श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 54 से 61
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स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण
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स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 54
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥
अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? ।।54।।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का अर्थ समझाया जिसके परिणाम में व्यक्ति परम् शांति, और अपने स्व को प्राप्त होता है। इस ज्ञान को पाकर अर्जुन के अंदर एक स्वाभाविक उत्कंठा उत्पन्न होती है। यदि हम कोई बात , कोई व्याख्यान बहुत मनोयोग से सुनते और समझते हैं तो हमारे अंदर और आगे जानने की इक्षा होती है, कई तरह के प्रश्न मन में उठते हैं। चूँकि श्रीकृष्ण की बात को अर्जुन ध्यान से सुन रहा है सो स्पष्टता के लिए वह आगे का प्रश्न भी कर देता है। अर्जुन के प्रश्न के मुख्य भाग निम्न हैं---
1.समाधि में अवस्थित स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की परिभाषा/लक्षण क्या हैं?
2.वह स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वो है जिसका ज्ञान स्थिर है अर्थात ऐसा व्यक्ति जिसे अंतिम सत्य प्राप्त हो चुका है। हम सब जानते हैं कि हमारा ज्ञान निरन्तर परिष्कृत होता है। इस संसार के विषय में हम जितना पहले जानते थे उससे अधिक आज जानते हैं , और भविष्य में आज से भी अधिक जानेंगे। संसार नित्य परिवर्तनशील है सो इससे सम्बन्धित हमारा ज्ञान भी परिवर्तनशील होता है। वैज्ञानिक ज्ञान भी जिसके माध्यम से हम संसार की गतिविधि को समझते हैं वो निरन्तर परिष्कृत होते रहता है। इस ज्ञान का कोई और छोर नहीं है, इसका कोई अंत नहीं। हम जितना जानते हैं उससे कई गुणा नहीं जानते हैं जिसे जानने के लिए हम नियमित अग्रसर रहते हैं। न तो प्रकृति में होने वाले परिवर्तन रुकेंगे, न ही हमारा प्रकृति का ज्ञान। सो भौतिक संसार का ज्ञान प्राप्त कर कोई भी अंतिम रूप से ज्ञानी नहीं हो सकता, सो ऐसे व्यक्ति का कोई अंतिम ज्ञानी हो ही नहीं सकता । अतएव इस तरह के व्यक्ति के सम्बंध में अर्जुन का कोई प्रश्न नहीं हो सकता है।
तो फिर कौन व्यक्ति स्तित्प्रज्ञ कौन है? स्तित्प्रज्ञ वो है जिसे अपरिवर्तनीय का ज्ञान प्राप्त है। अपरिवर्तनशील क्या है? अपरिवर्तनशील, अक्षय, अविकारी हमारा सेल्फ है, हमारा स्व है, हमारी आत्मा है और जो अपने सेल्फ को जनता है वही स्थितप्रज्ञ है। यदि हम खुद को परिभाषित करते हैं तो हम खुद की वर्तमान स्थिति बताते हैं। ये स्थिति बदलती रहती है। लेकिन जो व्यक्ति नियत रास्ते पर चलकर , जो कर्मयोग का रास्ता है अपने स्व/सेल्फ/आत्मा के अस्तित्व को पहचान लेता है वही स्थितप्रज्ञ कहलाता है। अर्जुन इसी व्यक्ति की रहनी को समझना चाहता है।
जो व्यक्ति उपरोक्त ढंग से स्थितप्रज्ञ है वो निश्चित ही समाधिस्थ है। समाधि में अवस्थिति का क्या अर्थ है? जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग समझा रहे होते हैं तो बताताते हैं कि कर्मयोगी विरागरत होता है। यही विराग समाधि की अवस्था होती है। समाधि की अवस्था ध्यान केंद्रित करने की अवस्था से भिन्न है। ध्यान केंद्रित करना एक मानसिक अवस्था होती है जिसमें हमारा ध्यान किसी एक चीज पर केंद्रित होता है, उसके अतिरिक्त किसी अन्य चीज पर नहीं। लेकिन इस अवस्था में व्यक्ति कर्मयोग की दृष्टि से भी विरागरत होता हो कोई आवश्यक नहीं, सो ध्यान की यह क्रिया जिसमें वैराग्य का भाव ही नहीं हो एक तन्द्रा मात्र है जिसके टूटते व्यक्ति फिर से उसी परिवर्तनशील संसार के मोहजाल, उसी परिणाम की दुनिया में लौट जाता है। लेकिन जब व्यक्ति कर्मयोग की दृष्टि से कर्म करते करते परिणाम के प्रभाव से मुक्त होकर वैराग्य की अवस्था में आता है तब उसको ध्यान केंद्रित नहीं करना पड़ता बल्कि वो तो सोते जागते अपने ही आत्मा में , अपने ही सेल्फ में रहता है। यही समाधि की स्थिति है। समाधि की स्थिति भभूत लगागकर, दाढ़ी मूँछ बढाकर, जटा लटकाकर, विचित्र भेष भूषा धारण कर नहीं मिलता है।
