती हैं क्योंकि तब हमें अपने प्रश्नों के विश्वसनीय उत्तर मिलने लगते हैं।
(5) जिज्ञासा के शांत होने से बुद्धि भी शान्त होती है, प्रश्न करने की ललक कम होती है क्योंकि तब एक एक कर हमारे प्रश्न खत्म होते जाते हैं , उनके उत्तर मिल जाते हैं।
(6) इस प्रकार से शांत चित्त की अवस्था में हमें वैराग्य का ज्ञान होता है और हम अपने स्व को समझने की योग्यता पाते हैं।
(7) अब स्व को समझ कर हम जीवन का समाधान कर सकते हैं यानी समाधिस्थ हो जाते हैं।
(8) समाधि की इस अवस्था में हम जान पा लेते हैं कि हम किस तरह से परमात्मा के ही अंश हैं, हमारी आत्मा परमात्मा के साथ संयोग कर लेती है।
(9) ये वो अवस्था है जब हमारे सारे कर्म परमात्मा को अर्पित हो जाते हैं । इस अवस्था में हम न केवल अपने अंदर को खोज पाते हैं बल्कि बाहरी संसार के रहस्यों को भी सहजता से समझ सकते हैं।
(10) ये अवस्था कर्मयोग की बुद्धि की पराकाष्ठा है।
आगे श्रीकृष्ण इसी तरह से कर्मयोग के सैद्धान्तिक पहलुओं और इसके क्रियात्मकता को और भी स्पष्ट करते हैं, जिसके लिए हमें थोड़ा धैर्य रखना होगा।