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Showing posts from September, 2020

SRIMADBHAGWAT GEETA CHAPTER 1 SHOLKA 9

गीता-अध्याय 1 श्लोक 9 ---------------------------------   दुर्योधन पुनः द्रोण को बताता है कि इन योद्धाओं के अतिरिक्त अन्य अनेक शूरवीर जो विभिन्न अस्त्र शस्त्र में निपुण हैं वो दुर्योधन के लिए प्राण देने के लिए यँहा उसके पक्ष से लड़ने आये हैं।          पुनः याद दिलाते हुए कहना है कि महाभारत का युद्ध पहले एक आंतरिक युद्ध है। इसमें प्रत्येक इंसान के अपने आसुरी और दैवी गुणों यानी उसकी बुराई और अच्छाई के बीच युद्ध होता है। मोह एक प्राथमिक अवगुण है जिसकी पूर्ति के लिए अन्य बुराइयाँ तरह तरह की शक्ति लेकर उपस्थित रहती हैं। ये बुराइयाँ मोह जनित ईक्षा की पूर्ति के लिए हर बुरा कर्म करने के लिए तैयार रहती हैं, विभिन्न तरह से इंसान की बुद्धि को नष्ट करने की क्षमता रखती हैं और विभिन्न प्रकार से उस मनुष्य की अच्छाई को खत्म करना चाहती हैं। किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति जब मन में मोह उतपन्न होता है तो उस मोह की पूर्ति हेतु हम हर गलत काम करने के लिए तैयार हो उठते हैं जो हमें भ्रष्ट करते जाता है। इसीलिए अधर्म के साथी ढेरों होते हैं। यही  मोह मन में लालच पैदा करता है, उसक...

SHRIMADBHAGAVAT GEETA CHAPTER 1 SHLOKA 8

गीता-अध्याय 1 श्लोक-8 ------------------------------------ अपनी सेना की प्रशंसा करते हुए दुर्योधन कौरव पक्ष के महत्वपूर्ण योद्धाओं के नाम द्रोणाचार्य को बताता है। क्यों बताता है?  क्योंकि मोह का प्रतिरूप दुर्योधन सत्य के प्रतिनिधियों से भयभीत है। सो वो अपने पक्ष के वीरों का नाम गिना कर खुद को भरोसा दिलाता है कि उसके बुराई का पक्ष पांडवों के भलाई और धर्म के पक्ष से अधिक ताकतवर है। हर बुरा आदमी यही करता है। और दुर्योधन भी घबराहट में यही कर रहा है।       दुर्योधन भीष्म से पहले द्रोण का नाम लेता है। जब एक अधर्मी, बुरा इंसान किसी ऐसे इंसान जिसे अच्छे बुरे का ज्ञान हो उसके सामने शेखी बघारता हो और वो आदमी बिना अभिरुचि लिए चुप हो तो वो वाचाल आदमी सकपका जाता है।  और ऐसी स्थिति में चापलूसी पर उतर आता है। इसी वजह से दुर्योधन भी द्रोण को खुश करने की नीयत से पहले उनका नाम लेता है।    हमें नहीं भूलना चाहिए कि महाभारत की लड़ाई आंतरिक युद्ध पहले है, फिर बाहरी। आपकी अच्छी(दैवी) और बुरी (आसुरी) प्रवृत्तियों के बीच निरन्तर संघर्ष होता है और ये तब तक होता है जब तक बुराई हा...

