श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 71
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विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥
जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है
॥71॥
श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षणों को विस्तार से समझाने के पश्चात एक बार पुनः बताते हैं कि
1. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को कोई कामना नहीं होती, क्योंकि हम पहले ही देख चुके हैं कि उसकी इन्द्रियाँ पूर्ण रूप से बुद्धि के नियंत्रण में होती हैं,
2.यह व्यक्ति अहंकार और ममता से मुक्त होता है, उसके अंदर ""मैं""का भाव नहीं होता क्योंकि उसका मैं तो सम्पूर्ण संसार के साथ मिला हुआ है,
3. उस व्यक्ति को किसी भी चीज को धारण करने की यानी पोजेसिवनेस की भावना नहीं होती, उसका कोई #MY# यानी "मेरा" नहीं होता, उसे किसी भी वस्तु , व्यक्ति आदि से कोई लगाव यानी ATTAcHMENT नहीं होता है।
इन्हीं गुणों से लैस व्यक्ति को शांति मिल पाती है क्योंकि तब ही व्यक्ति को अपने आत्मा से साक्षात्कार हो पाता है। इस प्रकार का व्यक्ति तमाम सांसारिक चीजों के साथ रहते हुए भी उनके साथ नहीं होता है।