श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 31 से 38 आत्मा /अपने स्व/अपने सेल्फ को प्राप्त करने का स्वधर्मपालन का मार्ग
आत्मा /अपने स्व/अपने सेल्फ को प्राप्त करने का स्वधर्म पालन का मार्ग(द्वितीय अध्याय श्लोक 31 से 38)
श्रीकृष्ण ने आत्मा की समझ अर्जुन देने के पश्चात उसे आगे का मार्ग भी सुझाया है। इस मार्ग पर चलकर इंसान ब्रह्म को प्राप्त होता है जँहा ईश्वर और मनुष्य में कोई फर्क नहीं रह जाता। ये अवस्था आत्मसाक्षात्कर की है। ये मार्ग योग का है-ज्ञान योग और कर्म योग का। आगे के श्लोको में बारी बारी से योग और इसके दोनों स्वरूपों और दोनों की अपरिहार्यता को समझते हैं।
गीता अध्याय 2 श्लोक 31
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स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥
तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
॥31॥
ऊपरी तौर पर तो यह श्लोक युद्ध के लिए प्रेरित करता प्रतीत होता है जो इस श्लोक के वास्तविक अर्थ का अधूरा स्वरूप ही है। श्रीकृष्ण ने अभी तक आत्मा को ही धर्म का प्रतीक बताए हैं किंतु इस श्लोक में उन्होंने स्वधर्म की बात की है। वस्तुतः आत्मा के सत्य तक पहुँचने के लिए जो मार्ग है उसी का नाम स्वधर्म है। स्वधर्म का अर्थ है खुद के स्वभाव के अनुसार धर्म यानी कर्तव्य।
सनातन धर्म के अनुसार प्रत्येक मुनष्य में तीन तरह के गुण होते हैं, तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण। इन गुणों के अनुपात विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न स्तर के होते हैं।
गीता के 16वें अध्याय के अनुसार करने लायक अच्छे गुण यानी दैवी गुण और
न करने लायक बुरे गुण यानी आसुरी गुण निम्न हैं--
दैवी गुण
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अभयता
अन्तःकरण की शुद्धता
ध्यान में लग्न
सर्वस्व का समर्पण
इन्द्रियों पर नियंत्रण
अहिंसा
सत्य
क्रोध का न होना
कर्मफल का त्याग
चित्त की चंचलता का अभाव
सभी के प्रति दयाभाव
अनासक्ति
कोमलता
लक्ष्य के प्रति समर्पण
व्यर्थ की चेष्टा का अभाव
क्षमा
तेज
शत्रुभाव का अभाव
लालच का अभाव
पूजे जाने की भावना का अभाव
मान अपमान के भाव का अभाव
आसुरी गुण
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पाखण्ड
घमण्ड
अभिमान
क्रोध
कठोर वाणी
अज्ञानता
दम्भ
मान अपमान की चिंता
मद
कर्मफल में आसक्ति
इन्द्रियों में आसक्ति
निंदा
अहंकार
कामना
लोभ
मोह
तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण के अनुपात से व्यक्ति का स्वभाव निर्धारित होता है। इन गुणों के अनुपात के अनुसार श्रीकृष्ण ने चार प्रकार के मनुष्य बताए हैं,
1.जिस व्यक्ति में तमोगुण की अधिकता होती है उसे शुद्र का नाम दिया गया है। ऐसा व्यक्ति प्रकृति के मायाजाल में फँसा रहता है और सद्कर्मों में उसकी रुचि न्यूनतम होती है।
2. जब शुद्र श्रेणी का व्यक्ति उच्चकोटि की व्यक्ति की सेवा करता है, उनके सानिध्य में रहता है तो उसके तमोगुण कम होते जाते हैं, सद्गुण आने लगते हैं। दैवी सम्पद की वृद्धि के साथ ही वही व्यक्ति शुद्र से वैश्य श्रेणी का साधक हो जाता है।
3. जैसे जैसे सद्गुणों का विकास इंसान के अंदर होते जाता है आसुरी गुण भी उस व्यक्ति पर हावी होने का प्रयास करते हैं। आप जब जब अच्छा इंसान बनने की कोशिश में लगते हैं हमारी इन्द्रियाँ यानी सेंसेज हमें उकसाते हैं, काम क्रोध की अधिकता होने लगती है। दैवी और आसुरी गुणों के संघर्ष की ये अवस्था आंतरिक युद्ध को जन्म देती है। जब इंसान इस अवस्था में पहुँचता है तो उसमें प्रकृति से उत्पन्न गुणों को काटने की क्षमता विकसित हो जाती है। यही उसके क्षत्रिय श्रेणी का साधक बनाता है। इसी अवस्था में ही सद्गुणों का आसुरी गुणों से युद्ध होता है। यही तो क्षत्रिय धर्म है यानी क्षत्रिय का कर्तव्य है कि वह दुर्गुणों, आसुरी गुणों और इन गुणों से उपजे अव्ववस्था और इन गुणों के वाहकों का अंत करे अर्थात उनके विरुद्ध युद्ध करे।
