गीता-अध्याय -1 श्लोक-7
-----------------------------------
पाण्डव सेना के महत्वपूर्ण योद्धाओं के नाम गिनाने के पश्चात दुर्योधन अब अपनी सेना की तरफ मुखातिब होता है और गुरु द्रोण को सम्बोधित करते हुए उन्हें #ब्राह्मणों में उत्तम ब्राह्मण से सम्बोधित करते हुए अपनी सेना के प्रमुख नामों को गिनाने चलता है।
ध्यान देने वाली बात है कि द्रोण पांडवों के साथ साथ करवों के भी गुरु हैं। फिर उन्हें गुरु से सम्बोधित न कर ब्राह्मण से दिर्योधन द्वारा सम्बोधित करना कई बातों को स्पष्ट करता है। महाभारत का युद्ध एक आंतरिक युद्ध है जिसमें अच्छी(दैवी) और बुरी(आसुरी) सम्पदों के बीच युद्ध होता है। जिनमें बुराई ज्यादा है यथा अहंकार भी ज्यादा है, धूर्तता, ईर्षा इत्यादि अवगुण अधिक हैं उनका सामाजिक व्यवहार ऐसा ही घमण्डी और धूर्तता भरा होता है, उनमें शील नाम की कोई चीज नहीं होती। ऐसे लोग अन्य लोगों का सम्मान करना नहीं जानते और बात बात पर कटाक्ष करते रहते हैं। यही हाल दुर्योधन का है। उसकी बुराइयाँ उसे प्रेरित करती हैं कि पांडवों की अच्छाई से वो डरे और डर कर असभ्य व्यवहार करें। पांडव द्रोण के शिष्य हैं। एक तरफ जँहा द्रोण दुर्योधन को उज़के अवगुणों के कारण एकदम पसन्द नहीं करते वंही पांडव उनके प्रिय हैं। सो दुर्योधन को द्रोण की कौरवों के प्रति निष्ठा पर संदेह है । इसलिए वो उनको उनके धर्म की याद दिलाने के लिए ब्राह्मण यानी विवेकी के रूप में उनको अहसास दिलाने के लिए व्यंग में बोलता है। जिस आदमी का अपना कोई धर्म नहीं होता, जो सदा दूसरों के अहित में लगा रहता है उसे अपने हित की रक्षा की बहुत चिंता होती है।
दूसरी बात की बुराई चाहे लाख बड़ी हो संख्या बल में अच्छाई से हमेशा डरी हुई होती है। दुर्योधन अंदर ही अंदर पांडवों के सदगुणों से पराजित होने के भय में जीता है, सो अपने को सांत्वना देने के लिए वो घबरा कर वाचाल व्यवहार करता है। हर दुर्गुणी जब भी अच्छाई का सामना करता है तो इसी तरह नर्वस व्यवहार करता है। कौन कितना ताकतवर है ये द्रोण से नहीं छुपा। भला गुरु से शिष्य की अच्छाई या बुराई भी छुपती है कँही। लेकिन बुरा इंसान भयभीत होकर अपने बल प्रदर्शन का वाचाल प्रयास करता ही है, जो दुर्योधन कर रहा है और जो बात द्रोण को पता है, वही बात दुर्योधन द्रोण से कहने के लिए बेचैन है। दरअसल बुरा आदमी अपनी ताकत दिखाने के लिए अपनी बुराई का बार बार जोरदार घोषणा करते रहता है। जैसे, मेरे पास ये बन्दूक है, मुझे फलाना से सम्पर्क है, फलाना मेरे चाचा फूफा हैं वैगरह हैं । दुर्योधन यही कर रहा है। पांडव सेना कौरव सेना से संख्या बल में कम है लेकिन उनका नैतिक बल मजबूत है क्योंकि वे जायज हक़ के लिए लड़ने आये हैं। दूसरी तरफ दुर्योधन दूसरे की संपत्ति हड़पने की नीयत से दल बल बाँध कर आया है लड़ने के लिए। उसका उद्देश्य गलत है सो उसका नैतिक बल पतनशील है। इसलिए वो डरा हुआ है। और इसी भय में वो अपने पक्ष के उन लोगों का नाम गिनाने के लिए बेचैन है जिनके बल।पर उसे उम्मीद है कि वो अपने गलत मनसूबे में सफल होगा।
साथ ही ये भी याद रखने की बात है कि हम जब व्यथित, भयभीत, मोहवश, होकर घबरा उठते हैं तो हम उसे खोजते हैं जिससे हमें उम्मीद होती है। द्रोण उसके गुरु रहें हैं, घर से बाहर वाले हैं सो वो उनके पास दौड़ता है। बुराई जानती है कि कोई भी भला आदमी उसे तवज्जो नही। देगा, तो बुराई उस इंसान का ध्यान खींचने की कोशिश करता है।
विगत चार श्लोकों और इस श्लोक से भी यही स्पष्ट होता है कि दुर्योधन पांडवों की अच्छाई से डरा एक दम्भी और उद्दण्ड व्यक्ति है जो आसुरी सम्पदा का राजा है क्योंकि वह महाभारत की कथा में मोह का ऐसा प्रतीक है जिस मोह में पड़कर उसका अँधा पिता यानी मोहपाश में जकड़ा अज्ञानी पिता महाभारत का युद्ध होने के परिस्थिति पैदा होने देता है।
ये श्लोक हमें ये बताते है कि एक दुर्गुणी का चरित्र कैसा होता है और वह अहंकार और लोभ में किस तरह का व्यवहार करता है।