श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण भाग 4--श्रीमद्भागवद्गीता के अनुसार आत्मा को समझने का एक प्रयास
श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण भाग 4--श्रीमद्भागवद्गीता के अनुसार आत्मा को समझने का एक प्रयास श्लोक 11 से 30
श्रीमद्भागवद गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण- अध्याय 2 भाग 2 -अनश्वरता और परिवर्तन श्लोक 11 से 15
शोकाकुल अर्जुन के दिलोदिमाग पर श्रीकृष्ण की पहली हीं पंक्तियाँ बहुत कड़ी पड़ती है। शब्दों के विन्यास से लगता है कि एक तरह की झिड़की मिलती है अर्जुन को कि वह वैसे लोगों के लिए दुखी हो रहा है जिनके लिए दुखी होने की कोई जरूरत नहीं है। फिर एक बार और कड़े शब्द उसे सुनने को मिलते हैं कि वह बातें तो ज्ञानी सा कर रहा है पर है नहीं ज्ञानी , क्योंकि ज्ञानी न तो मरने वाले के लिए दुखी होते हैं न ही जीने वाले के लिए।
इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण पहली ही पँक्ति में अर्जुन की समझ को साफ साफ नकार देते हैं। जीने और मरने वालों के लिए दुख व्यक्त करना मूर्खता है। और अर्जुन की तरफ से जो भी तर्क अब तक दिए गए हैं श्रीकृष्ण उन सभी को बेकार ही मानते हैं।
अब सवाल उठता है कि श्रीकृष्ण ऐसा क्यों कह रहें हैं। अर्जुन तो युद्ध का, मार काट का विरोध ही न कर रहा है, वह तो युद्ध के पश्चात समाज में फैलने वाली परिस्थिति की ही न बात कर रहा है, वो यही न कह रहा है कि भीष्म और द्रोण जैसे महात्मनों को मारना उचित नहीं है । अब भला शांति चाहने और शांति का तर्क देने वाला अर्जुन गलत कैसे हो गया? इस तथ्य को समझना अति आवश्यक है क्योंकि इसे समझे बिना गीता की शिक्षा को समझा ही नहीं जा सकता है।
श्रीकृष्ण ने आगे के श्लोको और अध्यायों में इसी को विस्तार से समझाया है। यँहा ये समझने वाली बात है कि हम चीजों को , घटनाओं को वैसे ही देखते हैं जैसे हम खुद को समझते रहें हैं। हमारी खुद के प्रति समझ के तीन भाग होते हैं, शारीरिक, मानसिक/भावनात्मक और विवेकात्मक। हम खुद को तीन तरह से देखते हैं, एक अपने शरीर की तरह, एक अपनी भावना की तरह और एक अपनी बुद्धि, अपने विवेक की तरह और अपने इसी समझ के अनुसार हम सब अलग अलग तरीके से चींजों को देखते हैं। किसी की मृत्यु से कोई दुखी होता है तो किसी को खुशी होती है, किसी की सफलता से कोई खुश होता है तो किसी की आँखों में वो सफलता गड़ती है। कोई प्रश्न किसी के लिए असाध्य होता है तो किसी के लिए वही प्रश्न खिलौना की तरह होता है। तो क्या उस घटना का , उस वस्तु का अपना कोई स्वरूप नहीं होता कि उसका अस्तित्व हमारी अपनी समझ से निर्धारित होता है? ऐसे में एक सवाल तो उठता ही है कि क्या कोई स्थायी स्वरूप नहीं होता जो हर परिस्थिति में समान रहे? इस प्रश्न का उत्तर तो है लेकिन उस उत्तर तक पहुँचने के पूर्व ये जरूरी है कि हम पहले खुद को तो जाने कि हम कौन हैं। क्या हम नित्य बदलने वाले जीव मात्र हैं जिसकी अपनी समझ कोई नहीं होती बल्कि परिस्थिति जन्य ही हमारा अस्तित्व है? ये समझना इसलिए भी अनिवार्य है क्योंकि निरन्तर बदलते शारीरिक , भावनात्मक और बौद्धिक अवस्था से क्या सत्य निर्धारित हो सकता है।
श्रीकृष्ण इसी शाश्वत की समझ रखते हैं सो उनको अर्जुन का यह व्यवहार सत्य के विपरीत लगता है। अभी तक तो अर्जुन युद्ध के लिए तैयार था तो फिर अचानक भीष्म और द्रोण को देखते यह ज्ञान कँहा से आ टपका? क्या अर्जुन को युद्ध प्रारम्भ होने के पूर्व युद्ध की विभीषिका की जानकारी नहीं थी? क्या युद्ध उसके लिए कोई नई चीज थी? ऐसे ही तमाम सवाल हम अर्जुन को लेकर उठा सकते हैं। तो फिर ये असमंजस क्यों?