4.आसुरी गुणों के विरुद्ध दैवी गुणों के संघर्ष के परिणाम में जब दैवी गुण दुर्गुणों को समाप्त कर देते हैं तो मन का शमन, इन्द्रियों का दमन हो जाता है । इस अवस्था में सरलता, सहजता, ज्ञान, दया, प्रेम, जैसे सद्गुण ही बच जाते हैं जो ब्राह्मण का प्रतीक है। ब्राह्मणत्व के विकास के साथ ही वह व्यक्ति परमब्रह्म में प्रवेश पाता है।
ब्राह्मणत्व की प्राप्ति ही आत्मसाक्षात्कर है। इस अवस्था में व्यक्ति को अपने वास्तविक बोध यानी सेल्फ यानी अपनी आत्मा अर्थात आत्मस्वरूप का ज्ञान होता है।
प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा तो समान है लेकिन उसका व्यक्तित्व उसके मन-मस्तिष्क और बौद्धिकता से बनता है जो हमें दिखता है। इस व्यक्तित्व का निर्धारण व्यक्ति के अंदर के तीनों गुणों की अनुपातिक मात्रा पर निर्भर करता है। इन गुणों की मात्रा स्थिर नहीं होती बल्कि बढ़ती घटती रहती है और इस प्रकार एक ही शुद्र से लेकर ब्राह्मण तक कि यात्रा करता है।
अब पुनः हम श्रीकृष्ण की इस शिक्षा पर ध्यान दें कि हमारा आचरण हमारे स्वधर्म के अनुसार होना चाहिए। अर्थात हमें अपना कर्तव्य अपने गुणों के अनुसार ही निर्धारित कर आगे की यात्रा करनी चाहिए। तभी हम कर्मिक विकास कर आत्मा को पहचान पाते हैं। किसी दूसरे की नकल करने से हम उसके गुणों को नहीं पा सकते। कोई अन्य अगर अन्य श्रेणी का है और अगर हम बिना उन गुणों को प्राप्त किये मात्र उस व्यक्ति की नकल करेंगे तो उस व्यक्ति के अनुसार तो आचरण नहीं ही कर पाएंगे, अपने अंदर जो करने की क्षमता है वह भी नहीं कर पाएंगे। इसी को कहते हैं कि न माया मिली न राम!
प्रत्येक व्यक्ति का अपना कुछ कर्तव्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति का स्वयं के प्रति, परिवार के प्रति, समाज के प्रति, अन्य जीव जंतुओं और परिवेश के प्रति और ईश्वर के प्रति कुछ कर्तव्य होते हीं हैं जिनका निर्वाहन करना ही धर्माचरण होता है। यदि हम इन कर्तव्यों को नहीं करते तो हम अपने धर्म का पालन नहीं करते। हम लाख ज्ञान बघारें, जो भेष धारण कर लें उससे कुछ नहीं होने वाला । यदि आप धर्म के मार्ग पर चलना चाहते हैं तो हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना ही होगा। हो सकता है कि हमारे कुछ कर्तव्य हमें अच्छे नहीं लगें लेकिन उनको करना ही अगर हमारा कर्तव्य है तो करना ही एकमात्र सही रास्ता है।
अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक है तो उसका दायित्व है कि वह अनाचार अत्याचार, अधर्म के विरुद्ध खड़ा हो, उनसे युद्ध करे। साथ ही उसका दायित्व है कि खुद के अंदर के आसुरी गुणों। जैसे माया , मोह , भ्रम आदि को काटे।
अर्जुन का युद्ध हम सब का युद्ध है। हम सभी गुणों की विकासयात्रा के अलग अलग पड़ाव पर होते हैं और अपने गुणों। के अनुसार हमारे निम्न दायित्व हैं---
1.हमारा आचरण हमारे गुण के अनुसार हो।
2.हम जिस गुण की अवस्था में हैं उससे विकसित अवस्था में पहुँचने हेतु अपने गुणों को परिमार्जित करें।
3. गुण की जो अवस्था है, उसके अनुसार हमारे जो कर्तव्य हैं उनका भली प्रकार पालन करें
इसी मार्ग से हम आत्मसाक्षात्कार के उपरांत ब्रह्म को प्राप्त होंगे।
गीता अध्याय 2 श्लोक 32
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यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥
हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं
॥32॥
कर्तव्य पालन की आवश्यकता को समझाने के बाद श्रीकृष्ण कर्तव्यपालन के महत्व को बताते हैं। जब हम अपने निर्धारित कर्म को करते हैं तो हमें परम शांति की प्राप्ति होती है। जब हम अपने निर्धारित कर्तव्य को करते हैं तो निश्चित रूप से हम अपनी वर्तमान अवस्था से ऊपर ही उठते हैं और हमारे गुण और ज्यादा परिष्कृत होते हैं । ये तथ्य भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टिकोण से सही है।
यदि भौतिक दृष्टिकोण से देखे तो पाते हैं कि जब हम अपना कर्तव्य पूरा करते हैं तो हम अपने लक्ष्य को हासिल करते हैं और एक कदम आगे ही बढ़ते हैं। इस दृष्टिकोण से देखे तो पाते हैं कि अर्जुन एक क्षत्रिय है जिसका परम् कर्तव्य समाज से अनाचार, अत्याचार को समाप्त करना होता है ओर यदि आवश्यक हुआ तो इसके लिए आतताई का संहार भी करे। कौरव पक्ष छल से पांडवों का हक मारे हैं। ऐसे में अर्जुन और पांडव पक्ष का यही कर्तव्य है कि वे इस अत्याचार, असत्य, अनाचार को समाप्त करने के लिए कौरवों का नाश करें।
दूसरी ओर यदि हम इसके आध्यात्मिक पक्ष को देखें तो पाते हैं कि आसुरी गुणों से युक्त तमोगुण को समाप्त करने हेतु ये आवश्यक है कि देवी सम्पद आसुरी सम्पद को समाप्त करें। जब भी दैवी सम्पद को हम अपने अंदर मजबूत करने का प्रयास करते हैं, क्रोध, मोह, माया, अहंकार, भ्रम आदि आसुरी गुण रास्ते में खड़े हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में इन आसुरी सम्पद का नाश करना ही एकमात्र विकल्प होता है। यही हमारा कर्तव्य भी होता है। जब हम ऐसा करते हैं तो हमारे गुणों का स्तर बढ़ता है और हमारा वर्ण क्रमशः आगे बढ़ते बढ़ते हमें आत्मसाक्षात्कार यानी अपनी आत्मा की प्राप्ति की तरफ ले जाता है। आत्मसाक्षात्कार के पश्चात ही हमें ब्रह्म में प्रवेश की योग्यता मिल पाती है।
अपने कर्तव्यों का पालन कर लक्ष्य की तरफ बढ़ने का अवसर विरले लोगों को ही मिलता है। कई स्थितियों में तो हम पाते हैं कि कर्तव्य का भान रहने के बावजूद भी स्थितियाँ इस तरह से प्रतिकूल होती हैं कि हमें जो करना चाहिए उसे हम कर भी नहीं पाते, सो कर्तव्यपालन का सुअवसर मिलना भी एक बड़ी उपलब्धि होती है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 33
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अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥
किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा
॥33॥
कर्तव्यपालन के दायित्व से भागने वाले को हानि ही हानि मिलती है। श्रीकृष्ण के अनुसार हानियों की श्रृंखला लम्बी है। इनका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि कर्तव्य पालन से भागने के कारण निम्न हानि होते हैं---
स्वधर्म से च्युत होना
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अपने स्वभाव/गुण के अनुसार जो हमारे कर्तव्य हैं उनको हम गँवा देते हैं जिसके कारण गुणों की वर्तमान अवस्था से हम आगे नहीं बढ़ पाते, बल्कि उससे नीचे ही गिरते हैं। स्वभाव में। दैवी सम्पद कम होने से आसुरी गुणों में वृद्धि ही होती है जिसके कारण साधना की उच्च अवस्था से निम्न अवस्था में हमारी अवनति होती है।
इस कारण से सांसारिक/भौतिक रूप से हमारी पहचान भी प्रभावित होती है । हम जिस मेधा के लिए जाने जाते हैं उसका क्षरण होता है। ये तथ्य समाज के हर स्तर पर हर व्यक्ति के साथ लागू होता है।
अपकीर्ति प्राप्त होना