इस प्रकार जो स्थितप्रज्ञ है वो समाधिस्थ भी है हीं। यदि हम भी अपने सेल्फ को समझना जानना चाहते हैं तो ये आवश्यक है कि हम इस प्रकार के व्यक्ति के लक्षणों को जाने समझें और आत्मसात करें। सो अर्जुन इस तरह के व्यक्ति के लक्षणों को जानने की इक्षा व्यक्त करता है।
अर्जुन जानना चाहता है कि इस प्रकार का स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे बोलता, बैठता और चलता है अर्थात वह जानना चाहता है कि इस प्रकार के व्यक्ति की रहनी कैसी होती है, उसका सामाजिक समव्यव्हार कैसा होता है। अर्थात यह व्यक्ति अपना सामाजिक जीवन कैसे व्यतीत करता है, अपने वातावरण से उसका सामाजिक लेन देन किस तरह से होता है।
यदि कोई व्यक्ति किसी लक्ष्य तक पहुँचना चाहे तो दो बातें अनिवार्य हैं
1. पहला तो उसे लक्ष्य स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए, उसे स्पष्ट होना चाहिए कि दरअसल वो चाहता क्या है।
2.दूसरे की उसका लक्ष्य ही उसकी प्रेरणा हो। जब लक्ष्य प्रेरणा में बदल जाता है तो लक्ष्य स्वपोषित हो जाता है। उस स्थिति में व्यक्ति को किसी अन्य उत्प्रेरक या प्रेरणाश्रोत की आवश्यकता नही रह जाती है। वह स्वतः हो उस लक्ष्य की ओर बढ़ा चला जाता है। गीताकार ने अर्जुन के माध्यम से हमें समझाया है कि हम किस तरह से अपने को अपने सेल्फ को खोजने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। ध्यान रहे कि किसी भी चीज को देखने का दो नजरिया होता है। एक कि हम खुद उसे कैसे देखते हैं। और दूसरा की अन्य लोग उस चीज को कैसे देखते हैं। जब हम स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षणों को जानना चाहते हैं तो एक नजरिया तो यह है कि वह स्थितप्रज्ञ व्यक्ति खुद को कैसे और किस रूप में देख पाता है और दूसरे कि हम उसे किस तरह से समझ पाते हैं।
सवाल उठता है कि अर्जुन इस प्रकार का प्रश्न ही क्यों करता है। जब हम गहरे विषाद की अवस्था में होते हैं और यदि उस समय हमें कर्मयोग सदृश्य समझ दी जाती है तो सहज ही कई प्रश्न मन में उठने लगते हैं, यथा हमें कर्म न कर मात्र बुद्धि के ही शरण में क्यों नही रहना चाहिए, क्यों हम वैराग्य और सन्यास की बात करें, क्यों न हम भी सारे जंजाल को छोड़कर वैराग्य और समाधि का मार्ग पकड़ लें, आदि आदि। हम सब वैराग्य और समाधि के उन प्रचलित अर्थों से ही वाकिफ होते हैं जो समाज में बोल चाल की भाषा में प्रचलित हैं। हम श्रीकृष्ण की शब्दावली में इनका अर्थ नहीं समझ पा रहे होते हैं। दृष्टि को साफ कर देने के लिए, समझ से भ्रांति को दूर करने के लिए ये जरूरी है कि हम जाने कि श्रीकृष्ण जिस अवस्था को प्राप्त करने की शिक्षा दे रहें हैं उस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति क्या और कैसे कुछ भी करता धरता है।
अर्जुन का प्रश्न हमारी समझ को झझकोरता है, उद्वेलित करता है, हमें प्रेरित करता है कि कर्मयोग का व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात हम समझ सकें कि हमे किस तरह के व्यक्ति के रुप में विकसित होना चाहिए।
जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग की बुद्धि को समझा देते हैं तो अर्जुन उस व्यक्ति की विशिष्टताओं को जानने की इक्षा व्यक्त करता है कि जो कर्मयोग की बुद्धि से युक्त होता है। तब श्रीकृष्ण इस तरह के व्यक्ति के विशेषताओं को भी बताते हैं जो निम्न हैं-
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण
1.कामना का सर्वथा अभाव
2.आत्मा में ही आत्मसंतुष्टि
3.सुख, दुख, राग, भय और क्रोध से मुक्त,
4.स्नेहरहित,शुभ अशुभ रहित, प्रसन्नता और द्वेष से रहित
5.इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण
6.इन्द्रियों के विषयों से अनासक्ति
इनको समझाते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 55,
श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
श्री भगवान् बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है
॥55॥
अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण उस व्यक्ति के विशेषताओं को बताना प्रारम्भ करते हैं जो स्थितप्रज्ञ है अर्थात जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है , जिसे हम REALIZED MASTER कहते हैं।
पूर्व में हम देख चुके हैं कि श्रीकृष्ण ने समझाया है कि कर्मयोग की बुद्धि से युक्त व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसके कर्म की निम्न विशेषताएँ होती हैं:--
1. स्वधर्म के अनुसार ही कर्म करना चाहिए, न कि किसी की नकल कर या न कि पसन्द नापसन्द के आधार पर।अगर हम अपनी अच्छाई चाहते हैं तो हमारे कर्म दूसरों की अच्छाई के लिए ही होना चाहिए।
2.परिणाम के सम्बंध में समत्व का भाव रखना अनिवार्य है अर्थात हर परिणाम के प्रति किसी तरह का लगाव नहीं रखना चाहिए।
3.कर्म करें तो उसे पूरे समर्पण की भावना से करें। सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करें। ईश्वर हर जीव में है, सो आपके कर्म करने की भावना में सभी के प्रति समर्पण के भाव हों यानी सभी जीवों के कल्याण की बात हो।किसी को हानि पहुँचाने की भावना नहीं हो। अगर हम कोई कर्म करते हैं तो इसके पीछे हमारी भावना या तो अपना ईगो या अन्य के ईगो को सन्तुष्ट करने की भावना होती है। इससे बाहर निकल कर हमारे कर्म सभी के प्रति समर्पित होने चाहिए अर्थात ईश्वर के प्रति समर्पित होने चाहिए।
4. परिणाम से लगाव नहीं रखना चाहिए। सही कर्म करें, परिणाम अच्छा या बुरा होगा बिना इससे लगाव रखे। अच्छा और बुरा तो होना ही है, हमारा काम है सही कर्म करना।
5.जो भी परिणाम मिले, सभी में समत्व की भावना रखते हुए, बिना उससे लगाव रखे उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।
उपरोक्त बुद्धि से युक्त व्यक्ति के कर्म उसे कर्मों के बंधन से मुक्त करते हैं और उसे अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा का ज्ञान होता है जिसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं । यही व्यक्ति वैरागी भी है, समाधि में अवस्थित भी है , और यही स्थितप्रज्ञ भी है। कर्मयोग की बुद्धि की उपरोक्त विशेषताओं में ही इस व्यक्ति की विशेषताएँ भी छिपी हैं जिनको अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण विस्तार से बताते हैं, ये विशेषताएँ निम्नवत हैं:--
1. इस व्यक्ति की कोई कामना अर्थात कोई इक्षा नहीं होती। जो व्यक्ति कर्म के परिणाम से अप्रभावित होता है , जिसे परिणाम प्रभावित नहीं कर पाते , जो हमेशा निर्लेप भाव से समत्व की बुद्धि से कर्म करता है उसके कर्मों में कोई कामना नहीं होती, कोई इक्षा नहीं होती है। वह कर्म किसी कामना पूर्ति के लिए नहीं करता है।
हमारी कामनाएँ मुख्य रूप से निम्न चीजों से जुड़ी होती हैं
क. अस्तित्व की रक्षा
ख. सुरक्षा
ग. ज्ञान की प्राप्ति
घ. सुख और आनंद की प्राप्ति
जब तक ये कामनाएँ रहती हैं हमारे कर्म भी इनकी पूर्ति के लिए ही लगे रहते हैं और हम कर्मों के परिणाम से बंधकर रहते हैं । तब न स्वधर्म की चिंता रह जाती है, न समर्पण की भावना जन्म ले सकती है। बस हम स्वार्थ वश इन कामनाओं की पूर्ति में लगे रहते हैं। ये हमारे जीवन का अंधकार युग होता है।
लेकिन कामनाओं से मुक्त व्यक्ति अपने स्व/सेल्फ/आत्मा में ही रचा बसा होता है जँहा वह सुख की , ज्ञान की प्राप्ति के लिए अपने बाहर के वातावरण पर , परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट होता है। चूँकि उसकी कोई कामना पूर्ति शेष ही नहीं होती सो यह व्यक्ति परम् संतुष्ट होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 56
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दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है
॥56॥
2. श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए आगे बताते हैं कि यह व्यक्ति दुखों से उद्वेलित नही। होता है और न ह सुखों में अतिरेक उत्साह ही होता है उसे।
