गीता अध्याय 2 श्लोक 21
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वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥
हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?
॥21॥
श्रीकृष्ण ने अबतक आत्मा की विशेषताओं को बताया है। अब वे आत्मा को जानने समझने वाले कि विशेषताओं की चर्चा करते हैं। हमने पहले ही देखा समझा है कि इस संसार में व्यक्ति के द्वारा जो जो कुछ भी किया जाता है वह इंसान के ईगो के द्वारा किया जाता है अर्थात जो कुछ इंसान के द्वारा किया जाता है वह सब उस इंसान के शारीरिक रूप, भावनात्मक स्थिति और बौद्धिक क्षमता के द्वारा किया जाता है और यही तीन किये गया कार्य का प्रभाव भी झेलते हैं या उसका आनंद उठाते हैं। उसकी आत्मा यानी उसका स्व न तो कुछ करता है, न ही कुछ भी करवाता है। इंसान श्रीकृष्ण वर्णित तीन गुणों के अधीन रहकर कुछ न कुछ करते रहते हैं।।
जब आत्मा न कुछ करता है न कराता है तो फिर हम कैसे कहते हैं कि मैंने किया। मैं स्व को व्यक्त करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है लेकिन यँहा स्व ईगो के स्थान पर भ्रम वश समझ लिया जाता है।आत्मा न तो कर्ता है न भोक्ता है। आत्मा तो मात्र द्रष्टा है। निर्विकार भाव से चीजों को होते देखता है। स्व की उपस्थिति में हमारा ईगो कुछ न कुछ करते रहता है और प्रभावित होते रहता है। इसे एक छोटे उदाहरण से समझा जा सकता है। सूर्य के उदय के साथ रौशनी आने के साथ ही तरह तरह की गतिविधियाँ प्रारम्भ हो जाती हैं। तो क्या सूर्य इन गतिविधियों को करता है। ये आप भी जानते हैं कि नहीं। सूर्य को आपकी गतिविधि से कोई लेना देना नहीं है। सूर्य की अपनी गति है। मात्र उसकी उपस्थिति में चीजें घटित होती हैं। इसी प्रकार आत्मा न कर्त्ता है न भोक्ता है। ऐसी स्थिति में जिसे अपने स्व का ज्ञान है, जिसे आत्मा का ज्ञान है, जिसे आत्मबोध हो चुका है , इसे पता है कि उसका सेल्फ उसके ईगो से भिन्न अपरिवर्तनीय, अविकारी , अजन्मा, पुरातन और सनातन है। उसे यह भी ज्ञात है कि वह न तो कुछ करता है न भोगता है। बस वह तो द्रष्टा मात्र है। लेकिन इस स्थिति में पहुँचा कैसे जाता है ये अभी आगे स्पष्ट करेंगे श्रीकृष्ण।