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जब हम स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार क्रियाशील नहीं होते तो न सिर्फ साधना की अवस्था से गिरते हैं बल्कि इस पतन के कारण बढ़े हुए आसुरी गुण हमारी अपकीर्ति को ही बढ़ाता है। साधना की अवस्था के अनुसार कर्तव्य का निर्वहन कीर्ति देता है लेकिन इसका प्रतिकूल होने पर अपकीर्ति मिलती है।
भौतिक संसार में भी जब हम अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार कार्य नहीं करते हैं तो हमारी बदनामी होती है। व्यक्ति विशेष से उस व्यक्ति की क्षमता के अनुसार समाज को हमसे कर्तव्य पालन की उम्मीद होती है। यदि हम ऐसा नहीं करते तो हम जिस अवस्था में होते हैं , जिस सोपान पर होते हैं उसी के अनुसार बदनामी भी मिलती है हमें।
पाप प्राप्त होना
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पाप और पुण्य की अवधारणा हमारे स्वभाव के गुण की अवस्था पर निर्भर करती है। स्वभाव यह स्व गुण की अवस्था के अनुसार हमारे जो कर्तव्य होते हैं उनका निर्वहन ही पूण्य है और उनका निर्वहन नहीं करना ही पाप है। जब हम कर्तव्य का पालन करते हैं तब हमारे अंदर दैवी गुण बढ़ते हैं , आसुरी गुण कम होते हैं , हम साधना की उच्चतर अवस्था में प्रवृत्त होते हैं अर्थात पूण्य को प्राप्त होते हैं। यदि इसके विपरीत होता है तो आसुरी गुण बढ़ते हैं जिससे पाप की वृद्धि होती है।
भौतिक /सांसारिक समाज में भी इसी को दुहराया जाता है। यदि हम अपने निर्धारित कर्तव्य को करने में असमर्थ होते हैं तो हमारी जगहँसाई ही होती है। कर्तव्य से गिरा इंसान ही पापी कहलाता है।
प्रस्तुत स्थिति युद्ध की है सो श्रीकृष्ण युद्ध के सम्बंध में कह रहे हैं, अन्य स्थितियों में भी यही बात लागू होती है। क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के आंतरिक युद्ध में जब हम गुणों के अनुसार आचरण कर दैवी सम्पदाओं की वृद्धि करने में असमर्थ होते हैं हमारे अंदर आसुरी गुणों की वृद्धि होती है जिससे पाप वृत्ति की बढ़ोत्तरी होती है। समझने वाली बात यही है कि व्यक्ति का जो कार्य उसके कर्तव्य से परे है वही उस व्यक्ति के लिए पापकर्म है।
उपरोक्त तीनों अधोगति अपरिहार्य युद्ध सहित किसी भी निर्धारित कर्तब्य से मुँह मोड़ने पर प्राप्त होता ही है।
इस बात का ध्यान रहे कि पाप और पुण्य कोई बाहरी सत्ता निर्धारित नहीं करती है। हम स्वयम के कर्मों का ही परिणाम भुगतते हैं। पाप और पुण्य, कीर्ति और अपकीर्ति हमारे अपने ही कर्मों के स्वाभाविक परिणाम होते हैं। सो हमें इस बात पर ध्यान रहे कि किसी भी परिस्थिति में हम कर्तव्यच्युत नहीं हों अन्यथा हमें जो भुगतना होगा भुगतेंगे हीं साथ साथ हमारी वजह से समाज में भी अनाचार, अत्याचार, असत्य, हिंसा, घृणा जैसे आसुरी प्रवित्तियों का जोर बढ़ेगा जिसकी कीमत समाज और प्रकृति को भुगतना ही होगा। आप स्वयं देखें कि आज की परिस्थिति में हमारी कमजोरी के कारण ही समाज और उसके भौतिक , प्राकृतिक और बौद्धिक वातावरण की क्या दुर्गति हो रही है। हम आप सभी यदि खुद का आत्मपरीक्षण करें तो पाते हैं कि हम तो अपने निर्धारित कर्तव्य से विमुख होकर जो कर रहें हैं उसे हीं वापस पा रहें हैं। बोया पेड़ बबूर का तो आम कँहा से पाओगे।
गीता अध्याय 2 श्लोक 34, 35, 36
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अकीर्तिं चापि भूतानि
कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
सम्भावितस्य चाकीर्ति-
र्मरणादतिरिच्यते॥
तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है
॥34॥
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥
और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे
॥35॥
अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥
तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख और क्या होगा?