SRIMADBHAAGWAT GEETA चैप्टर 1 SHLOKA 7

गीता-अध्याय -1 श्लोक-7 ----------------------------------- पाण्डव सेना के महत्वपूर्ण योद्धाओं के नाम गिनाने के पश्चात दुर्योधन अब अपनी सेना की तरफ मुखातिब होता है और गुरु द्रोण को सम्बोधित करते हुए उन्हें #ब्राह्मणों में उत्तम ब्राह्मण से सम्बोधित करते हुए अपनी सेना के प्रमुख नामों को गिनाने चलता है।      ध्यान देने वाली बात है कि द्रोण पांडवों के साथ साथ करवों के भी गुरु हैं। फिर उन्हें गुरु से सम्बोधित न कर ब्राह्मण से  दिर्योधन द्वारा सम्बोधित करना कई बातों को स्पष्ट करता है।  महाभारत का युद्ध एक आंतरिक युद्ध है जिसमें अच्छी(दैवी) और बुरी(आसुरी) सम्पदों के बीच युद्ध होता है। जिनमें बुराई ज्यादा है यथा अहंकार भी ज्यादा है, धूर्तता, ईर्षा इत्यादि अवगुण अधिक हैं उनका सामाजिक व्यवहार ऐसा ही घमण्डी और धूर्तता भरा होता है, उनमें शील नाम की कोई चीज नहीं होती।  ऐसे लोग अन्य लोगों का सम्मान करना नहीं जानते और बात बात पर कटाक्ष करते रहते हैं। यही हाल दुर्योधन का है। उसकी बुराइयाँ उसे प्रेरित करती हैं   कि  पांडवों की अच्छाई से वो डरे और डर कर असभ्य ...

QUANTIFICATION OF UNEMPLOYED FEMALE'S WORK AT HOME.

Product is not always tangible, it can't be always tangible. Productivity is not always measurable. All activities are difficult to be quantified and in some cases it's quite impossible to be quantified in terms of monetary value. From this point of view if we see work at home done by family's unemployed females of the age group of 18 to 60 years we can easily understand the economic importance of their social contributions. In genral when we use the term  work force we talk about economic gains made by a male or female in lieu of physical or mental or both work done by him or her. Those work for generating or producing something or some service and get a remuneration for their such work are counted as work force. Thus those who can do all these and can earn but due to some one or other reason are not doing such works and consequently not getting money are not counted as work force. These people both male and female are considered as unemployed.        Now I'm c...

SRIMADBHAGWAD GEETA-CHAPTER 1 SHLOKA 3 TO 6

गीता अध्याय-1श्लोक-3 से 6 -------------------- दुर्योधन पाण्डव पक्ष के सेनापति सहित अन्य प्रमुख नामों को गुरु द्रोण को  बताता है। ये प्रमुख महारथी हैं-धृष्टद्युम,महेष्वासा, सात्यकि, धृष्टकेतु, चेकितान, काशीराज, पुरुजित, कुन्तिभोज,युधामन्यु, उत्तमौजा, अभिमन्यु, द्रौपदी के पाँचो पुत्र।      दुर्योधन जब कहता है कि पांडवों की व्यूहकार भारी सेना जिसमे अर्जुन और भीम सरीखे महारथी हैं, उन्हें देखिए, तो साफ साफ परिलक्षित होता है कि भले उसकी अपनी सेना बहुत विशाल है लेकिन उसके मन में पांडव सेना का और अर्जुन और भीम सरीखे योद्धाओं का डर बैठा हुआ है। ये तब है जब उसकी सेना पांडव सेना से लगभग डेढ़ गुनी बड़ी है।      सच तो ये है कि जब आपमें बुराई भरी हुई रहती है तो उस बुराई से आप ताकतवर नहीं बनते। बुराई की संख्या चाहे जितनी बड़ी हो वो अच्छाई के सामने छोटी ही होती है और चाहे उस बुराई को जिस संज्ञा या विशेषण से सजा दें उसके अंदर अच्छाई से एक डर बैठा ही रहता है सो वो अपने दूसरे सहयोगियों से वाचाल होकर अपने भय को दबाना चाहता है।     यँहा ये समझने की बात ये है कि हम ...

PURPOSE OF READING GEETA-1

Why do we need to study Shri MadBhagwad Geeta?      To gain three things 1.Goodness of mind 2.Peace &Happiness 3.Efficiency or Right action. And what we get by reading SRIMADBHAGWAD GEETA?         We get three things 1.Self view 2. World view 3.God view.