हम सभी अपने जीवन के अलग अलग प्रसंगों में इसी असमंजस में जीने के आदि हो गए हैं जिसके कारण हम अधिकांश समय तनाव और विषाद में ही बिताते हैं फिर चाहे हम घर में हों, विद्यालय में हों, दोस्तों के साथ हों , नौकरी व्यवसाय में हों या नितांत अकेले ही क्यों न हों। यदि हम आप अपने एक दिन का मानसिक अवस्था का टाइम चार्ट बनाएं तो पाएंगे कि हमारा अधिकांश वक़्त तनाव और चिंता में ही बीतता है । ऐसा नहीं कि जिनके पास कम ज्ञान है, कम साधन है सिर्फ उनकी ही स्थिति ऐसी रहती हो। जिनके पास प्रचुरता है वो भी तो ऐसी ही अवस्था में रहते हैं। सो तय है कि हमारे तनाव और विषाद का कारण बाहर की दुनिया में कम और अपने भीतर की दुनिया में अधिक होता है। संसाधन की आवश्यकता तो है लेकिन संसाधन ही हमारी संतुष्टि और प्रसन्नता का निर्धारक हो ये कतई जरूरी नहीं।। होता यह है कि हम अपना अधिकांश समय बाहरी कारकों के प्रति प्रतिक्रिया को जीने में गुजरते हैं बिना ये जाने बुझे कि हम वास्तव में कौन हैं और बिना ये समझे कि बाहरी कारक हमपर उतना ही प्रभाव छोड़ सकते हैं जितना हम खुद को समझते हैं। दुनिया के आर्थिक विकास और संसाधनों के सबसे ऊँचे पायदान पर खड़े देशों, समाजों के लोग जरूरी नहीं कि सबसे खुशहाल जीवन जी रहें हों। हाल में विकसित किया गया हैप्पीनेस इंडेक्स इसकी तकसीद भी करता है। सो सबसे जरूरी है कि सबसे पहले हम ये समझें कि हम वास्तव में कौन हैं, हमारी क्रियाएँ क्या हैं? श्रीकृष्ण इसी सत्य की तरफ इशारा कर रहें हैं जिसे वे आगे स्पष्ट करते जाएंगे।
इस सत्य को श्रीकृष्ण अनश्वरता और परिवर्तन, आत्मा, कीर्ति, कर्म, धर्म, दैवी और आसुरी गुण, भक्ति आदि माध्यमों से अर्जुन के माध्यम से हम सभी के समक्ष रखेंगे।
अर्जुन के विषाद को अकारण होने का कारण बताते हुए श्रीकृष्ण पहली बार आत्मा की अमरता और अजरता की तरफ अप्रत्यक्ष रूप से ध्यान खींचते हैं जिसे आगे और स्पष्ट भी करते हैं। विषाद या दुख किसके लिए हो सकता है? दुख या विषाद हमें तब होता है जब हमें लगता कि कोई चीज हमसे छूट रहा है या छूट गया है या छूट जाएगा। विलगाव का भय हमें दुखी करता है। अर्जुन को भी इसी से दुख है। लेकिन श्रीकृष्ण का कथन है कि हम जिसे विलगाव होना समझ रहें हैं वो दरअसल विलगाव है ही नहीं। निरन्तरता ही सत्य है भले स्वरूप भिन्न हो। हम स्वरूप को ही प्राथमिक समझते हैं , हमें लगता है कि जिसका आकार है, जिसमें स्पंदन है, जिसमें निर्णय लेने की क्षमता है वही मात्र जीवन की पहचान है।
हमारा ज्ञान इतना भर ही है कि शरीर की समाप्ति के साथ जीव का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। यह सोच यह समझ पूरी तरह से सिरे से गलत है। स्वरूप या शरीर का खत्म होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । लेकिन जब हम गहराई से सोचते हैं तो पाते हैं कि शरीर हमारी पहचान नहीं है। कुरूप से कुरूप व्यक्ति भी अपनी अभिव्यक्ति से अपने रूप से भिन्न हो सकता है। वस्तुतः अपने या अन्य के होने का भान यानी ईगो यानी अहम स्थूल शरीर, भावना और बुद्धि से मिलकर बनता है जबकि अभिव्यक्ति तो आत्मस्वरूप यानी सेल्फ से होता है जो आकारविहीन है। हम आप जानते हैं कि हर चीज मैटर से बना होता है, और मैटर अंततः परमाणु से बना होता है। मैटर और ऊर्जा आपस में परिवर्तनीय होते हैं। ऊर्जा का न तो निर्माण होता है न ही विनाश, बस उसका स्वरूप परिवर्तन ही हो सकता है। हमें भ्रम होता है कि हमने विधुत पैदा कर लिया, ऊष्मा पैदा कर दिया, प्रकाश ला दिया आदि आदि। ये सब हमारा भ्रम मात्र है। हम ऊर्जा को नहीं बनाते अपितु उसका स्वरूप बदलते हैं। इसी प्रकार हम मैटर का नाश नहीं कर पाते। मैटर समाप्त नहीं होता वह तो ऊर्जा का रूप ले लेता है। इसी प्रकार जीव का नाश नहीं होता , उसका स्वरूप बदलता है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण कहते हैं कि समय के हर काल में कृष्ण भी रहें हैं, अर्जुन भी रहा है और अन्य सभी भी रहे हैं और ये सब हमेशा रहेंगे, स्वरूप चाहे जो हो।