॥36॥
युद्ध से विमुख अर्जुन को कर्तव्य पालन की शिक्षा देते हुए श्रीकृष्ण उसे बताते हैं कि जब व्यक्ति अपने नियत कर्तव्य अर्थात अपने गुणों के अनुसार निर्धारित कर्तव्य से विमुख होता है तो अपकीर्ति और पाप का भागी तो बनता ही है साथ साथ उसकी कीर्ति सदा सदा के लिए धूमिल हो जाती है। आप एक कर्तव्य से भागते हैं तो उससे मिलने वाली बदनामी उसी तक सीमित नहीं रहती बल्कि सामान्य जन मानस से लेकर आपके समकक्षी तक आपकी बदनामी को कहानी बनाकर प्रचारित करते हैं। कर्तव्य पालन से आप भागते एक बार हैं लेकिन उससे आपकी जो छवि बनती है वो हमेशा हमेशा के लिए लोगों के मन मस्तिष्क पर रह जाती है। इस तरह की बदनामी से क्या हासिल होता है? एक ओर तो आप कर्तव्य पालन के दायित्व निर्वहन से च्युत होकर स्वधर्म, पूण्य और कीर्ति तो गँवाते ही हैं साथ साथ दूसरी ओर इसका कलंक जीवन भर ढोते हैं। इस तरह से जीवन पर्यंत तिल तिल कर जिल्लत भरी जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त भी हो जाते हैं। तब आपको लगता है कि इस तरह से जीने से तो ज्यादा अच्छा मर जाना होता।
इस तथ्य को आध्यात्मिक स्तर पर समझें। जब हम अपने दैवी गुणों को गँवाते हैं तो आसुरी गुण ही बढ़ते हैं। ऐसे आसुरी गुण हमारे अंदर के दुर्गणों को उभरते हैं और हम अपने अंदर के दैवी-आसुरी गुणों के बीच के युद्ध से भाग अपनी समझ को आज्ञान से आच्छादित करते हैं। इस कारण हमारे अंदर की आसुरी प्रवृत्तियाँ हमें आत्मसाक्षात्कर से रोकती हैं। इस कारण समाज में अव्यवस्था , अनाचार, अधर्म भी हम फैलाते हैं जिसके कारण हमारे आसुरी गुण हमें अपकीर्ति देते हैं।
अब हम इस प्रसंग के भौतिक पक्ष को देखें।प्रस्तुत प्रसंग युद्ध का है। युद्ध के मैदान से भागे हुए को भला कौन वीर कहेगा। आप लाख तर्क वितर्क कर लें, अहिंसा और धर्म की दुहाई दे लें लेकिन जन समुदाय से लेकर विशिष्ट जन इसे युद्ध में प्रदर्शित कायरता ही कहेंगे। अर्जुन के युद्ध छोड़ देने से क्या युद्ध रुक जाने वाला था? कतई नहीं। दुर्योधन की जिद्द से भीष्म और द्रोण जैसे भले लोगों को भी युद्ध तो करना ही था। इसी प्रकार अन्य योद्धा भी लड़ते ही। तब जो लड़ते वो अर्जुन को क्या कहते? कायर ही न कहते! दूसरी तरफ अर्जुन के नहीं लड़ने से इस बात की भी सम्भावना बढ़ती कि कौरव युद्ध जीत जाते। तब वो विजय अत्याचार, अनाचार, असत्य, छल की विजय होती जिससे पांडव के साथ साथ आम जन भी प्रभावित होते। तब वो सब अत्याचार, अनाचार की वृद्धि के लिए स्वाभाविक रूप से अर्जुन को ही न दोषी मानते!
