गीता अध्याय 2 श्लोक 20
------------------------------------
न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता
॥20॥
श्रीकृष्ण एक बार फिर से अपनी बात दुहराते हैं। हम जानते हैं कि यदि कोई बात बहुत जरूरी होती है या फिर जिस बात को समझना थोड़ा मुश्किल होता है तो वक्ता उस बात को बार बार कहता है ताकि श्रोता उस बात को और उसके अर्थ एवम महत्व को समझ सके। आत्मा जन्म मृत्यु से परे है। यह पुरातन है अर्थात अत्यंत पुराने काल से वर्तमान तक अपरिवर्तनीय ही बना हुआ है जो शरीरों के जन्म मृत्यु से अछूता रहता है। साथ ही आत्मा सनातन भी है, न आदि है न अंत है। अर्जुन जिस सनातन धर्म की बात कह रहा था पूर्व में उससे यह विचार एकदम भिन्न है। वस्तुतः अर्जुन द्वारा जिसे सनातन धर्म कहा जा रहा था वह तो मनुष्य की मृत्यु के साथ छिन्न भिन्न हो जाने वाला था। ऐसी आशंका तो अर्जुन के द्वारा स्वयम व्यक्त की जा रही थी। उसका सनातन धर्म तो कुलधर्म था। लेकिन यँहा तो श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहें हैं कि सनातन तो आत्मा है, देह कँहा से सनातन हो गया।
और यह आत्मा सब में समान है। इसका कोई रूप , रंग, आकार, नहीं , इसका कोई निश्चित देह नहीं, यह तो काल से परे है। तो ऐसी स्थिति में वो सभी सनातनी ही हैं तो आत्मा के अन्वेषण मड़इन लगे हैं। इसका सम्बन्ध हमारे जन्म और कुल से नहीं है। यह तो सभी में समान भाव से गुणों से मुक्त है। इसी से वसुधैव कुटुम्बकम् निकलता है। फिर अपना कौन पराया कौन।