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Showing posts from November, 2020

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 51

गीता अध्याय 2 श्लोक 51 ----------------------------------- कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।  जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌॥ क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्मरूप बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं  ॥51॥ कर्मयोग बुद्धि के परिणामों को बताते हुए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि जब इस तरह की समत्व की बुद्धि  प्राप्त व्यक्ति ही ज्ञानी कहलाता है। परिणाम से निर्विकार व्यक्ति के लिए परिणाम बन्धनकारी नही हो पाते। जब हम फल से बँधे रहेंगे तब न हमें परिणामों के कारण सुख या दुख की अनुभूति होगी। जब परिणाम का बंधन ही नहीं तो फिर उनके कारण सुख या दुख कैसा! इस स्थिति में तो हमें सिर्फ कर्म करने से प्राप्त अवश्यम्भावी प्रसन्नताआ ही मिलती है। समर्पण के साथ एवम स्वधर्म के अनुरूप किये गए कर्म में तो कर्म करने में प्रसन्नता ही प्रसन्नता है। सो हम चिर प्रसन्न रहते हैं। दुख या क्षणिक सुख देने वाला परिणाम तो बेअसर है समत्व बुद्धि वाले ज्ञानी व्यक्ति पर। इस तरह की चिरस्थाई प्रसन्नता मन को स्थिर करती है। स्थिर...

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 50

गीता अध्याय 2 श्लोक 50 ------------------------------------ बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।  तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌॥ समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है  ॥50॥ श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि को स्पष्ट कर देने के बाद इस बुद्धि की अन्य विशेषता पर प्रकाश डालते हुए आगे कहते हैं कि मनुष्य को लगता है कि इस जीवन में उसके द्वारा अर्जित पूण्य और पाप की उसकी उपलब्धि हैं। लेकिन हमारे पूण्य और पाप भी इसी जन्म कर्म के बंधन हैं जो हमें हमारा सेल्फ यानी आत्मा का बोध नहीं करा पाते। परिणामों के बंधन ने बन्धा मन आत्मसाक्षात्कार करने में असमर्थ होता है। लेकिन यदि हममे कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार कर्म करने की कुशलता आ जाती है तो हम इस पाप पुण्य के द्वंद्वात्मक युग्म से बाहर निकल आते हैं क्योंकि तब हमारे पास परिणाम के प्रभाव से मुक्त रह पाने की दक्षता होती है।    जब हम परिणाम से बढ़ी नहीं होते तो भव...

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 49

गीता अध्याय 2 श्लोक 49 ------------------------------------ दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।  बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥ इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ अर्थात्‌ बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं  ॥49॥ श्रीकृष्ण ने  समझाया कि किस तरह कर्मयोग की बुद्धि में परिणाम के मोह से मुक्त रहकर कर्म करना होता है और किस तरह इस तरह कर्म करते करते हम कर्मबन्धन से मुक्त होकर अपने सत्य यानी अपनी आत्मा को समझ पाते हैं , अपने ईगो से आगे बढ़कर अपने सेल्फ को पाते हैं। इस हेतु कर्मयोग की बुद्धि में समत्व का विशेष महत्व होता है अर्थात परिणाम से लगाव का अभाव। हम अच्छे से अच्छे परिणाम का प्रयास करें, निशित करे। करें यानी कर्म करे, करने के पूर्व अपने स्वधर्म के अनुसार सर्वश्रेष्ठ परिणाम को प्राप्त करने की योजना भी बनाये लेकिन कर्म करते वक़्त समत्व की बुद्धि से कर्म करें, यानी उसी परिणाम से लगाव को त्याग दें। तभी  हम कर्मयोग की बुद्धि से कर्म कर पाएंगे। इस...

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 48

गीता अध्याय 2 श्लोक 48 --------------- ------------------- योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।  सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व (जो कुछ भी कर्म किया जाए, उसके पूर्ण होने और न होने में तथा उसके फल में समभाव रहने का नाम 'समत्व' है।) ही योग कहलाता है  ॥48॥ पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने कर्म करने के सम्बंध में चार बाते समझाई हैं 1.आपका अधिकार मात्र कर्म करने में है। 2.फल पर आपका कोई अधिकार नहीं है। 3.फल से लगाव मत रखें। फल भविष्य में मिलता है, सो फल के लगाव से मुक्त होकर आप भविष्य के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। 4.कर्म नहीं करने में आपकी कोई श्रद्धा नहीं हो।     ये चारों बातें जिस चीज को समझाती हैं उनको श्रीकृष्ण एक बार फिर से कहते हैं कि आपको कर्म तो करना  लेकिन उसे योग भाव से करना है। इसका अर्थ बताते हुए कहते हैं कि ये योग है द्वंद्वात्मक विलोम के युग्मों से मुक्त होकर कर्म करना अर्थात जय-पराजय, लाभ-हानि, हर्ष-विषाद, सफलता-असफ...

श्रीमद्भागवद्गीता -एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 2

श्रीमद्भागवद्गीता -एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 2 ------------------- ------------------------------                         पृष्ठभूमि                        ------------ श्रीमद्भागवद्गीता में अर्जुन के संशय के बहाने स्वयम के संशय को देखने का अभ्यास --------------------------------------------------------- व्याख्या----राहुल रम्य ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: शंखनाद के पश्चात वास्तविक युद्ध के पूर्व अर्जुन युद्ध हेतु अपना आकलन करने हेतु दोनों पक्षों की सेनाओं का स्वयम निरीक्षण कर लेना चाहता है। दरअसल कोई भी समझदार व्यक्ति जब किसी समस्या का हल करना चाहेगा, अथवा जब भी किसी परिस्थिति से मुकाबला करना चाहेगा तो सबसे पहले क्या करेगा? सबसे पहले वह समस्या के हर पहलू को परखेगा, हर पहलू के ताकत और कमजोरी का आकलन कर लेना चाहेगा। उसी के बाद अपनी रणनीति तय करेगा। बिना समस्या को समझे सीधे जाकर सिर भिड़ा देना निरी मूर्खता के अतिरिक्त कुछ और नहीं होत...