जीवन के प्रत्येक प्रसंग में अनश्वरता का बहुत महत्व है।कोई भी चीज नश्वर नहीं बल्कि मात्र परिवर्तनशील है। सो प्रत्येक समय हमें ये जानना समझना जरूरी है कि यदि कोई ऊर्जा हमें नकारात्मक ढंग से प्रभावित कर रही है तो उसमें ऊर्जा की नहीं हमारे ईगो की भूमिका है। उससे सकारात्मकता म कैसे प्राप्त की जाए ये सेल्फ यानी आत्मबोध की समझ पर निर्भर करता है। ऊर्जा का स्वरूप परिवर्तनशील है।जब हम ये समझते हैं तो कोई विषाद नही हो सकता, कोई भ्रम नही हो सकता।
अनश्वरता की ये समझ हमें दार्शनिक स्तर के साथ साथ व्यवहारिक स्तर पर भी मदद पहुँचाती है। हर प्रसंग में निर्णय और निर्णय के अनुसार क्रिया के दो पक्ष होते हैं। एक पक्ष हमें सत्य, न्याय, धर्म की तरफ ले जाता है और दूसरा ठीक इसके विपरीत असत्य, अन्याय और अधर्म की तरफ। युद्ध का मैदान तो एक ही है, साध्य यानी राज्य जिसे हासिल करना है वो हस्तिनापुर भी एक ही है लेकिन साधन भिन्न। अर्जुन अभी भी युद्ध की धार्मिकता, सत्यता और न्याय के पक्ष को समझने की कोशिश कर रहा है। योद्धा होने के नाते वह चाहता तो सीधे युद्ध की बात करता, साध्य को देखता, लेकिन वह युद्ध के पहले युद्ध के साधन को समझना है। युद्ध कला में दोनों पक्ष समान रूप से सामर्थ्यवान हैं लेकिन अर्जुन तमाम सामर्थ्य के बावजूद साधन की शुचिता को निर्धारित कर लेना चाहता है। इसके विपरीत कौरव पक्ष युद्ध के स्वरूप को ध्यान में नहीं रखता है, उसके लिए साधन की शुचिता मायने नहीं रखती।
हमें अपने अपने जीवन प्रसंगों में ऊर्जा की निरंतरता और अनश्वरता को समझना चाहिए। अति सामान्य शब्दों में समझें तो बात इतनी भर है कि सत्य हमेशा रहा है। यदि समय के किसी भी पहर में हम सनातन सत्य को वरण करते हैं तो असत को पराजित कर सकते हैं चाहे हमारे सामने असत का जो भी रूप हो, युद्ध हो , या कुछ और।
ध्यान देने की बात यह भी है कि ऊर्जा के इस सनातन प्रवाह को हमें अपने अंदर अनुभव करना होता है। बाहर नहीं। ये हमारे आत्मबोध के स्तर पर हो सकता है हमारे ईगो यानी स्थूल स्वरूप के स्तर पर नहीं। स्थूल का कार्य इतना भर है कि वो शरीर का आधार देता है जो परिवर्तनशील है लेकिन आत्मबोध सनातन है और इसी आत्मबोध की खोज हमारा युद्ध है। आगे श्रीकृष्ण इसे क्षेत्र क्षेत्रज्ञ की परिभाषा से समझायेंगे।
अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण पुनः समझाते हैं कि शरीरों की मृत्यु एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसपर अस्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की जा सकती है। जन्म के पश्चात शरीर की जो विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं उनमें बाल्यावस्था, युवावस्था, बृद्धावस्था तो हैं ही मृत्यु भी एक अवस्था ही है जैसे जन्म और जन्म के पश्चात की अन्य अवस्थाएँ। देह की समाप्ति से कुछ होता नहीं है। जन्म होने के पश्चात हमारी आपकी एक सामाजिक पहचान बनती है और हम जीवन भर उसी सामाजिक पहचान को जीते हैं एक ईगो यानी अपना एक अहम लेकर। लेकिन इस ईगो यानी अहम के अतिरिक्त एक आत्मबोध भी होता है, एक SELF