गीता अध्याय 2 श्लोक 23 & 24
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नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता
॥23॥
एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥
क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है
॥24
श्रीकृष्ण आत्मा की विशेषताओं को अर्जुन को समझा चुके हैं। एक बार फिर वे आत्मा की विशिष्टताओं को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि आत्मा प्रकृति से मुक्त है। प्रकृति का आत्मा पर कोई असर नहीं पड़ता है। सो प्रकृति की कोई भी शक्ति आत्मा को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं कर सकती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बार बार समझा चुके हैं कि आत्मा अजर, अनश्वर, अपरिवर्तनीय है । इसी तथ्य को श्रीकृष्ण और भी स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि प्रकृति आत्मा पर कुछ भी असर नहीं डाल पाती है क्योंकि आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है।
आत्मा पुरातन काल से है परन्तु हमेशा नूतन ही है। यह निरन्तर बना हुआ रहता है क्योंकि इसका कोई भूत या वर्तमान नहीं होता है। आत्मा समय से अप्रभावित होता है। समय का भान स्थान और गति के कारण होता है। हमारी चिंतन प्रक्रिया चलायमान होती है। चिन्तनप्रक्रिया गतिमान होती है। ये एक सिरे से दूसरे सिरे की तरफ गतिशील होता है। स्थान के परिपेक्ष्य में गति समय का भान देती है। यदि गति न हो तो समय भी नहीं है। गति के अभाव में आत्मा हमेशा स्थिर और अचल है। इस कारण आत्मा भूत और भविष्य से परे हमेशा वर्त्तमान में ही है। इस वजह से आत्मा नित्य है।
अब इसे ऐसे समझ सकते हैं। श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि आत्मा का कोई स्वरूप नहीं होता, कोई आकार नहीं होता , उसका कोई भौतिक पिण्ड नही होता। इस प्रकार आत्मा आकारविहीन और प्राकृतिक स्वरूप से मुक्त तो है ही वह प्रकृति की समस्त शक्तियों और उनके प्रभाव से भी परे है। जिसका कोई आकार नहीं, जो अपने स्वरूप के लिए प्रकृति पर निर्भर नही। जिसका कोई आकार नहीं उसकी कोई सीमा भी नहीं है। सो
निश्चित ही वह आत्मा सर्वत्र है यानी सर्वायापी है। सीमाविहीन , आकार विहीन , सर्वव्यापी आत्मा किसी के अधीन नहीं , बल्कि सारी प्रकृति उसी के अधीन आ जाती है।
समय, काल, स्थान, गति और प्रकृति से मुक्त आत्मा अचल भी है अर्थात जिसमें कोई गति नहीं है। हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण ने आत्मा को समझाते हुए इसे स्थिर और अचल दोनों कहा है। आत्मा स्थिर है क्योंकि इसमें क्षैतिज गति नही है, यह स्थानांतरित नहीं होती एक स्थान से दूसरे स्थान तक। चूँकि आत्मा गति से मुक्त है सो ऊर्ध्व गति भी नहीं होती। इस कारण ऐसा नहीं होता है कि एक स्थान पर स्थिर आत्मा ऊपर की तरफ चलायमान हो अर्थात आत्मा क्षैतिज गति के साथ साथ ऊर्ध्व गति से भी मुक्त होती है, किसी भी दिशा में नहीं चलती यानी अचल है।
आत्मा सनातन भी है। जैसा कि पहले कहा गया है कि आत्मा पुरातन तो है लेकिन समय की अवधारणा से मुक्त होने के कारण हमेशा नूतन भी है , नित्य भी है सो यह शाश्वत सनातन है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि आत्मा प्रकृति के समस्त गुणों से इतर है, यह प्रकृति की सत्ता से बाहर नित्य, शाश्वत, अपरवर्तनिय, अविकारी और सर्वव्याप्त होकर हर स्थान, काल और प्राणी में है। चूँकि यह स्वरूप विहीन, अपरिवर्तनीय, अविकारी, शाश्वत और सनातन है , सर्वव्यापी है सो यह सभी में समान भी है।