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SHRIMASBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 55

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 55, 

श्रीभगवानुवाच
 प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌।
 आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है
 ॥55॥

         अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण उस व्यक्ति के विशेषताओं को बताना प्रारम्भ करते हैं जो स्थितप्रज्ञ है अर्थात जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है , जिसे हम REALIZED MASTER कहते हैं।
          पूर्व में हम देख चुके हैं कि श्रीकृष्ण ने समझाया है कि कर्मयोग की बुद्धि से युक्त व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसके कर्म की निम्न विशेषताएँ होती हैं:--

1. स्वधर्म के अनुसार ही कर्म करना चाहिए, न कि किसी की नकल कर या न कि पसन्द नापसन्द के आधार पर।अगर हम अपनी अच्छाई चाहते हैं तो हमारे कर्म दूसरों की अच्छाई के लिए ही होना चाहिए।
2.परिणाम के सम्बंध में समत्व का भाव रखना अनिवार्य है अर्थात हर परिणाम के प्रति किसी तरह का लगाव नहीं रखना चाहिए।
3.कर्म करें तो उसे पूरे समर्पण की भावना से करें। सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करें। ईश्वर हर जीव में है, सो आपके कर्म करने की भावना में सभी के प्रति समर्पण के भाव हों यानी सभी जीवों के कल्याण की बात हो।किसी को हानि पहुँचाने की भावना नहीं हो। अगर हम कोई कर्म करते हैं तो इसके पीछे हमारी भावना या तो अपना ईगो या अन्य के ईगो को सन्तुष्ट करने की भावना होती है। इससे बाहर निकल कर हमारे कर्म सभी के प्रति समर्पित होने चाहिए अर्थात ईश्वर के प्रति समर्पित होने चाहिए।
4. परिणाम से लगाव नहीं रखना चाहिए। सही कर्म करें, परिणाम अच्छा या बुरा होगा बिना इससे लगाव रखे। अच्छा और बुरा तो होना ही है, हमारा काम है सही कर्म करना।
5.जो भी परिणाम मिले, सभी में समत्व की भावना रखते हुए, बिना उससे लगाव रखे उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। 

उपरोक्त बुद्धि से युक्त व्यक्ति के कर्म उसे कर्मों के बंधन से मुक्त करते हैं और उसे अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा का ज्ञान होता है जिसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं । यही व्यक्ति वैरागी भी है, समाधि में अवस्थित भी है , और यही स्थितप्रज्ञ भी है। कर्मयोग की बुद्धि की उपरोक्त विशेषताओं में ही इस व्यक्ति की विशेषताएँ भी छिपी हैं जिनको अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण विस्तार से बताते हैं, ये विशेषताएँ निम्नवत हैं:--
1. इस व्यक्ति की कोई कामना अर्थात कोई इक्षा नहीं होती। जो व्यक्ति कर्म के परिणाम से अप्रभावित होता है , जिसे परिणाम प्रभावित नहीं कर पाते , जो हमेशा निर्लेप भाव से समत्व की बुद्धि से कर्म करता है उसके कर्मों में कोई कामना नहीं होती, कोई इक्षा नहीं होती है। वह कर्म किसी कामना पूर्ति के लिए नहीं करता है।
      हमारी कामनाएँ मुख्य रूप से निम्न चीजों से जुड़ी होती हैं
   क. अस्तित्व की रक्षा
   ख. सुरक्षा
   ग. ज्ञान की प्राप्ति
   घ. सुख और आनंद की प्राप्ति
जब तक ये कामनाएँ रहती हैं हमारे कर्म भी इनकी पूर्ति के लिए ही लगे रहते हैं और हम कर्मों के परिणाम से बंधकर रहते हैं । तब न स्वधर्म की चिंता रह जाती है, न समर्पण की भावना जन्म ले सकती है। बस हम स्वार्थ वश इन कामनाओं की पूर्ति में लगे रहते हैं। ये हमारे जीवन का अंधकार युग होता है।
    लेकिन कामनाओं से मुक्त व्यक्ति अपने स्व/सेल्फ/आत्मा में ही रचा बसा होता है जँहा वह सुख की , ज्ञान की प्राप्ति के लिए अपने बाहर के वातावरण पर , परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट होता है। चूँकि उसकी कोई कामना पूर्ति शेष ही नहीं होती सो यह व्यक्ति परम् संतुष्ट होता है। 

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