भी होता है जो हमेशा एक सा ही रहता है चाहे जो अवस्था हो। मृत्यु के पूर्व हमारा स्व एक शरीर विशेष में होता है जिससे हम खुद को बाहरी तौर पर पहचानने का दावा करते हैं। लेकिन शरीर की बनावट से हमारे स्व यानी सेल्फ कों कोई लेना देना नहीं होता। वह तो शरीर की बनावट , उसके रूप रंग से मुक्त होता है। बचपन में हमारा शरीर कुछ और होता है, जवानी में कुछ और और बुढापा में कुछ और परन्तु हर अवस्था में हमारा सेल्फ बदल नहीं जाता। उसी प्रकार मृत्यु के पश्चात भी मात्र शरीर का परिवर्तन होता है, हमारी आत्मा का नहीं, हमारे सेल्फ का नहीं, हमारी उर्जा का नही। वह तो फिर नए शरीर को धारण कर लेती है।
अर्जुन युद्ध में मृत्यु के विषय को लेकर ही चिंतित है। युद्ध के अन्य कारणों और परिणामों पर उसका ध्यान नहीं गया है सो श्रीकृष्ण भी उसे सबसे पहले मृत्यु के विषय में बात कर रहें हैं, किंतु आगे वे जीवन के वृहत्तर प्रश्नों को लेते हैं जिससे इसका समाधान होता है कि जीवन और मृत्यु से अधिक महत्वपूर्ण हमारे कर्मों का लेखा जोखा है जो शरीरों के परिवर्तन की श्रृंखला को रोक देते हैं। वस्तुतः मृत्यु एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसे होना है। जिसका होना निश्चित है उसके लिए विषाद कैसा। वो आज हो या कल क्या फर्क पड़ता है। सो श्रीकृष्ण आगे चलकर जीवन के प्रश्नों को लेते हैं, उन प्रश्नों को खुद उठाते हैं क्योंकि अर्जुन की नजर वँहा तक नहीं जा पा रही है।
हम सभी नष्ट होने के भय में जी रहें है। अपने शरीर के अंत के भय में, अपने प्रियजनों के शरीर के अंत होने के भय में। ये भय ही हमें जीने नहीं देता, और इसी जीवन मृत्यु की नासमझी के कारण हम सभी तरह के गलत कार्य करते रहते हैं। क्या दुर्योधन को राज पाट मिल भी जाता तो उसे वह अनंत काल तक भोग पाता? नहीं। फिर उसका भी अंत हो जाता। फिर जो आता वो भी नष्ट हो जाता। तो फिर इतना भ्रम , इतना मोह क्यों? क्योंकि जीवन का वास्तविक अर्थ ही समझ में नहीं आया मृत्यु के भय से।
हम सब इसी भय में जी रहें हैं। आज ये खत्म हो गया, कल वो बिछड़ गया , कल वो खत्म हो जाएगा। कितनी चिंता है हमें खत्म होने के डर से। लेकिन फिर भी हम इस शरीर रूप को खत्म होने से नहीं रोक पाते। इसी भय में हम जीना छोड़ देते है। जबकि ये सत्य बना रहता है कि जो मृत हुआ उसका स्व बना हुआ है।
परिवर्तन संसार का नियम है। आत्मा की अजरता अमरता बताने के पश्चात श्रीकृष्ण अर्जुन को निरन्तरता के महत्व को समझाते हैं। इस संसार में जो भी भौतिक है वह समय के साथ परिवर्तनशील है। इसका अनुभव हमें हमारी इन्द्रियाँ यानी हमारे सेंस कराते हैं। रूप, स्वर, घ्राण, स्वाद और स्पर्श हमारी इन्द्रियों से व्यक्त होती है जो क्रमिक रूप से आँख, कान, नाक जिह्वा और त्वचा से महसूस की जाती हैं। हमारी इन्द्रियाँ भौतिक वस्तुओं को इन इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव करती हैं। तब मस्तिष्क इन अनुभवों की व्याख्या करता है और हम किसी भौतिक वस्तु के प्रति अपनी भावना व्यक्त करते हैं, जैसे यह सुंदर है, दूर है, उसकी आवाज कर्कश है, इसका स्वाद मीठा है, वह गर्म है इत्यादि। इन्द्रियाँ भौतिक तत्व को उसके गुण के अनुसार महसूस तो कर लेती हैं लेकिन प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक अवस्था अपने अनुसार इस अनुभव को व्यक्त करता है। जैसे कोई वस्तु देखने में किसी को सुंदर लगती है तो किसी को सामान्य, कोई तीखापन को बर्दाश्त भी नहीं कर पाता तो किसी के लिए यही स्वादिष्ट होता है, किसी का स्पर्श हमें आनंद देता है तो उसी का स्पर्श अन्य के मन में दूसरे तरह की भावना को जगाता है। इन्द्रियों ने तो सभी में एक ही भाव पाया किन्तु हमारी भावना की अभिव्यक्ति अलग अलग हो जाती है।
