बिना किसी कारण के जब हम लोगों के साथ अच्छे से पेश आते हैं तो निश्चित रूप से हमें स्वयं के प्रति संतोष की अनुभूति होती है। व्यक्तिगत जीवन हो, सामाजिक जीवन हो या हमारा कार्यक्षेत्र हो, हर जगह हमें लोगो से, परिचितों और अजनबियों से मिलना ही होता है। कई बार फायदे और नुकसान की बातें रहती हैं। कई बार सामान्य संव्यवहार भी हो सकता है। लेकिन हर बार यदि हम दूसरों से मिलते वक़्त यानी उनसे संव्यवहार की प्रक्रिया में जुड़ते वक़्त उनके प्रति उनकी अच्छाई की भावना लिए हों तब हमें खुद के अंदर अपनी सम्पूर्णता, अपनी प्रसन्नता का बोध होता है। ये अनुभूति हमें प्रेरित करती है कि हम जो भी करें उसे पूरे परफेक्शन के साथ करें ताकि हम उस व्यक्ति को अधिकतम खुशी दे सके। इस भावना से जब हम अपने दायित्व को पूरा करते हैं तब एक ""कॉमन गुड"" समाज में फलीभूत होता है। समाज की अच्छाई में हमारा भी एक छोटा सा प्रयास रहता है।
व्यक्ति, समाज, संस्था सब के विकास, सबकी भलाई के लिए हमें ऐसी सोच अपनाने की कोशिश जरूर करनी चाहिए। आपका कोई शत्रु नहीं है। ये मान कर, समझ कर चलें।
लेकिन एक चेतावनी भी जरूरी है। आपके द्वारा अन्य प्रति अच्छाई के दायरे में अन्य के अनाचार को समर्थन नही आता। लेकिन ये विरोध भी उसके अच्छाई के लिए अच्छाई की भावना से ही होना चाहिए। अन्यथा होता ये है कि जब हम दूसरे को अ
हानि पहुँचाने की भावना से जब क्रियाशील होते हैं तो ये तो गारण्टी के साथ नहीं कहा जा सकता कि उसे हानि होगी ही, परन्तु इस प्रक्रिया में आप अपने अंदर इतनी नकारात्मकता भर लेते हैं कि आपकी हानि होगी ही,इसकी गारण्टी हो जाती है।