गीता अध्याय 2 श्लोक 49
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दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥
इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ अर्थात् बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं
॥49॥
श्रीकृष्ण ने समझाया कि किस तरह कर्मयोग की बुद्धि में परिणाम के मोह से मुक्त रहकर कर्म करना होता है और किस तरह इस तरह कर्म करते करते हम कर्मबन्धन से मुक्त होकर अपने सत्य यानी अपनी आत्मा को समझ पाते हैं , अपने ईगो से आगे बढ़कर अपने सेल्फ को पाते हैं। इस हेतु कर्मयोग की बुद्धि में समत्व का विशेष महत्व होता है अर्थात परिणाम से लगाव का अभाव। हम अच्छे से अच्छे परिणाम का प्रयास करें, निशित करे। करें यानी कर्म करे, करने के पूर्व अपने स्वधर्म के अनुसार सर्वश्रेष्ठ परिणाम को प्राप्त करने की योजना भी बनाये लेकिन कर्म करते वक़्त समत्व की बुद्धि से कर्म करें, यानी उसी परिणाम से लगाव को त्याग दें। तभी हम कर्मयोग की बुद्धि से कर्म कर पाएंगे। इसी स्थिति में हम अपने अंदर से प्रसन्नता को प्राप्त करते हैं। ये प्रसन्नता हमारे अंदर से निकलती है जो चिरस्थाई होती है क्योंकि उस समय हम अपनी आत्मा में ही अवस्थित होते हैं जो हमारा परम् लक्ष्य रहा है। लेकिन जो व्यक्ति इस बुद्धि से कर्म नहीं करते वे तो परिणाम से ही सुखी और दुखी होते रहते हैं, कर्म की गुणवत्ता से उनको प्रसन्नता नहीं मिलती। वे तो भविष्य में मिलने वाले परिणाम से सूखी या दुखी होते रहते हैं। ऐसे लोग परिणाम से बंधे होते हैं। वे अपने कर्म से नही। आनंदित होते हैं। वे इंतजार करते हैं अच्छे परिणामों की ताकि वे प्रसन्नता को पा सकें। उनके लिए अनेक लक्ष्य होते हैं और हर लक्ष्य के परिणाम से सुखी दुखी होने के कारण उनकी मानसिक अवस्था भी विचलित होते रहती है। ध्यान रहे , परिणाम तो भविष्य में मिलता है। हम जो कर्म पहले किये थे उसका परिणाम आज मिलता है। अब यदि परिणाम मनोकुल नहीं मिला तो आज का भी कर्म हम अच्छे से नही कर पाते सो आज के कर्म का भी परिणाम हमारे मनोकुल नहीं आने वाला। इस प्रकार भविष्य में प्राप्त होने वाले परिणाम से बंधकर हम खुद को भविष्य से बाँध लेते हैं। चूँकि ऐसे लोग प्रसन्नता और स्थायित्व अपने बाहर खोजते हैं तो नित परिवर्तनशील संसार के परिवर्तनों से हम सुखी दुखी होकर अस्थिर होते रहते हैं। ऐसे में सत्य यानी आत्मा यानी सेल्फ यानी चिरस्थाई प्रसन्नता कँहा मिलने वाली।
इस प्रकार कर्मयोग से युक्त कर्म और सामान्य कर्म में कर्म में प्रयुक्त बुद्धि या दृष्टिकोण का महत्व होता है। मनुष्य हमेशा कुछ न कुछ करता ही रहता है। लेकिन जिस कर्म में कर्मयोग की बुद्धि सन्निहित होती है अर्थात जो कर्म कर्मयोग की उपरोक्त बुद्धि से युक्त होकर किया जाता है अर्थात जिसे करने में स्वधर्म, समत्व, असंगत, समर्पण और प्रसाद बुद्धि होती है वो कर्म तो कर्मयोग का कर्म है जो अंतिम सत्य तक पहुँचाता है, शेष जो इन बुद्धियों या दृष्टिकोण से युक्त नही होते वे सामान्य कर्म हैं जो पीड़ादायक होते हैं। इसलिए ये सामान्य कर्म निम्नकोटि के होते हैं।
जब भी हम कोई कर्म करते हैं दो तरह के परिणाम मिलते हैं, एक हमारे बाहर और दूसरा हमारे अपने अंदर। यदि हम बाहरी परिणाम से प्रभावित होते हैं तो परिणाम के स्वरूप के अनुसार कभी सुखी होते हैं तो कभी दुखी क्योंकि दोनों तरह के परिणाम मिलते रहते हैं। बाहरी संसार तो हमेशा परिवर्तनशील है। इस परिवर्तन के कारण हम भी परिवर्तित होते रहते हैं क्योंकि हम इनके प्रभाव में होते हैं। लेकिन यदि हम आंतरिक परिणाम के वश में हों, बाहरी परिणाम में समत्व हो, उनसे असंगत हों तो फिर हम अपने कर्म से ही आनंदित होते रहते हैं, स्थायित्व रहता है हममे जो हमें चिर आनंद की तरफ ले जाता है।