वस्तुतः सुख और दुख लगाव यानी ATTACHMENT के परिणाम होते हैं। जब हम परिणाम की कामना से मुक्त होकर स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं तो कर्म से कोई लगाव नही। होता है बल्कि कर्म हम इसलिए करते है क्योंकि वह करना हमारा स्वधर्म है। ऐसी स्थिति में हम कर्मों के परिणाम से नहीं बंधे होते हैं। जब परिणाम से हमारे कर्म बंधे नहीं हों तो फिर परिणाम से सुख या दुख भला कैसे मिल सकता है। सो यह व्यक्ति इस बात से प्रभावित ही नही होता है कि जो परिणाम उसे मील रहें हैं वो प्रतिकूल हूं या अनुकूल। वह तो जो मिला उसी से संतुष्ट है। ऐसी स्थिति में कोई परिणाम उसके मन को उद्वेलित नहीं कर पाता है। वह तो आत्मा में ही लीन, अपने ही सेल्फ में रचा बसा हर हाल में चिर आनंद की अवस्था में होता है।
जिस व्यक्ति को दुख की अनुभूति होती है वह उससे छुटकारा चाहता है और जब उसी व्यक्ति को किसी अन्य परिणाम से सुख मिलता है तो वह चाहता है कि बार बार वही परिणाम दुहराया जाए उसके जीवन में। दुहराव की यह आकांक्षा उसे मोह से बंधता है। मोहयुक्त इंसान संसार चक्र से निकलना ही नहीं चाहता है। उसे वही सुख की उम्मीद जो लगी होती है।
इन सब के विपरीत कामनाओं से रहित व्यक्ति सुख और दुख के प्रभाव से मुक्त सेल्फ की अनुभूति में ही चिर आनंदित होते रहता है।
3. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को न तो राग होता है , न क्रोध, न भय। यँहा फिर उसी समत्व के भाव का असर दिखता है। कामना लगाव का परिणाम है और लगाव मोह से जन्म लेता है। यह मोह भ्रम से आता है। जब लगाव होता है तो हम परिणाम से बँधे होते हैं। यही लगाव हमें किसी चीज से अनुरक्त या विरक्त करता है। अनुरक्ति या विरक्ति दोनों ही लगाव के परिणाम हैं । जब जुड़ाव होता है तो उस जुड़ाव से विलग होने पर दुख होता है और उससे जुड़े रहने पर खुशी और सुख मिलता है। इस प्रकार यह लगाव ही राग है।
और यही लगाव डर भी जन्म देता है। जब लगाव होगा तो उससे विलग हो जाने का भय भी होगा।
और जब लगाव और राग की पूर्ति में बाधा आती है तो मन खिन्न हो उठता है और अंततः क्रोध का जन्म होता है।
लेकिन जिस व्यक्ति को कर्मयोग की बुद्धि प्राप्त है और जिसके कर्म इस बुद्धि के अनुसार हैं वह तो कामना और इक्षा रहित होकर परिणाम से मुक्त होकर कर्म करता है, तो फिर उसके कर्म भी निश्चित हैं। वह तो बाहरी परिस्थिति और अपने like के अनुसार कर्म करता ही नहीं है, बल्कि वह तो वो निश्चित कर्म करता है जो उसके स्वधर्म के अनुसार है। ऐसी स्थिति में कर्मों और परिणामों से उसे राग नहीं होता है, और न ही कुछ छूट जाने का भय और न ही किसी बाधा से उसे उत्तेजना ही होती है, सो वह बाहरी किसी भी कारक से अप्रभावित होता है। उसका मन मस्तिष्क एकदम शांत होते हैं अर्थात वह मन के स्तर पर मौन ही होता है सो मुनि कहलाता है।
2. श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए आगे बताते हैं कि यह व्यक्ति दुखों से उद्वेलित नही। होता है और न ह सुखों में अतिरेक उत्साह ही होता है उसे।
वस्तुतः सुख और दुख लगाव यानी ATTACHMENT के परिणाम होते हैं। जब हम परिणाम की कामना से मुक्त होकर स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं तो कर्म से कोई लगाव नही। होता है बल्कि कर्म हम इसलिए करते है क्योंकि वह करना हमारा स्वधर्म है। ऐसी स्थिति में हम कर्मों के परिणाम से नहीं बंधे होते हैं। जब परिणाम से हमारे कर्म बंधे नहीं हों तो फिर परिणाम से सुख या दुख भला कैसे मिल सकता है। सो यह व्यक्ति इस बात से प्रभावित ही नही होता है कि जो परिणाम उसे मील रहें हैं वो प्रतिकूल हूं या अनुकूल। वह तो जो मिला उसी से संतुष्ट है। ऐसी स्थिति में कोई परिणाम उसके मन को उद्वेलित नहीं कर पाता है। वह तो आत्मा में ही लीन, अपने ही सेल्फ में रचा बसा हर हाल में चिर आनंद की अवस्था में होता है।
जिस व्यक्ति को दुख की अनुभूति होती है वह उससे छुटकारा चाहता है और जब उसी व्यक्ति को किसी अन्य परिणाम से सुख मिलता है तो वह चाहता है कि बार बार वही परिणाम दुहराया जाए उसके जीवन में। दुहराव की यह आकांक्षा उसे मोह से बंधता है। मोहयुक्त इंसान संसार चक्र से निकलना ही नहीं चाहता है। उसे वही सुख की उम्मीद जो लगी होती है।
इन सब के विपरीत कामनाओं से रहित व्यक्ति सुख और दुख के प्रभाव से मुक्त सेल्फ की अनुभूति में ही चिर आनंदित होते रहता है।
3. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को न तो राग होता है , न क्रोध, न भय। यँहा फिर उसी समत्व के भाव का असर दिखता है। कामना लगाव का परिणाम है और लगाव मोह से जन्म लेता है। यह मोह भ्रम से आता है। जब लगाव होता है तो हम परिणाम से बँधे होते हैं। यही लगाव हमें किसी चीज से अनुरक्त या विरक्त करता है। अनुरक्ति या विरक्ति दोनों ही लगाव के परिणाम हैं । जब जुड़ाव होता है तो उस जुड़ाव से विलग होने पर दुख होता है और उससे जुड़े रहने पर खुशी और सुख मिलता है। इस प्रकार यह लगाव ही राग है।
और यही लगाव डर भी जन्म देता है। जब लगाव होगा तो उससे विलग हो जाने का भय भी होगा।
और जब लगाव और राग की पूर्ति में बाधा आती है तो मन खिन्न हो उठता है और अंततः क्रोध का जन्म होता है।
लेकिन जिस व्यक्ति को कर्मयोग की बुद्धि प्राप्त है और जिसके कर्म इस बुद्धि के अनुसार हैं वह तो कामना और इक्षा रहित होकर परिणाम से मुक्त होकर कर्म करता है, तो फिर उसके कर्म भी निश्चित हैं। वह तो बाहरी परिस्थिति और अपने like के अनुसार कर्म करता ही नहीं है, बल्कि वह तो वो निश्चित कर्म करता है जो उसके स्वधर्म के अनुसार है। ऐसी स्थिति में कर्मों और परिणामों से उसे राग नहीं होता है, और न ही कुछ छूट जाने का भय और न ही किसी बाधा से उसे उत्तेजना ही होती है, सो वह बाहरी किसी भी कारक से अप्रभावित होता है। उसका मन मस्तिष्क एकदम शांत होते हैं अर्थात वह मन के स्तर पर मौन ही होता है सो मुनि कहलाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 57
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यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है
॥57॥
4. कर्मयोग की बुद्धि को बताते समय श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म करने में परिणामों के प्रति समत्व का भाव होना चाहिए अर्थात सभी तरह के परिणाम में स्थिर होना चाहिए, चाहे वो अच्छे हों या बुरे। साथ ही उन्होंने ये भी समझाया है कि जो भी परिणाम आये उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और पूर्ण समर्पण और श्रद्धा के साथ स्वधर्म के अनुसार अपना कर्म करते रहना चाहिए। इस तरह की बुद्धि से युक्त व्यक्ति को न तो किसी से लगाव होता है न विलगाव यानी इस तरह का व्यक्ति स्नेह रहित होता है। स्नेह तो तब होता है जब लगाव हो अर्थात अटैचमेंट हो।
यँहा ध्यान देने की बात है कि श्रीकृष्ण ने स्नेह से रहित होने की शिक्षा दी है न कि विलगाव से रहित होने की। अर्थात श्रीकृष्ण ने पॉजिटिव रूप से बातों को कहा है यानी कि सुख की प्राप्ति की ओर संकेत किया है। हम स्नेह और लगाव से सुख पाने के लिए इस संसार के द्वारा प्रशिक्षित किये गए होते हैं किंतु इसी लगाव के कारण हमारे अंदर आसक्ति का जन्म होता है जो सारे दुखों का जड़ होता है। श्रीकृष्ण तो ये समझा रहें है कि हमारे अंदर न तो लगाव हो न विलगाव। सांसारिक रूप से हर अच्छे या बुरे को, शुभ और अशुभ को बिना उस अच्छा या बुरा की प्रकृति से प्रभावित हुए जस का तस स्वीकार करना चाहिए। ये हमारा इगो है जो कुछ को अच्छा और कुछ को बुरा की संज्ञा देता है , हम अपनी पसंद और नापसन्द के कारण अच्छे और बुरे से प्रभावित होते हैं। लेकिन कर्मयोग की बुद्धि से युक्त स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि इन बाहरी कारकों से अप्रभावित रहती है और वह चीजों के रूप रंग प्रकृति से अप्रभावित रहते हुए उनको जस का तस ही लेता है। चूँकि वह तो अपने आत्मस्वरूप में ही अवस्थित रहता है, बाहरी परिणामों से अप्रभावित होता है, समत्व के भाव में बना रहता है, श्रद्धा के साथ रहता है और परिणाम को समान रूप से लेता है सो सांसारिक शुभ से खुश नहीं होता है और सांसारिक दुख से दुखी नहीं होता। उसके लिए तो सभी समान रूप से अपनी प्रकृति के अनुसार हैं। उसकी प्रसन्नता किसी बाहरी कारणों से निर्धारित ही नहीं होती है , वह तो अपनी ही आत्मा में लीन प्रसन्न रहता है।
