श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 69
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या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥
सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है
॥69॥
स्थितप्रज्ञ मनुष्य की विशेषताओं का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि सेल्फ/आत्मा/स्व का ज्ञान नहीं होना ही अंधकार है और इसका ज्ञान होना प्रकाश है। रात्रि अंधकार का और दिन प्रकाश का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंधकार वो अवस्था है जिसमें सबकुछ अस्पष्ट होता है, ढँका होता है , कुछ भी दिखता नहीं है, चीजों में भेद करना नहीं हो पाता, वे फहचान में नहीं आ पाती हैं। इस अवस्था में सामान्य व्यक्ति जो संसार में ही रमा बसा है वह कुछ नहीं समझ पाता और ऐसा लगता है कि सुसुप्ता अवस्था में होता है। यह आज्ञान की अवस्था होती है क्योंकि कुछ सूझता नहीं है। यह आज्ञान आखिर है क्या? विभिन्न विषयों की जानकारी होना , व्यवहारिक बातों की जानकारी होना ये सब संसार की जानकारियाँ हैं। इनके होते हुए भी हम अज्ञानी ही होते हैं जब तक हमें अपने आत्मा यानी सेल्फ का ज्ञान नहीं होता है। यही वजह है कि तमाम सांसारिक विषयों का ज्ञान रहते हुए भी व्यक्ति तमाम तरह की गलत बातें करते रहता है, अनिष्ट करते रहता है यानी वह तो अंधकार में ही रह जाता है। इसके विपरीत जिसे यह ज्ञान हो चुका है वह तो हमेशा प्रकाश में रहता है और विभिन्न सांसारिक कृत्यों को ही अंधकार मानता है क्योंकि ये सब बिना आत्मज्ञान के किये जा रहे होते हैं।
अतः प्रकाश पाना है तो पहले आत्मज्ञानी ही बनें।