आप युद्ध की भूमि से बाहर निकल कर अपने आस पास देखें। व्यक्तियों के कर्तव्य पालन से विमुख होने से समाज और उसकी व्यवस्था चरमराती है तब हम उन उत्तरदायी व्यक्तियों को दोषी ठहरा कर वर्तमान और भविष्य के समस्त इतिहास में उन्हें कोसते रहते हैं। भावी पीढ़ियों के द्वारा भी उन कर्तव्य च्युत व्यक्तियों की कर्तव्यहीनता को कोसते रहते हैं। सो अपकीर्ति तात्कालिक नहीं रहकर सर्वकालिक हो जाती है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 37 एवम 38
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हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥
या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा
॥37॥
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥
जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा
॥38॥
अंत में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्तव्य पालन का परिणाम भी समझाते हैं। कर्तव्य पालन के क्रम में सफलता भी मिल सकती है या फिर आप असफल भी हो सकते हैं लेकिन कर्तव्य पालन में सफलता और विफलता का विकल्प नहीं होता। सफलता और असफलता की चिंता करना व्यक्ति का दायित्व नहीं होता है क्योंकि इन विकल्पों से कर्तव्य पालन का कोई सम्बन्ध नहीं है। व्यक्ति को तो कर्तव्य करना है अन्यथा उसका पतन निश्चित है। कर्तव्य पालन के क्रम में यदि आप सफल होते हैं तो सत्ता की प्राप्ति होती है और असफल होकर वीरगति को प्राप्त होते हैं तो स्वर्ग मिलता है।
अब इस शिक्षा का आध्यात्मिक पक्ष देखे। श्रीकृष्ण किस राजपाट और स्वर्ग की बात कर रहें हैं? स्मरण हो कि अर्जुन तो अपना विषाद व्यक्त करते हुए पूर्व में ही कह चुका है कि उसे यदि स्वर्ग भी मिल जाये, इंद्र पद भी मिल जाये तो भी वो बन्धु बांधवों को मारने वाला युद्ध नहीं करेगा। उसे तो वो राज सुख चाहिए ही नहीं जिसे भोगने के लिए उसके बन्धु, बांधव और मित्रगण न हों। तब भला श्रीकृष्ण अर्जुन को किस स्वर्ग और राजसत्ता का लोभ दे रहें हैं? ध्यान रहे यह युद्ध सिर्फ मैदानों में लड़े जाने वाले युद्ध को नहीं लक्षित है। हम सबके अंदर आसुरी सम्पद और दैवी सम्पद के बीच जो युद्ध चलते रहता है और जब हम अपने अंदर के दैवी सम्पद को समृद्ध करते जाते हैं तो अंतिम विजय नहीं प्राप्त होने की स्थिति में भी हमारा उत्थान ही होता है, हम ऊपर ही उठते हैं अर्थात स्वर्ग की तरफ ही जाते हैं जिसे दैवी सम्पद का वास माना जाता है। और यदि शरीर रहते हमारी दैवी सम्पदाएँ हमारी आसुरी प्रवृत्तियों को समाप्त कर देने में सफल हो जाती हैं तो हम महीम की स्थिति प्राप्त करते हैं यानी ब्रह्म की महिमा का उपभोग कर ब्रह्म में ही मिल जाये हैं। दोनों ही स्थितियों में सफलता तो कर्तव्य में प्रवृत्त होने से ही मिल पाती है, कर्तव्य से भागने से नहीं।
इसी प्रसंग को हम भौतिक रूप से भी समझ सकते हैं। कर्तव्य पालन करने पर यदि हम असफल ही हो जाते हैं तो भी समाज की नजर में हमारी प्रतिष्ठा बढ़ती ही है। जो कर्तव्य से भाग जाते हैं वे तो अपकीर्ति के भागी होते हैं लेकिन जो कर्तव्य का पालन करते हैं वे अगर सफल होते हैं तो उनको इक्षित स्थान प्राप्त होता है और वे सुखी होते हैं। यदि असफल भी हो गए तो उनके प्रयासों की सराहना तो होती हीं है, वे प्रसंसा के पात्र तो होते ही हैं। वस्तुतः व्यक्ति को अपनी मानसिक दुर्बलता को त्याग कर बिना हार या जीत की चिंता किये अपने निर्धारित कर्तव्य में लगा रहना चाहिए, यही श्रीकृष्ण समझा रहें हैं।
उपरोक्त आचरण करने से कर्तव्य च्युत को कर उसके परिणाम पाप से मुक्त रहेगा व्यक्ति।