यदि बाहरी परिणाम हमपर हावी हैं और परिणाम बुरा आ गया तो हममे अपने कर्म के प्रति , अपने मानसिक अवस्था के प्रति नकरात्मकता आ जाती है। ये नकस्रात्मकता आगे के कर्मों को भी दूषित कर देती है। नतीजा होता है कि इस नकस्रात्मकता से बाहर आना सहज नहीं रह जाता। ये तभी सम्भव हो पाता है जब हम कर्मयोग की बुद्धि का अभ्यास शुरू करते हैं। आइये देखते हैं कि कर्मयोग से हीन बुद्धि के अनुसार कर्म करने से किस तरह से हम नकारात्मकता को प्राप्त होते हैं, किस तरह से हमारा पतन हो जाता है।
1.जब हम अपने स्वधर्म के अनुसार ही करटे हैं तो सही कर्म करते हैं । इस तरह के कर्म में हम ध्यान रखते की हम धर्म के अनुसार ही कोई कार्य करें। इसके विपरीत जब हम स्वधर्म का ख्याल रखे बिना कोई कर्म करते हैं तो हम अपनी पसंद नापसन्द के अनुसार कोई कर्म करते हैं। ऐसी स्थिति में हमें धर्म का ध्यान नहीं रहता बल्कि हमें जो अच्छा लगता है वही करते हैं। इस स्थिति में हम अपने मोह, माया ,आवेश, गर्व, अहंकार, भ्रम, मित्रता, शत्रुता , भय आदि के भाव के वश में होकर कर्म करते हैं। इस तरह के कर्म से उद्धार की बात सोचना भी बेमानी ही है।
2.जब हमारे कर्मों में समत्व का भाव होता है तो परिणाम से लगाव के बिना बड़ी निश्चिंतता से हम कर्म भी करते हैं और करने वक़्त आनंदित भी रहते हैं। ये आनंद परिणाम में नहीं कर्म में निहित होती है। लेकिन जब हम समत्व के भाव के बिना कर्म करते हैं तो परिणाम के लिए ही कर्म करते हैं। तब हम कर्म करने वक़्त उत्तेजित और बेचैन हुए रहते हैं। हम नसम की अवस्था में होते हैं , परिणामतः अपने कर्मों से हम भी हम असन्तुलन ही पैदा करते हैं.
3.जब हमारे कर्म में ईश के प्रति समर्पण का भाव होता है तो हम बड़े कैनवास पर काम करते हैं। हमारे कर्मों का उद्देश्य जीव का कल्याण होता है। लेकिन जब ये समर्पण ईश के प्रति न होकर खुद के प्रति ही होता है तब हम जो भी करते हैं उसमें अपनी भलाई का भाव रहता है। तब हम ये नहीं सोचते कि जो हम कर रहें हैं उससे समाज का कितना भला होगा, जीव मात्र का कितना भला होगा। ये संकुचित दृष्टिकोण स्वार्थ को जन्म देता है जिससे जन कल्याण की बात हम नहीं सोच पाते। ऐसी स्थिति में हमारे कर्मों से समाज को नुकसान नुकसान पहुंच सकता है।
4. जब हम परिणाम से असंगत होते हैं अर्थात उससे जुड़े नहीं होते तो परिणामों का हमपर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। लेकिन जब हमारे कर्मों में असंगत का भाव नहीं होता तब हम अपने कर्मों के परिणाम के अनुसार ही प्रतिक्रिया भी देते हैं और आगे का अपना कर्म भी निर्धारित करते हैं। यदि परिणाम मनोकुल नहीं मिले तो हम दुखी हो जाते हैं, गुस्सा से भर जाते हैं, और अपने अगले बगल के लोगों को भी अपने व्यवहार से विचलित कर देते हैं। इस तरह जब हम परिणाम से बन्ध जाते हैं तो लगता है कि जो करते हैं हम ही करते हैं, और परिणाम स्वरूप सभी को कोसने लगते हैं। हमारे अगल बगल का भी माहौल खराब हो जाता है। खुद हम भी आगे के अपने कर्म पूर्व के परुणामों के अनुसाय तय कर किसी का भी बुरा करने पर उद्धत हो जाते हैं।
5. प्रसाद बुद्धि से युक्त कर्म में जो भी परिणाम प्राप्त होता है उसे स्थिर भाव से हम स्वीकार कर लेते हैं। इसके विपरीत प्रसाद बुद्धि से हीन कर्म में कर्म के परिणामस्वरुप जो भी हमें मिलता है उससे हमें असन्तोष ही बना रहता है, जिसके कारण हमारी मनः स्थिति हमेशा दुख की बनी रहती है। हम चिरसन्तोषी और चिर दुखी हुए रहते हैं। प्रसन्ता के साथ स्वीकार नहीं करने के कारण हम हमेशा हमेशा दुःखी ही बने रहते हैं।
इन कारणों से कर्मयोग के बुद्धि से विहीन कर्म हीन ही है। सो इसे त्यागने में ही भलाई है। अतः हमें सामान्य कर्मों को छोड़कर इस कर्मयोग की बुद्धि ही अपनानी चाहिए। तभी हमारा कल्याण सम्भव है। तभी हम कर्म करते हुए कर्म बन्धन से मुक्त हो सकते हैं । अन्यथा सामान्य कर्मों को करते हम हमेशा कर्मबन्धन में बंधे रहते हैं। ध्यान रहे कर्म करना कर्मयोग नही है। कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करना ही कर्मयोग है। जो ऐसा नहीं कर पाते वे कृपण हैं अर्थात कंजूस हैं। उनमें क्षमता तो होती है लेकिन वे इस क्षमता का उपयोग नहीं करते और स्व यानी अपनी आत्मा को नहीं पहचान कर बन्धन में बंधे रह जाते हैं।