SHRIMADBHAGAVATGEETA CHAPTER 1 SHLOKA 2

गीता-अध्याय-1, श्लोक- 2 ------------------------------ धृतराष्ट्र के पूछने पर संजय युद्ध का वर्णन प्रारम्भ करते हैं। युद्ध के वर्णन में संजय को जो बात सबसे पहले दिखती है वो है दुर्योधन की बेचैनी। सभी को पता है कि महाभारत का युद्ध दुर्योधन की जिद्द और धृतराष्ट्र की विवशता का परिणाम है। दोनों ही अपने परिजनों के जायज अधिकारों का हनन करने पर तुले हैं। तब अधिकारों से वंचित हुए परिजन भी प्रतिकार करने को विवश होते हैं, तो परिणाम में महाभारत का युद्ध होता है।        संजय को युद्ध के मैदान में दुर्योधन ही सबसे पहले क्यों दिखता है, ये सवाल तो हम में से किसी के मन में उठना स्वाभाविक है। दरअसल जीवन में जब भी अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष होता है तो शुरुआत में बुराई खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश करती है, वो तरह तरह से लोगों का और लोगों की प्रकृति का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयास करती है ताकि लोगों की नजर में उसे एक स्वीकार्यता और वैधानिकता मिल सके। सो वो ध्यान खींचने के लिए भोंडा प्रदर्शन करती है। बुराई खुद को स्थापित करने के लिए तरह तरह का प्रदर्शन करती है। आप अपने अगले बगल देखिए।...

SHRIMADBHAGWATHEETA-CHAPTER 1 SHLOKA1

गीता-अध्याय 1-श्लोक 1  ----------------------------------          प्रथम श्लोक में युद्ध को लेकर धृतराष्ट्र की उत्सुकता झलकी है । उसे पता होता है कि उसने और उसके पुत्रों ने पांडवो के साथ ढेरों छल किये हैं। इसलिए उसके अंदर एक छटपटाहट भी है। वो बेचैन है, सो सवाल करता है। जब आप गलती किये होते हैं और पीड़ित आपके सामने सीना तानकर आपसे दो दो हाथ करने आ जाता है तो आप नैतिक रूप से कमजोर हो जाते हैं । उस वक़्त आपके अंदर ये जानने की बेचैनी स्वाभाविक रूप से होती है कि जो पीड़ित है वो किस तरह से प्रतिकार करता है। हर चोर की दाढ़ी में तिनका तो होता ही है, वो बात बात पर चिहुँकता जरूर है। यही हाल धृतराष्ट्र का है।        धृतराष्ट्र जन्मान्ध है। आँखें देखने के काम आती हैं। लेकिन जिसके आँखों पर पर्दा हो वो खुद क्या देखेगा। यही हाल धृतराष्ट्र का भी है। उसे पुत्रमोह है। उस मोह में उसे भला बुरा कुछ नहीं दिखता, वो तो बस मोह में फँसा अपराध ही करते आया है। सच यही है। जिसके आँख पर मोह की पट्टी हो वो सही गलत नहीं समझ पाता है। लेकिन जब उसे लगता है कि उसके अपराधों का फ...

श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक

श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक-- श्रीमद्भागवत गीता की शुरुआत महाभारत का युद्ध वास्तविक रूप से शूरु होने के ठीक पहले होती है और इसके अंत के साथ युद्ध प्रारम्भ होता है। तो क्या गीता युद्ध को उकसाने वाला ग्रंथ है?      इस प्रश्न का उत्तर द्वितीय अध्याय की शुरुआत में ही मिल जाता है। प्रथम अध्याय के अंत में अर्जुन हथियार डाल देता है, साफ साफ मना कर देता है कि वो अपने अंग्रजो, अनुजों, गुरुओं, बंधुओं से नहीं लड़ेगा।।सनद रहे वो डरा नहीं था, उसे  विषाद  हो गया था, वो डिप्रेशन में चला गया था। उस समय उसे उकसाने का सबसे सरल तरीका क्या  हो सकता था? कृष्ण उसे जुआ यानी चौसर की सभा याद दिलाते, द्रौपदी का वस्त्रहरण याद दिलाते, लाक्षागृह याद दिलाते, वनवास के दिन याद दिलाते। तब ज्यादा सम्भावना थी कि अर्जुन हिंसक हो कर युद्ध के लिए ततपर हो उठता। लेकिन तब अर्जुन हिंसक होता, उसमें और कौरवों में कोई फर्क नहीं रह जाता। जैसे को तैसा होता । लेकिन कृष्ण ने उसे आत्मा की अजरता, कर्तव्यबोध, धर्म, कर्म के विषय में बताया। एक बार भी प्रतिशोध की आग नहीं भड़काई उन्होंने, बल्कि उसे सत...

