श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक-- श्रीमद्भागवत गीता की शुरुआत महाभारत का युद्ध वास्तविक रूप से शूरु होने के ठीक पहले होती है और इसके अंत के साथ युद्ध प्रारम्भ होता है। तो क्या गीता युद्ध को उकसाने वाला ग्रंथ है? इस प्रश्न का उत्तर द्वितीय अध्याय की शुरुआत में ही मिल जाता है। प्रथम अध्याय के अंत में अर्जुन हथियार डाल देता है, साफ साफ मना कर देता है कि वो अपने अंग्रजो, अनुजों, गुरुओं, बंधुओं से नहीं लड़ेगा।।सनद रहे वो डरा नहीं था, उसे विषाद हो गया था, वो डिप्रेशन में चला गया था। उस समय उसे उकसाने का सबसे सरल तरीका क्या हो सकता था? कृष्ण उसे जुआ यानी चौसर की सभा याद दिलाते, द्रौपदी का वस्त्रहरण याद दिलाते, लाक्षागृह याद दिलाते, वनवास के दिन याद दिलाते। तब ज्यादा सम्भावना थी कि अर्जुन हिंसक हो कर युद्ध के लिए ततपर हो उठता। लेकिन तब अर्जुन हिंसक होता, उसमें और कौरवों में कोई फर्क नहीं रह जाता। जैसे को तैसा होता । लेकिन कृष्ण ने उसे आत्मा की अजरता, कर्तव्यबोध, धर्म, कर्म के विषय में बताया। एक बार भी प्रतिशोध की आग नहीं भड़काई उन्होंने, बल्कि उसे सत...