इसी प्रकार समय के साथ इन्द्रियों से प्राप्त भाव भी भिन्न भिन्न हो जाते हैं। जो आज हमें प्रिय है हो सकता है कल अप्रिय हो जाये, जो अभी प्रिय है वह अगले कुछ समय में अप्रिय हो सकता है। इसका उल्टा भी हो सकता है। जिस बच्चे के प्रति माँ की ममता सम्भाले नहीं संभलती वही बच्चा बड़ा होकर माँ के लिए दुखदाई भी हो सकता है।आज हमें चाय का स्वाद अच्छा नहीं लगता, कल चाय अच्छी लगने लग सकती है। इनसब में कुछ भी अनहोनी नहीं है।
इस प्रकार समय के साथ साथ हर भौतिक अभिव्यक्ति , हर प्राक्रतिक वस्तु में परिवर्तन अवश्यम्भावी है।कुछ परिवर्तन हठात होते हैं, कुछ क्रमिक। परन्तु बिना परिवर्तन के प्रकृति हो ही नहीं सकती। जीव जन्म लेता है, समय बीतने के साथ साथ उसमें परिवर्तन आता है, बड़ा होता है , बूढा होता है, फिर अंत में मृत्यु को प्राप्त होता है। जैसे जन्म होना हुआ, उसी तरह से मृत्यु होना। मृत्यु भी मात्र एक परिवर्तन ही है। भौतिक रूप से सचेष्ट भौतिक रूप से निश्चेष्ट हो जाता है जैसे अन्य भौतिक या प्राकृतिक स्वरूपों के साथ होता ही है।
जब परिवर्तन इतना व्यापक और अवश्यम्भावी है तो फिर परिवर्तन आने पर हर्ष या विषाद क्यों होना? ये तो होना ही है। एकदम स्वाभाविक बात है।
अब प्रश्न उठता है कि जब परिवर्तन इतना ही निश्चित है तो ये हर्ष और विषाद क्यों परिवर्तन होने पर? दरअसल हमारी सोच इन्द्रियों की अनुभूतियों की हमारी व्यख्या पर निर्भर होती है, तभी हमें परिवर्तन पर हर्ष या विषाद होता है। किसी घटना को हम अपने से जुड़ा मान लेते हैं जबकि उस घटना का स्वतंत्र अस्तित्व होता है, जैसे किसी का मरना। कोई व्यक्ति जिसके प्रति हम कोई भावना नहीं रखते उसे भी प्रकृति के परिवर्तन के नियम के अधीन मरना ही है। लेकिन उसकी मृत्यु से हम पर कोई असर नहीं पड़ता। लेकिन यदि उस व्यक्ति को हम खुद से जुड़ा मान लें तो उसकी मृत्यु से हमे कष्ट या प्रसन्नता होती है। मृत्यु तो तटस्थ है ,होना ही है। उससे दुखी या सुखी तब ही हुआ जाता है जब लगता है कि मृत व्यक्ति का हमसे कोई सम्बन्ध है। ये सम्बन्ध कोई वस्तुनिष्ठ चीज नहीं बल्कि हमारी अपने और पराये की समझ से उतपन्न भाव मात्र है।हम अपनी समझ , अपने भ्रम , अपने मोह के कारण ही एक तटस्थ और अवश्यम्भावी परिवर्तन को इतना बड़ा देते हैं कि हमें शोक या हर्ष होने लगता है।
परिवर्तन की अवश्यम्भावीता सिर्फ मृत्यु को लेकर नहीं है। यँहा प्रसंग युद्ध का है और अर्जुन को भी इसका भान अपने प्रिय पितामह और गुरु के सामने आने के कारण ही है। यदि अर्जन के समक्ष दुर्योधन या दुःशासन होते तो हो सकता था कि अर्जुन के भाव भी भिन्न होते। सो ये समझना जरूरी है कि हर उस जीव या वस्तु से जिसके प्रति हमारे अंदर भाव होता है उसके लिए भावना होती है। ये कुछ भी हो सकता है, मृत्यु सहित कुछ भी। किसी को धन से, किसी को पद से, किसी को नशे से, किसी को मित्र से, किसी को स्त्री या पुरुष से, किसी को नौकरी से , किसी को देश से, किसी को समाज से, किसी को कर्मकांडों से , किसी को पुस्तक या भवन या वाहन से , तातपर्य कि किसी भी भौतिक स्वरूप से भाव का सम्बंध हो सकता है तब इन्द्रियाँ उस भावयुक्त स्वरूप को जब मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं तो हमारी भावना फूट कर बह निकलती है।