सो श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सभी का आवाहन करते हैं कि हर चिंता, विषाद को त्यागकर हम अपने गुणों की अवस्था के अनुसार, अपनी परिस्थिति के अनुसार अपने कर्तव्य यानी युद्ध में प्रवृत्त हों।
सारांश
आत्मबोध की शिक्षा देने के पश्चात श्रीकृष्ण रुकते नहीं हैं वरन उस शिक्षा के अन्य आयामों को सामने रखते हैं। श्लोक 31 से 38 तक श्रीकृष्ण स्वधर्म की शिक्षा देते हैं। वस्तुतः श्रीकृष्ण क्रमिक रूप से अर्जुन को शिक्षा दे रहें हैं। विषादयुक्त अर्जुन जब श्रीकृष्ण की शरण में समाधान हेतु आता है तो श्रीकृष्ण उसे निम्न क्रम से शिक्षा दे रहें हैं
1.सत् यानी सेल्फ यानी आत्मा का बोध कराते हैं जो परम् सत्य है और जिसकी समझ ही विषादों का अंत कर सकती है।
2.तत्पश्चात श्रीकृष्ण समझाते हैं कि व्यक्ति के लिए कौन सा कार्य करना आवश्यक है
3. इसके बाद श्रीकृष्ण उस दृष्टिकोण को बताते हैं जिसके बिना मनुष्य स्वधर्म का पालन अर्थात अपना निर्धारित कर्तव्य नहीं कर सकता है।
4.इसके उपरांत श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म करने की विधि बताते हैं।
5.तब समझाते हैं कि इस प्रकार कर्म में प्रवृत्त मनुष्य के लक्षण क्या होते हैं।
अभी तक श्रीकृष्ण द्वितीय अध्याय में उपरोक्त तीन चरणों को पूरा कर चुके हैं। तीसरे चरण में अर्जुन को दृष्टिकोण के सम्बंध में प्रारंभिक ज्ञान दे चुके हैं श्रीकृष्ण। हम भी इस अध्ययन के क्रम में पाए हैं कि श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को हम आध्यात्मिक और भौतिक रूप से किस प्रकार अपने जीवन के हर प्रसंग में लागू कर सकते हैं।
मनुष्य संसार को, अपने परिवेश को, अपने जीवन को तीन कारकों के मेल से समझता है, उनको अवधारणा के स्तर पर महसूस करता है-ये तीन कारक हैं शरीर, इन्द्रियाँ,एवम बौद्धिकता। इन तीन के मेल से मनुष्य संसार को, परिवेश को, जीवन को समझता है, उनकी व्यख्या करता है। आत्मसाक्षात्कार के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु मनुष्य को स्वधर्म के मार्ग पर चलना होता है जो उस मनुष्य विशेष की गुणों की अवस्था पर निर्भर करता है। ये स्वधर्म उसके गुणों की अवस्था से निर्धारित किये गए कर्तव्य ही होते हैं जिनका पालन करना उसके लिए लक्ष्य प्राप्ति हेतु अनिवार्य है। अंत में श्रीकृष्ण बताते हैं कि मात्र कर्तव्य की समझ हो जाना और उसके पालन करने का प्रयास करना ही यथेष्ट नहीं है बल्कि कर्तव्यपालन का दृष्टिकोण भी सही होना चाहिए।
यँहा योग की अवधारणा को अतिसंक्षेप में जान लेना जरूरी है। मनुष्य का अपने स्व/सेल्फ/आत्मा से जुड़ना ही योग है जिसकी अंतिम परिणति में आत्मा का परम ब्रह्म से जुड़ना होता है। अर्थात मोक्ष की प्राप्ति होना ही योग है लेकिन ये योग का परिणाम है, उसके पूर्व जो मार्ग है उसके विभिन्न प्रकार हैं, यथा ज्ञानयोग, कर्मयोग, समत्व योग आदि।
अभी हमने देखा कि आत्मबोध के लक्ष्य का ज्ञान होने के उपरांत उस हेतु कर्तव्यबोध होना और उस कर्तव्य का पालन करना तो अनिवार्य है ही लेकिन यह तभी सम्भव है जब उस कर्तव्यपालन का यथेष्ट दृष्टिकोण भी हो हमारी बौद्धिकता में।
ये दृष्टिकोण है स्मतवयोग का। ये समतवयोग तीन स्तर पर होता है
1. अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति में सुख और दुख का अनुभव होना,
2.लाभ और हानि की परिस्थिति में हर्ष और विषाद का अनुभव होना
3.उपलब्धि और अनुपलब्धि की स्थिति में जय और पराजय का अनुभव होना।
