साहित्य का समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कम से कम मेरी समझ तो यही है। बचपन में नंदन, पराग जैसी पत्रिकाओं का सानिध्य, किशोरावस्था में धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान , दिनमान , Illustated Weekly, कादम्बनी,, सारिका इत्यादि से परिचय जो तब तक बना रहा जब तक ये रहे। उसी दौरान भगवती चरण वर्मा, प्रेमचंद, जैनेन्द्र कुमार, राजेन्द्र यादव, भीष्म साहनी, बच्चन जो, निराला, मुक्तिबोध..... अगिनत नाम हैं , से उनके साहित्य से नजदीकी, राजकमल आलोचना परिवार से सानिध्य, सस्ती कीमत पर राजकमल से उत्कृष्ट रचनाओं का पेपरबैक संस्करण, और न जाने कितना कुछ। इन सब ने मुझे इंसान के रूप में अपना व्यक्तित्व गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हमारी पूरी पीढ़ी कँही न कँही कुछ हद तक इनसे प्रभावित होती रही।
फिर डिजिटल क्रांति और तत्पश्चात स्मार्ट क्रांति और डेटा क्रांति का युग शुरू हुआ और फेसबुक व्हाट्सएप्प इत्यादि का युग शुरू हुआ। धैर्यवान अध्ययन की परंपरा जाती रही और फटाफट अध्ययन के युग का प्रादुर्भाव हुआ , साथ ही साहित्य की सामाजिक उपस्थिति का अभाव का युग भी शुरू हुआ। बुक्सटैंड से ग्राहक गायब होने लगे। मोबाइल फोन पर हाथोहाथ सूचनाओं का रेला लगने लगा, जिन कहानियों को जानना पढ़ना जरूरी नही था उनकी भीड़ हाथ आये स्मार्टफोन पर बढ़ती गई। बाज़ारीकरण के जोर ने उस साहित्य को किनारे लगा दिया जो ज्यादा धैर्य खोजता था। राजनीतिक सोच समझ पर भारी परती गई । कथाकार पीछे छूट गए और कथावाचक आगे आते गए। राजनीति की चटपटी खबरें कथा कहानी पर हावी होते गए। जीवन जीने की शर्त कड़ी होती गई, बाज़ारवाद ने जीने की शर्त को कठिन बनाते गया। व्यक्तित्वनिर्माण में साहित्य की भूमिका खत्म होती गई। तमस की समझ, कुरु कुरु स्वाहा की किस्सागोई, मैला आँचल का संघर्ष इन सब की समझ राजनीतिक विचारधारों के खेमे में बाँट कर साहित्य की व्यक्तित्व के निर्माण में हस्तक्षेप को खत्म कर दिया गया है। इंस्टैंट रीडिंग के युग में गम्भीर साहित्य की जगह लगभग खत्म हो चुकी है। नतीजा ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण है जो सोच और समझ के स्तर पर खोखला होता है।