जब तक हमारा भ्रम जीवित है ये सुख और दुख होंगे ही। सो भ्रम की समाप्ति तक हमें अपने भ्रम के अनुसार अपने शोक और हर्ष को स्वाभाविक गति मानकर इनके प्रति निर्विकार होने की आदत डालनी चाहिए।
अभी तो श्रीकृष्ण परिवर्तन को एक निश्चित क्रिया मानकर इसे सहन करने को कह रहे हैं, आगे देखेंगे कि श्रीकृष्ण इस भावना से ही मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त कर देंगे।
अभी तक की व्याख्या में श्रीकृष्ण ने शोक,विषाद एवं हर्ष के कारणों को स्पष्ट कर दिया है। अब वे दो तथ्य और बताते हैं, पहला की किस प्रकार के व्यक्ति को हर्ष या विषाद नहीं हो पाता और दूसरा की इस प्रकार के व्यक्ति की क्या उपलब्धि होती है जीवन में।
हमने देखा कि जब इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति और भौतिक चीजों को महसूस करने और उस अनुभव को हमारे मस्तिष्क की अनुभूतियों द्वारा व्यख्या की जाती है तब हमें सुख या दुख का अनुभव होता है। इन्द्रियों को हम प्रकृति से जितना विलग करेंगे इस सुख दुख की अनुभूति से हम उतना ही दूर होंगे क्योंकि इन्द्रियाँ यानी सेंसेस ही सुख और दुख जैसी भावनाओं की उत्पादक और वाहक हैं। लेकिन ये अचानक नहीं हो सकता। इसके लिए सतत अभ्यास की जरूरत होती है। इन्द्रियों को उनके विषयों से समेटने का अभ्यास तब तक करना होता है जब तक इन्द्रियाँ बाह्य प्रकृति से स्वतंत्र न हो जाएं। जब तक ये अभ्यास पूरा नहीं होता तब तक पूरी सावधानी जरूरी है। साथ ही परिवर्तन के अपरिवर्तनिय सिद्धांत को याद रखना अनिवार्य है। याद रखना होता है कि हर वो चीज जो प्रकृति से निकलती है, हर वो चीज जो भौतिक है वो सतत परिवर्तनीय है । वो बिना परिवर्तित हुए नहीं रह सकता। और ये परिवर्तन अंततः स्वरूप परिवर्तन का कारण बनता है। ये सब इतना स्वाभाविक होता है कि इसपर हर्ष या विषाद करने का कोई कारण नहीं । जिसे बदलना है उसे बदलना ही है।
अब देखें कि इस स्थिति को जो इंसान हासिल करता है क्या वो पत्थर की तरह होता है। जी नहीं। अगर वो इंसान पत्थर की तरह हो गया तो फिर उसे ये भी नहीं पता चल सकता कि उसकी वास्तविक प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। वस्तुतः ऐसा इंसान धैर्यवान होता है। दरअसल वो जानता है कि उसे करना क्या है। उसे पता होता है कि उसे परिवर्तन को स्वाभाविक रूप में लेना है और अपनी इन्द्रियों यानी अपने सेन्स को प्रकृति से किस तरह विलग रखना है।
जब हम अभ्यास कर इस परिवर्तन के अपरिवर्तनीय सिद्धान्त को आत्मसात कर लेते हैं तब हमारी इन्द्रियाँ वाह्य संसार से मुक्त हो जाती हैं, बाहरी प्रकृति से प्रभावित होकर न तो सुख दे सकती हैं न ही कोई दुख। यही वो अवस्था होती है जब इंसान प्रकृति से मुक्त हो जाता है। वो अपने जीवन काल में ही प्रकृति से मुक्त हो सकता है। प्रकृति से उसकी यही मुक्ति उसका मोक्ष कहलाता है। ऐसा इंसान वाह्य संसार से अपने को नहीं निर्धारित करता। इस स्थिति में उसका ईगो जो उसके शरीर, उसके इन्द्रियों/भावना और उसकी बौद्धिकता से बने होते हैं तिरोहित हो जाते हैं, उसका अहम और वहम दोनों समाप्त हो जाता और तब उसे मोक्ष यानी मुक्ति मिलती है।
ध्यान दें कि ये शिक्षा श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के परिपेक्ष्य में दिया है। लेकिन जब आप नितांत अकेले होते हैं, समाज में होते हैं, व्यवसाय में होते हैं, या किसी भी अन्य अवस्था में होते हैं अपनी इन्द्रियों के प्रकृति के संयोग के कारण हमें बराबर सुख और दुख मिलते रहते हैं, जिस कारण से हम हम अतिरिक्त तनाव या अत्यधिक लापरवाह और दम्भ की अवस्था में रहते हैं। इससे हमारा जीवन निरुदेश्य हो जाता है। हमें पहुँचना होता है कँही और पहुँच जाते हैं कंहीं। रास्ते से भटकना सिर्फ इसिलए हो पाता है क्योंकि हम सब वाह्य प्रकृति को खोज कर उसी के साथ हम अपने ईगो को जोड़ लेते हैं।
