गीता-अध्याय 1 श्लोक 9
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दुर्योधन पुनः द्रोण को बताता है कि इन योद्धाओं के अतिरिक्त अन्य अनेक शूरवीर जो विभिन्न अस्त्र शस्त्र में निपुण हैं वो दुर्योधन के लिए प्राण देने के लिए यँहा उसके पक्ष से लड़ने आये हैं।
पुनः याद दिलाते हुए कहना है कि महाभारत का युद्ध पहले एक आंतरिक युद्ध है। इसमें प्रत्येक इंसान के अपने आसुरी और दैवी गुणों यानी उसकी बुराई और अच्छाई के बीच युद्ध होता है। मोह एक प्राथमिक अवगुण है जिसकी पूर्ति के लिए अन्य बुराइयाँ तरह तरह की शक्ति लेकर उपस्थित रहती हैं। ये बुराइयाँ मोह जनित ईक्षा की पूर्ति के लिए हर बुरा कर्म करने के लिए तैयार रहती हैं, विभिन्न तरह से इंसान की बुद्धि को नष्ट करने की क्षमता रखती हैं और विभिन्न प्रकार से उस मनुष्य की अच्छाई को खत्म करना चाहती हैं। किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति जब मन में मोह उतपन्न होता है तो उस मोह की पूर्ति हेतु हम हर गलत काम करने के लिए तैयार हो उठते हैं जो हमें भ्रष्ट करते जाता है। इसीलिए अधर्म के साथी ढेरों होते हैं। यही मोह मन में लालच पैदा करता है, उसको पाने के लिए हमको हिंसक बनाता है, झूठ बोलने के लिए उकसाता है, पूर्ति नहीं होने की स्थिति में गुस्सा भी दिलाता है, कहने का मतलब कि ये सब मोह के संगी साथी होते हैं।
दुर्योधन खुद मानता है कि ये योद्धा उसके लिए मरने के लिए आये हैं। बात साफ है कि जो मोह की पूर्ति के लिए सहायक होता है उसमें वो नैतिक साहस नहीं होता कि वो अच्छाई पर जीत सकने की सोचे भी। वे तो मोह की पूर्ति हेतु मोहपूर्ती की कोशिश करते मारे जाते हैं। किसके हाथों मारे जाते हैं। ये बुराइयाँ मोह को जीता नहीं पाती हैं बल्कि मनुष्य की अच्छाई से हार जाती हैं, वो होती ही हैं अच्छाई के द्वारा खत्म किये जाने के लिए। जो गुण मोह के लिए होता है, जो मोह की शक्ति बढ़ाता है वो अच्छाई से हारता ही है।