साहित्य और व्यक्तित्व निर्माण

साहित्य का समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कम से कम मेरी समझ तो यही है। बचपन में नंदन, पराग जैसी पत्रिकाओं का सानिध्य, किशोरावस्था में धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान , दिनमान , Illustated Weekly, कादम्बनी,, सारिका इत्यादि से परिचय जो तब तक बना रहा जब तक ये रहे। उसी दौरान भगवती चरण वर्मा, प्रेमचंद, जैनेन्द्र कुमार, राजेन्द्र यादव, भीष्म साहनी, बच्चन जो, निराला, मुक्तिबोध..... अगिनत नाम हैं , से उनके साहित्य से नजदीकी, राजकमल आलोचना परिवार से सानिध्य, सस्ती कीमत पर राजकमल से उत्कृष्ट रचनाओं का पेपरबैक संस्करण, और न जाने कितना कुछ। इन सब ने मुझे इंसान के रूप में अपना व्यक्तित्व गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हमारी पूरी पीढ़ी कँही न कँही कुछ हद तक इनसे प्रभावित होती रही।     फिर डिजिटल क्रांति और तत्पश्चात  स्मार्ट क्रांति और डेटा क्रांति का युग शुरू हुआ और फेसबुक व्हाट्सएप्प इत्यादि का युग शुरू हुआ। धैर्यवान अध्ययन की परंपरा जाती रही और फटाफट अध्ययन के युग का प्रादुर्भाव हुआ , साथ ही साहित्य की सामाजिक उपस्थिति का अभाव का युग भी शुरू हुआ। बुक्सटैंड से ग्राहक ...