तो क्या इस स्थिति में व्यक्ति पलायनवादी नहीं हो सकता है? अर्जुन भी तो सब कुछ छोड़ देने की बात कर रहा था, तो फिर अर्जुन की प्रतिक्रिया और श्रीकृष्ण की शिक्षा में अंतर कँहा है? वस्तुतः पलायन विलगाव के कारण नहीं होता बल्कि उसके अंदर एक भय की भावना होती है, जो उसे भागने के लिए प्रेरित करती है। वह तो परिणामों का दास है तभी तो परिणामों से भागकर एकांत में चला जाना चाहता है अथवा आत्महन्ता बनने का विचार करता है। कर्मयोगी तो परिणामों का सामना करता है, बस उसे परिणाम प्रभावित नहीं कर पाते, क्योंकि परिणामों से और यँहा तक कि उसे अपने कर्मों से कोई लगाव नहीं होता, वह किसी कारण वश कुछ करता ही नहीं। वह तो वही करता है जो उसके स्वधर्म यानी उसकी स्थिति से निर्धारित है और इस कारण उसे परिणामों के स्वरूप से कोई लगाव नहीं होता। जब हमें अपने कर्म से लगाव होगा तब हम परिणाम की चिंता करेंगे। जब हम कर्म करते वक़्त कोई मकसद रखेंगे तब मकसद को पूरा होने पर खुश होंगे, उसे शुभ मानेंगे और मकसद के पूरा नहीं होने पर दुखी होंगे और इसे अशुभ मानेंगे।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इन सब से मुक्त होकर कर्म में स्वधर्म के अनुसार, श्रद्धा और समर्पण से बिना परिणाम से बंधे कर्म करता है तो उसे स्नेह या दुराव कैसा।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 58
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यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
और कछुवा सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिए)
॥58॥
5. जब व्यक्ति का कर्म स्वधर्म के अनुसार होता हो, जब कर्म समर्पण और श्रद्धा से हो, जब कर्म में आनंद की अनुभूति हो, जब कर्मों के परिणाम में समत्व का भाव हो तो निश्चित ही ऐसे व्यक्ति का अपने इन्द्रियों यानी सेंसेज पर भी पूर्ण नियंत्रण होगा ही। बिना इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण के कर्मयोग का अभ्यास भी असम्भव है।
और यदि ये इन्द्रियाँ बाह्य जगत के क्रिया कलाप से नियंत्रित होंगी तो फिर कर्मयोग की शिक्षा का कोई अर्थ ही नहीं। चूँकि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वाह्य परिणामों और कारकों से अप्रभावित रहता है , यह उसी स्थिति में सम्भव है जब व्यक्ति का अपने इन्द्रियों के क्रियाकलापों पर पूर्ण नियन्त्रण हो, अर्थात इन्द्रियाँ व्यक्ति को नहीं चलाये बल्कि व्यक्ति के अनुसार इन्द्रियाँ व्यवहार करें। हमारी इन्द्रियाँ हमें वाह्य संसार की अनुभूति कराती हैं। यदि हमारी इन्द्रियों का हमपर नियंत्रण होगा तो हमारी समस्त चेष्टाएँ भी वाह्य संसार की प्रतिक्रिया में ही रह जाएंगी। हम हमेशा अस्थिर बने रहेंगे। तब भला स्व की खोज क्या कर पाएँगे।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 59,60
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विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥
इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है
॥59॥
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥
हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं
॥60॥
6. .श्रीकृष्ण अर्जुन को स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए एक बार पुनः इन्द्रियों पर नियंत्रण की महत्ता को निरूपित करते हुए बताते हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का इन्द्रियों पर इस तरह का नियन्त्रण होता है कि उसकी आसक्ति सदा के लिए समाप्त हो जाता है।
इसको समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखता है वो भी इन्द्रियों के प्रभाव से तब तक मुक्त नहीं होता जब तक उसे अपने सेल्फ की समझ नहीं हो जाती और उस काल में वह व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार के साथ पूर्ण आसक्ति मुक्त हुआ परमात्मा में ही विलीन हो जाता है। अर्थात स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का इन्द्रियों पर सिर्फ नियंत्रण ही नहीं होता है बल्कि उससे आगे जाकर इन्द्रियों के प्रभाव से उसे मुक्ति मिल जाती है।
