Skip to main content

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 40

गीता अध्याय 2 श्लोक 40
------------------------------------
यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।
 स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥

इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है
 ॥40॥

कर्मयोग का प्रारंभिक परिचय देने के पश्चात श्रीकृष्ण कर्मयोग के महत्व और विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं। हम आप देखते हैं कि जब हम सामान्य सांसारिक कार्यों को सामान्य सांसारिक दृष्टिकोण से करते हैं तो दो बातें होती हैं
1.ये कोई भी कार्य स्थाई नही  होता है। 
2.चूँकि कार्य करने का हमारा दृष्टिकोण भी सामान्य सांसारिक होता है हम कार्य के परिणाम से प्रभावित होते रहते हैं, जो निम्न प्रकार के हो सकते हैं
1. हो सकता है कि हम अपने कार्य में सफल हो तब हमें  प्रसन्नता होती है, हम सुख का अनुभव करते हैं।
2.हो सकता है कि हम असफल हो, तब दुखी होते हैं, विरह और विषाद से ग्रस्त हो जाते हैं
3.हो सकता है कि हमें जो परिणाम मिले वो अपेक्षित ही न हो, सोचते कुछ हों और हो कुछ जाए जो हमारे मनोकुल भी हो सकता है या नहीं भी और उसी के अनुसार हम खुशी या दुख का भी अनुभव करते हैं
     इस प्रकार हम बराबर अपने कार्यों के परिणाम से प्रभावित होते रहते  हैं और उन परिणामों के अनुसार ही दुख सुख पाते रहते हैं। इस प्रकार हममें स्थायित्व नहीं रहता और दिन भर में कई बार हमारे मनोभाव बदलते रहते हैं। इतने अस्थिर चित्त से हम सत्य की खोज नहीं कर सकते और नहीं कर पाते। परिणाम के प्रति हमारा लगाव हमें परिणाम के प्रभाव से हमेशा डरे रहते हैं। सफलता असफलता, लाभ हानि, जय पराजय के डर से हमारा जीवन इतना हलचल भरा होता है कि हमें हमेशा अपने तात्कालिक स्थान से गिरने का भय लगा रहता है। अब आप खुद के जीवन को देखें। हम आप बराबर इसी डर में रहते हैं और नतीजा में एकदम बेचैन हुए रहते हैं।
    अब समझने की कोशिश करें कि श्रीकृष्ण इस विषय में क्या कह रहे हैं। जब हम कर्तव्य के परिणाम के प्रति समत्व भाव यानी सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में सम भाव से रहते हैं तो स्वाभाविक रूप से परिणाम के प्रति हम निरपेक्ष होते हैं। इसे दूसरी तरह से देखें तो पाते हैं यदि हम अपने कर्मों के परिणाम से अप्रभावित/निरपेक्ष होते हैं तो फिर हमपर इस बात का कोई असर नही। पड़ता कि हमारे कर्तव्य पालन का क्या परिणाम निकलता है। 
यँहा एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। पसरिणाम के प्रति समत्व का भाव यदि समझ में नहीं आता तो इस शिक्षा से आपको नकरारात्मता भी आ सकती है, हम निश्चिंत हो सकते है कि हमारा काम तो कर देना है बाकी भगवान जाने कि क्या फल देंगे। समत्व भाव का अर्थ ये कदापि नहीं है कि परिणाम के लिए हम ईश्वर पर निर्भर करें। श्रीमद्भागवत गीता में ही श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि भगवान न कुछ करते है न कुछ कराते हैं।  बल्कि ये हमारा प्रयास है और प्रयास के पीछे हमारी श्रद्धा है जो निर्धारित करती है कि परिणाम कैसा होगा।
समत्व भाव की शिक्षा का तात्पर्य ये है कि हमें सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय में परिणाम के प्रभाव में बह नही जाना चाहिए । अगर हम इन प्रभावों से स्वाम को मुक्त रखते हैं तो असफलता की स्थिति में भी हतोत्साहित नहीं होते बल्कि इस बात पर ध्यान देते हैं कि कर्तव्य पालन में हम पूरी सावधानी बरतें रहें ताकि कोई चूक न हो जाये। ऐसी स्थिति में हम पूरे सावधानी से कर्तव्य पालन करते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इसमें बीज का नाश नही होता अर्थात  एक बार धुनि लग गई तो मन की भावनाएँ, इन्द्रियों के प्रयास संयमित हो जाते हैं , हम अस्थिर होकर भटकते नहीं बल्कि अपने लक्ष्य जो स्व की प्राप्ति है और जो कर्म करने से ही पाप्त होता है उसी में शांत चित्त लगे रहते हैं।
  सनद रहे कि श्रीकृष्ण ने कर्म को अभी तक परिभाषित नहीं किया है। कर्म को आगे के अध्याय में स्पष्ट करेंगे। अभी तो मात्र निष्काम कर्म करने में बरतने जाने वाली सावधानियों और कर्म की विशेषता पर ही वे चर्चा कर रहें हैं।

Popular posts from this blog

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 47

गीता अध्याय 2 श्लोक 47 ----------------------------------- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो  ॥47॥ कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके।        श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं।       ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं----- 1....

श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक

श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक-- श्रीमद्भागवत गीता की शुरुआत महाभारत का युद्ध वास्तविक रूप से शूरु होने के ठीक पहले होती है और इसके अंत के साथ युद्ध प्रारम्भ होता है। तो क्या गीता युद्ध को उकसाने वाला ग्रंथ है?      इस प्रश्न का उत्तर द्वितीय अध्याय की शुरुआत में ही मिल जाता है। प्रथम अध्याय के अंत में अर्जुन हथियार डाल देता है, साफ साफ मना कर देता है कि वो अपने अंग्रजो, अनुजों, गुरुओं, बंधुओं से नहीं लड़ेगा।।सनद रहे वो डरा नहीं था, उसे  विषाद  हो गया था, वो डिप्रेशन में चला गया था। उस समय उसे उकसाने का सबसे सरल तरीका क्या  हो सकता था? कृष्ण उसे जुआ यानी चौसर की सभा याद दिलाते, द्रौपदी का वस्त्रहरण याद दिलाते, लाक्षागृह याद दिलाते, वनवास के दिन याद दिलाते। तब ज्यादा सम्भावना थी कि अर्जुन हिंसक हो कर युद्ध के लिए ततपर हो उठता। लेकिन तब अर्जुन हिंसक होता, उसमें और कौरवों में कोई फर्क नहीं रह जाता। जैसे को तैसा होता । लेकिन कृष्ण ने उसे आत्मा की अजरता, कर्तव्यबोध, धर्म, कर्म के विषय में बताया। एक बार भी प्रतिशोध की आग नहीं भड़काई उन्होंने, बल्कि उसे सत...
It's a hard fact that more than common masses it's the elite, which ditches idea of India as enshrined in the Indian National Movement and in  the  Indian  Constitution. Role of the judiciaal elite in this context has been more objectionable considering the weight of onus she has to carry to carry on the democracy.     It's the elite which sets the course of actions in most of the cases. And among all elites judicial elites are of paramount importance. In india it's judicial elite which has been responsible for killing of democratic credentials.     And when elite fails masses step in and then elite becomes useless. Farmers movement is it's example. Success of farmers mov is not less than a revolution.