इन्ही तीन भावनाओं की परिधि में भौतिक संसार के हमारे अनुभवों पर हमारी प्रतिक्रिया होती रहती है और सामान्य जन इन्हीं से प्रभावित होकर अपनी चेष्टाओं को क्रिया रूप देते रहते हैं। लेकिन श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से समझाते हुए कहते हैं कि उक्त तीनों परिस्थितियों में हमें प्रतिक्रियाविहीन होना चहिये अर्थात अनुकूल परिस्थिति में न तो सुखी होनी चाहिए और न ही प्रतिकूल परिस्थितियों में दुखी; लाभ में न तो हर्ष होना चाहिए न ही हानि में विषाद; सफलता की स्थिति में जय का भाव और असफलता की स्थिति में पराजय का भाव नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी स्थिति में समान रूप से रहना चाहिये। यही समभाव की स्थिति होती है। यही समत्व योग है। इस दृष्टिकोण से कर्तव्य पालन में लगने वाला मनुष्य हर प्रतिकूल भाव से मुक्त होता है , उसके मन पर कोई बोझ नही। होता, वह हर हाल में प्रफ्फुलित रहते हुए कर्तव्य पालन में लीन होता है।
ध्यान रहे श्रीकृष्ण ये नही कहते कि ईश्वर आपके दुखों को हर लेगा। कोई तंत्र मंत्र से आपकी परेशानियाँ खत्म हो जाएंगी और हमेशा आपके अनुकूल ही सबकुछ होगा। गजतनाएँ घटित होती रहती हैं , देखने में वे अनुकूल और प्रतिकूल प्रतीत होती हैं लेकिन हमपर आप पर उनका उतना ही अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जितना हम उनको अनुमति देते हैं। यदि हम सम भाव में रहने की शिक्षा को अपनाते हैं तो ये घटनाएँ कोई भी प्रभाव छोड़ने में निष्फल रहती हैं। लेकिन यदि यह समभाव नही। है हम में तो फिर हम सदा ही हर्ष विषाद में डूबते उतराते रहते हैं और क्षण में खुश हो जाते हैं , क्षण में दुखी। इस कारण से हम आत्मावलोकन करने से वंचित रह जाते हैं। यदि हम अपने कर्तव्य को समझ भी लें लेकिन हम में समत्व का भाव नही। है तो हम कर्तव्य का पालन कर ही नही। सकते। ऐसी स्थिति में विषाद, दुख और पराजय के डर से कर्तव्य से पलायन कर जाते हैं। कर्तव्य निर्वहन की इस प्रक्रिया में आवश्यक है कि हम आध्यात्मिक, भौतिक, व्यवहारिक, नैतिक स्तर से समग्रता से चीजों का आकलन करें।
अर्जुन युद्धक्षेत्र में खड़ा है , युद्ध की विभीषिका के सम्बंध में सोचकर व्यथित है, युद्ध नहीं करना चाह रहा है सो श्रीकृष्ण उसे युद्ध की पृष्ठभूमि में समझा रहें हैं। द्वितीय अध्याय के श्लोक 31 से 38 तक श्रीकृष्ण इस ज्ञानयोग और कर्मयोग के बीच फँसी हमारी व्यवहारिक/सांसारिक बुद्धि को भी स्पष्ट करते हैं , दुनियादारी भी समझाते हैं। वे यह भी समझाते हैं कि आगे जो मार्ग है वो कर्म का तो है लेकिन वो बुद्धि युक्त है अर्थात उसमें एक दृष्टिकोण भी है। मात्र करने से कुछ नहीं होगा, करने के पीछे एक स्पष्ट बुद्धि भी होनी चाहिए। अर्थात चित्त की समझ और संशय का अभाव होना चाहिए। कर्म करते हुए लक्ष्य हासिल होने के साथ ही कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। जब लक्ष्य मिल गया तो बन्धन कैसा। इस अवस्था में हमें आनंद की प्राप्ति होती है यानी सभी दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है। परमब्रह्म की प्राप्ति होती है। सत् चित और आनंद से युक्त हमें सच्चिदानंद स्वरूप मिलता है जो अंतिम लक्ष्य है!
हमारे जीवन में हर घड़ी यही द्वंद्व लगा रहता है। हमेशा एक युद्ध की स्थिति हमारे अंदर बनी हुई रहती है कि ये करें कि वो करें। सो श्रीकृष्ण की ये शिक्षा हर कदम पर हमारा मार्गदर्शन करती है। बिना दर्शनशास्त्र की शब्दावली में उलझे यदि हम श्रीकृष्ण की शिक्षा को सहजता से स्वीकारते हैं तो हम हर कदम पर सारे संशय से मुक्त होकर कर्म करते आगे बढ़ते जाते हैं।