इन्द्रियाँ वाह्य जगत की अनुभूतियों में आसक्ति पैदा करती हैं। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय में व्यक्ति के अंदर आसक्ति को जन्म देती है। जिस व्यक्ति ने इन्द्रियों पर नियंत्रण कर भी लिया है उसकी आसक्ति इन्द्रिय के विषय से विरक्ति नहीं हो पाती है, जैसे यदि कोई वस्तु या व्यक्ति जिसके प्रति एक विशेष लगाव हो उससे यदि हम विलग होकर उससे सम्बन्धित इन्द्रिय के प्रभाव को निरस्त करते हैं तो भी उसमें आसक्ति बनी हुई रहती है। यदि किसी खाने में हमे विशेष स्वाद मिलता हो, किसी आवाज या गन्ध के प्रति विशेष आकर्षण हो या किसी स्त्री अथवा पुरुष से अनुराग हो और यदि हम खुद को बलात उनसे अलग कर लेते हैं तो हमें लगता है कि हमने इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में ले लिया है, अब उस खाने, आवाज या स्त्री/पुरुष के प्रति हमारी इन्द्रियाँ हमें उद्वेलित नहीं करेंगी। लेकिन सच्चाई ये है कि जैसे ही हम पुनः उनके सम्पर्क में आते हैं हमारी इन्द्रियाँ सक्रिय हो उठती हैं। इन्द्रियों का यही व्यवहार आसक्ति है। वस्तुतः बिना ज्ञान प्राप्ति के , बिना सात्मसाक्षात्कार के मात्र कारक से दूरी बनाकर जो इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेने की बात सोचते हैं वे सच्चाई में इन्द्रिय के प्रभाव से, उसकी आसक्ति से मुक्त नहीं हुए होते हैं। होता ये है कि प्रत्येक कारक में एक रस होता है, एक स्वाद होता है जिसे हम इन्द्रिय विशेष से अनुभव करते हैं। यदि हम जबरन इन्द्रिय पर नियंत्रण का प्रयास करते हैं तो हमें लगता है कि हमने ये महारथ हासिल कर लिया है, लेकिन उस कारक के रस और स्वाद से हमारा लगाव बना रह गया होता है, वो खत्म नहीं होता है और जैसे वो रस और स्वाद पुनः उपलब्ध होता है इन्द्रियाँ सक्रिय होकर उसकी तरफ आकर्षित हो जाती है। इसलिये महत्वपूर्ण बात ये है कि हम इन्द्रियों के प और स्वाद के लगाव(अटैचमेंट) से खुद को अलग कर लें। इस स्थिति में कारक की उपस्तिति में भी हमारी इन्द्रियाँ उत्तेजित नहीं होती, उनको अनुभव नहीं करती हैं।
लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जिसे कामना ही नहीं होती उसकी आसक्ति भी समाप्त हो चुकीं होती है। जब हम आत्मसाक्षात्कर कि अवस्था में आते हैं तो हमें अपने स्व के ज्ञान के साथ वो स्वाद और रस मिल जाता है जिसके आगे सारे स्वाद अर्थहीन हैं। व्यक्ति के अंदर जब तमोंगुण कि प्रधानता होती है और वह रजोगुण के संपर्क में आता है तो उसका तमोगुण के प्रति लगाव समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार जब वह सत्वगुण का स्वाद प्राप्त करता है तो उसके अंदर से रजोगुण का लगाव समाप्त हो जाता है। अंततः जब उसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है तो उसे परमात्मा का स्वाद प्राप्त हो जाता है और उस स्थिति में सत्वगुण के प्रति भी उसका लगाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात ही हम इन्द्रियों के आसक्ति से मुक्त होते हैं। यही ज्ञान हमें असक्तिमुक्त करता है।
हमारा शरीर एक रथ के सदृश्य है, उसके घोड़े उसकी इन्द्रियाँ हैं , मन लगाम है और बुद्धि सारथी है। मन एक तरफ इन्द्रियों से जुड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ बुद्धि से। यदि बुद्धि मन का लगाम ठीक से नहीं थामे तो इन्द्रिय रूपी घोड़े रथ रूपी शरीर को लेकर इधर उधर भागने लगे। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इन्द्रियाँ बहुत ही बलवती होती हैं। इतनी कि कई बार बहुत बुद्धिमान की बुद्धि भी काम नहीं करती। बुद्धि का यदि किसी भी इन्द्रिय पर से लगाम ढीला हुआ नहीं कि रथ की दिशा बिगड़ जाती है, उसकी चाल अनियंत्रित हो जाती है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का अपनी बुद्धि पर और उसके माध्यम से इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है और यह नियंत्रण इन्द्रियों के विषयों के रस और स्वाद से लगाव,( अटैचमेंट) के विओप से सम्भव हो पाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोकन 61
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तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है
॥61॥
अर्जुन के इस प्रश्न पर कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं श्रीकृष्ण उसे स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण समझाते हुए अब तक बताए हैं कि