कॉमन गुड़

बिना किसी कारण के जब हम लोगों के साथ अच्छे से पेश आते हैं तो निश्चित रूप से हमें स्वयं के प्रति संतोष की अनुभूति होती है। व्यक्तिगत जीवन हो, सामाजिक जीवन हो या हमारा कार्यक्षेत्र हो, हर जगह हमें लोगो से, परिचितों और अजनबियों से मिलना ही होता है। कई बार फायदे और नुकसान की बातें रहती हैं। कई बार सामान्य संव्यवहार भी हो सकता है। लेकिन हर बार यदि हम दूसरों से मिलते वक़्त यानी उनसे संव्यवहार की प्रक्रिया में जुड़ते वक़्त उनके प्रति उनकी अच्छाई की भावना लिए हों तब हमें खुद के अंदर अपनी सम्पूर्णता, अपनी प्रसन्नता का बोध होता है। ये अनुभूति हमें प्रेरित करती है कि हम जो भी करें उसे पूरे परफेक्शन के साथ करें ताकि हम उस व्यक्ति को अधिकतम खुशी दे सके।  इस भावना से जब हम अपने दायित्व को पूरा करते हैं तब एक ""कॉमन गुड"" समाज में फलीभूत होता है। समाज की अच्छाई में हमारा भी एक छोटा सा प्रयास रहता है।  व्यक्ति, समाज, संस्था सब के विकास, सबकी भलाई के लिए हमें ऐसी सोच अपनाने की कोशिश जरूर करनी चाहिए। आपका कोई शत्रु नहीं है। ये मान कर, समझ कर चलें।     लेकिन एक चेतावनी भी जरूरी है। आ...
अभी तक हमने श्रीमद्भागवत गीता के पन्द्रह अध्यायों का श्रवण किया जिससे स्पष्ट हो जाता है कि श्रीकृष्ण की शिक्षा निष्काम कर्म के इर्द गिर्द ही घूमती है। अब प्रश्न उठता है कि इसका अभ्यास करें तो कैसे करें। यदि गीता के दर्शन को समझने में किसी को भी कोई कठिनाई होती है, कोई भरम होता है, यदि उसे लगता है कि गीता दर्शन एक कठिन विषय है उन सभी से अनुरोध है कि यदि वे गीता के सारे पाठों को भूल भी जाएँ, न भी समझे तो कोई बात नहीं। वे मात्र 16वेन अध्याय को समझ लें, जो समझने में सबसे सरल पथ है भी तो गीतोक्त ज्ञान से परिपूर्ण हो जाएंगे।             निष्काम कर्म का मार्ग दैवी गुणों यानी सद्गुणों से होकर जाता है और गीतोक्त मोक्ष की पराकाष्ठा जो जीते जी ईश्वरत्व की प्राप्ति है में भी इन्हीं गुणों की परिपूर्णता ही होती है। मोक्ष क्या है? 16वे अध्ययाय के सदगुणों की परिपूर्णता ही मोक्ष है, वही ईश्वरत्व की प्राप्ति है। आपके अंदर अच्छे और बुरे गुण दोनो हैं । यदि आप अच्छे गुणों को बढ़ाते हैं तो आप ईश्वरत्व की तरफ बढ़ते हैं और इसके विपरीत बुरे गन आपको अधम बनाते हैं।  तो आइए देखें क...

COMMON ASPIRATIONS IN DEMOCRACY

When  rulers fail to communicate with general public governance starts declining.  Democracy is a form of government of common aspirations, keeping conflicting issues in side for negotiation. These common aspirations lay the foundations for commitment,  policy formulation and implementation. If the authority of the government of the day comes from the popular votes, policies get sanction from common aspirations. These common aspirations repose faith in certain political parties who on the strength of these common aspirations succes to gather majority of popular votes and then form governments. So when government is formed by a certain political party or a group of parties the duty of the government of the day is to communicate with the general public regarding ways and means for fulfillment of common aspirations for attainment of  which the party or parties have been entrusted the task of governance. A direct communication between those who have to take divisions and...

WHY BUREAUCRACY FAILED-2. MORE AUTHORITY TO TOP

More and more authority to one chair leads to more and more concentration of decision making power leaving subordinates more and more powerless. In our bureaucracy we see as time is passing top bureaucrats are concentrating more authority . Indian model of bureaucracy  gives little room to its subordinates to innovate. They are expected to follow the dictate. If the government claims to be provider of services to public , they need to focus on service delivery system. The delivery system improves when delivery agents are motivated to deliver. This motivation comes when the delivery agents feel prized for their services. Contrary to this accepted fact, in bureaucracy top bureaucratic echelon relies on dictates , fear and punishment  in place of motivation, encouragement and rewards. Lower ranked officers and field level employees feel that if they don't follow the dictate they will be punished. They also know if they achieve something splendid they will not be rewarded. Rather ...

WHY BUREAUCRACY FAILED--1.LACK.OF TRAINING

The largest but one of the most formalized organizations in India is Indian bureaucracy. It's claimed to be key to India's development. If this claim is taken as truth then reason for India's failure on most of the fronts will naturally be attributed to it. Text books deal in length the reasons behind failure of India's bureaucracy. Many scholars have also explained the reasons in detail. But what's an account of failures of bureaucracy by a bureaucrat himself? Of course from experience a long list can be produced, but here we will be confined to only one, rest will be discussed at some latter appropriate time.           India's permanent bureaucracy is expected to deliver anything. A framework of hierarchy has been established which is expected to do anything entrusted to it , whether it's meant for that or not. Size and area of functioning of the government is so big that it covers almost everything beneath the sky. And government has only one agency to pe...