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण
1.कामना का सर्वथा अभाव
2.आत्मा में ही आत्मसंतुष्टि
3.सुख, दुख, राग, भय और क्रोध से मुक्त,
4.स्नेहरहित,शुभ अशुभ रहित, प्रसन्नता और द्वेष से रहित
5.इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण
6.इन्द्रियों की विषयों से अनासक्ति
7.अहंकार का अभाव
उपरोक्त से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों पर नियंत्रण की शिक्षा दे रहें हैं क्योंकि इन्द्रियों पर नियंत्रण से ही उपरोक्त गुणों की प्राप्ति सम्भव है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जबरन इन्द्रियों पर नियंत्रण से इन्द्रियाँ संयमित होकर नहीं रहती हैं। इसके लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को वो विधि बताते हैं जिससे इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से वश में रहती हैं, वे सिर्फ नियंत्रित ही नहीं होती बल्कि तिरोहित भी हो जाती हैं। इन्द्रियों के वश से मुक्त हुआ व्यक्ति ही बाह्य संसार के प्रभावों से मुक्त होता है और शांत मन से अपने स्व को प्राप्त कर पाता है।
हमने देखा है कि इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं। मन हमारे पसन्द और नापसन्द पर निर्भर करता है और पसन्द नापसन्द हमारे बुद्धि यानी INTELLECT पर निर्भर करता है। जब हम इन्द्रियों को वश में करने चलते हैं तो मन चंचल हो कर हमारे पसन्द और नापसन्द के अनुसार इधर उधर भागता है, परिणामस्वरूप इन्द्रियाँ भी अनियंत्रित हो जाती हैं। लेकिन यदि हमारे पसन्द नापसन्द पर हमारी बुद्धि का नियंत्रण हो तो बुद्धि बताती है कि क्या सही है, क्या गलत है और तब मन उस बुद्धि के अनुरूप संचालित होता है और वह इन्द्रियों को उसी सही और गलत के अनुसार कार्य करने का निदेश जारी करता है और तब इन्द्रियाँ नियंत्रित भाव से प्रभाव डालती हैं।
अब देखें कि ये सम्भव कैसे हो पाता है। बलात नियंत्रण हमेशा विरोध और विद्रोह को जन्म देते हैं। यदि बिना किसी कारण के हम किसी भी चीज को बाँधते दबाते हैं तो उसकी ऊर्जा अनियंत्रित होकर बाहर आने के लिए बेचैन हो जाती है जिससे शांति की अवस्था भंग होकर अशांति और अस्थिरता उत्पन्न होते हैं जो मन को एकाग्र होकर आत्मपरायण नहीं होने देते हैं। लेकिन यदि बुद्धि के द्वारा मन को और मन के द्वारा इन्द्रियों को एक बड़ा लक्ष्य दिया जाता है तो इन्द्रियाँ उनको पूरा करने में लग जाती हैं , वे उत्पात करना बंद कर उस लक्ष्य पूर्ति में सहायक बन जाती हैं। जैसे यदि नदी पर बाँध बान्धा जाए और पानी निकलने का कोई चैनल नहीं बनाया जाए तो पानी का दबाव अंततः बाँध को तोड़ डालता है, लेकिन यदि चैनल है तो पानी की दिशा मुङ जाती है, उसका दबाव बिखर जाता है। उसी प्रकार यदि आपको खूब भोर में कँही जाना अनिवार्य हो तो बिना अलार्म के भी आपकी नींद खुल जाती है और आप बिस्तर छोड़ देते हैं। यदि परीक्षा सर पर हो तो सिनेमा देखने की आपकी इक्षा स्वाभाविक रूप से उस समय खत्म हो जाती है। सो श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों को बड़ा लक्ष्य दें, उन्हें ब्रह्म पर केंद्रित करें, वे स्वतः सब ओर से सिमट कर ब्रह्म के तलाश में जुट जाएंगी । इन्द्रियाँ विरोध न कर अपने गुणों के अनुसार एक जगह यानी परम् ब्रह्म में केंद्रित होकर स्थिर हो जाती हैं जो परम् शांति की अवस्था होती है। इसी अवस्था में व्यक्ति अपने आत्मा को, अपने सेल्फ को पहचान पाता है।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि हमें जीवन के लक्ष्य ऐसे निर्धारित करने चाहिए जिनसे परम् सुख और शांति मील पाए और यह तभी सम्भव है जब लक्ष्य स्व की प्राप्ति, आत्मसाक्षात्कार हो, परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो, तब उसी के अनुसार हमारी बुद्धि भी कार्य करेगी, हमारे पसन्द -नापसन्द को भी निर्धारित करेगी जिससे मन इन्द्रियों को उस उच्चतर लक्ष्य के अनुरूप ही व्यवहार करने का निदेश देगा और इन्द्रियाँ असंयमित होकर इधर उधर नहीं भागेंगी।