इससे मुक्ति ही मोक्ष है।
अर्जुन को श्रीकृष्ण ने पुरुष श्रेष्ठ कह कर सम्बोधित किया है। दरअसल हम खुद को वैसा ही देखते हैं जैसा लोग हमें देखते हैं। ये प्रवृत्ति हम सब में होती है जो हमारे सेन्स के दूसरों से सम्पर्क के कारण होता है। अतएव अगर हम किसी को प्रोत्साहित करना चाहते हैं तो जरूरी है कि हम उसे अहसास दिलाये कि उस इंसान में बहुत अच्छी क्षमताएँ हैं। अगर उस व्यक्ति को खुद पर भरोसा बढ़ता है तो वह निश्चित ही अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित होता है।
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श्रीमद्भागवद्गीता
सारांश
श्लोक 11 से 15
अर्जुन के विषाद को और धर्म यानी सन्मार्ग की नासमझी को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण ने सर्प्रथम जिस शिक्षा को दिया है उसके महत्वपूर्ण तत्व निम्न लिखित हैं-----
1.इस भौतिक संसार में जो कुछ है वह नश्वर है।
2.ये नश्वरता अवश्यम्भावी परिवर्तन के सिद्धान्त के कारण है, अर्थात प्रत्येक भौतिक वस्तु और जीव का स्वरूप परिवर्तन अनिवार्यतः होता ही है।
3.इस भौतिक संसार और इसके अवयवों को हम अपनी इन्द्रियों के माध्यम से समझते हैं यानी हमारी इन्द्रियाँ निरन्तर इस संसार और इसके अवयवों के सम्पर्क में आती हैं और इन्द्रियों द्वारा अपने गुणों के अनुसार इनका अनुभव किया जाता है जिसे हम अपना अनुभव कहते हैं।
4. जब परिवर्तन और स्वरूप परिवर्तन अवश्यम्भावी है ही तो फिर इन परिवर्तनों पर इन्द्रियों के द्वारा सम्प्रेषित सुख और दुख के अनुसार ही सुखी या दुखी होने का कोई कारण नहीं है। अर्थात हमें इन्द्रियों द्वारा प्राप्त सूचना के प्रति स्थिर रहना चाहिए और सुखी या दुखी होने से बचना चाहिए।
5.परिवर्तन के सिद्धांत के अनुसार सुख दुख के ये सभी भाव अस्थाई ही हैं सो भी इनके प्रभाव से बचना चाहिए।
6. इन्द्रियों द्वारा प्रकृति के अनुभव किये जाने और उन अनुभवों से अपने को अप्रभावित रखने हेतु ताकि हम स्थिरचित्त बने रहें ये आवश्यक है कि हमारा नियंत्रण अपनी इन्द्रियों पर यानी अपने सेंसेज पर बना रहे।
7. इन्द्रियों की अनुभूति हमें अस्थिर न कर दे इसके लिए जरूरी है कि अवश्यम्भावी परिवर्तन के सिद्धांत को आत्मसात कर लें।
8. प्रकृति में हर क्षण होने वाले परिवर्तन को समझने के लिए ये जरूरी है कि हम स्वयम को चलायमान न होने दें। अगर हम स्वयम चलायमान होंगे तो फिर प्रकृति के परिवर्तन को समझ नहीं पाएंगे, उसकी गति और दिशा को नहीं जान पाएंगे और भ्रम में पड़ जायेंगे।
9.जिस इंसान में उपरोक्त क्षमताएँ विकसित अवस्था में हो जाती हैं उसे अमृत की प्राप्ति होती है। अमृत अमरत्व प्रदान करता है। तो इसका अर्थ हुआ कि इस तरह का इंसान नश्वरता से और परिवर्तन अर्थात स्वरूप परिवर्तन से जीते जी मुक्त हो जाता है। उसका ईगो यानी उसका अहम समाप्त हो जाता है क्योंकि प्रकृति के परिवर्तनों से वह अप्रभावित होता है।
10. जब इस प्रकार अप्रभावित होता है तो उस समय उसका स्व यानी उसका SELF उसके समक्ष उपस्थित होता है जो नितांत अपरिवर्तनीय, अनश्वर और सभी प्राणियों में एक समान होता है अर्थात हर किसी का SELF यानी स्व यानी आत्मबोध एक समान होता है। इस स्थिति को प्राप्त व्यक्ति ही मोक्ष प्राप्त व्यक्ति होता है। यानी मोक्ष जीवित रहते प्राप्त होता है न कि मरने के पश्चात।
इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण ने सभी को समान स्थिति में होने का रास्ता सुझाया दिया है।
इन शिक्षाओं की भाषा निश्चित रूप से हमारे दैनिक जीवन की भाषा से भिन्न है। लेकिन ये सीख सिर्फ उनके लिए ही नहीं है जो धर्म के मर्म को समझते हैं बल्कि ये शिक्षाएँ इतनी सरल हैं कि अगर हम आप मनोयोग से उन्हें सुने जाने तो हमें लगने लगेगा कि अभी तक हम सिर्फ इसलिए परेशान रहते आएं हैं क्योंकि हम खुद को इस सच्चाई से रूबरू नहीं होने दिए थे। हमारे जीवन में प्रयुक्त होने वाले अगितन मुहावरों, लोकोक्तियों में ये शिक्षाएँ भरी पड़ी हैं , उनका कहने सुनने में हम उपयोग भी करते आये हैं लेकिन कभी ध्यान से इनका चिंतन नहीं किये। अगर किये रहते तो सुखी भी होते और खुश भो रहते। और तब लक्ष्य से दूर भी नहीं रह जाते।
ये सारी शिक्षा युद्ध के मैदान में युद्ध से विमुख अपने काल के एक सबसे बड़े योद्धा को दी गई है। प्रश्न उठता कि युद्धकाल की शिक्षा का अभी क्या महत्व हो सकता है। वजह दो हैं।
पहली वजह तो यही है कि ये शिक्षाएँ काल विशेष से बंधी नहीं हैं। वस्तुतः ये शिक्षाएँ समय की सीमा से बाहर हैं, सर्वकालिक हैं
दूसरी बात कि जीवन में हमारी व्यवसायिक सफलता चाहे जतनी बड़ी हो जीवन में शांति तभी मिलती है जब जीवन जीने का ढंग पता हो, दृष्टिकोण परिपक्व हो। ये परिपक्वता शैक्षणिक और तकनीकी ज्ञान की और आर्थिक संसाधनों की प्रचुरता से नहीं आती। इन प्रचुरताओं के बावजूद भी यदि जीवन को देखने का ढंग सही नहीं है तो हम बार बार कभी प्रसन्नता और कभी दुख के अतिरेक में फंस कर तनावग्रस्त हुए रहते हैं। तनाव हमारे मानसिक अवस्था को आंदोलित (agitated) करते रहता है जिससे हम बार बार अस्थिर होते रहते हैं। स्थायित्व का अभाव ध्यान बँटाता है। नतीजे में हम न केवल आत्मिक लक्ष्य से दूर होते जाते हैं बल्कि अपने भौतिक लक्ष्यों से भी भटकते हैं। इससे हमारी न केवल आत्मिक यात्रा दुष्प्रभावित होती है, बल्कि हमारी भौतिक यात्रा भी दुष्प्रभावित होती है।
के कारण हमारे अंदर इस प्रकार का आत्म
इन शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन के प्रसंगों में में लागू करके देखें। जीवन की हर छोटी बड़ी घटना के परिपेक्ष्य में देखें और इन शिक्षाओं को उन प्रसंगों की कसौटी पर कसें। घर की अच्छी बुरी बात हो, छात्र जीवन की सफलता असफलता हो, व्यवसाय की भली बुरी बातें हों, रिश्तों की बातें हों या अन्य कोई भी प्रसंग, हम पाते हैं कि ये शिक्षाएँ न सिर्फ व्यवहारिक हैं बल्कि हर प्रसंग में एक आत्मबल भी प्रदान करती हैं। ये हमें सुख में खुश होकर बौराने से बचाती हैं और दुख में निराश होकर बिखरने से भी बचाती हैं। ये शिक्षाएँ हमें हर परिस्थिति से अछूता रहकर साध्य की तरफ बढ़ने का रास्ता बताती हैं। मोक्ष परम् स्थिति है, जो निरन्तर अभ्यास से मिलती है लेकिन इसके लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है । अभ्यास की पहली सीढ़ी अपने जीवन के दैनिक प्रसंग ही होते हैं। यदि हम अपने दैनिक प्रसंग में खुद को अनुशासित नही रख सकते तो फिर बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करना भी असम्भव ही रह जाता है।अवश्यभावी परिवर्तन और नश्वरता के इस शिक्षा से हमारे अंदर अपने सेल्फ को खोज पा लेने के कारण हमें सत्य के प्रति जो लगाव मिलता है उससे हमें एक आत्मबल प्राप्त होता है । ऐसा क्षमता युक्त व्यक्ति अन्य लोगों के लिए अनुकरणीय हो जाता है।
श्रीमद्भागवद गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण- अध्याय 2 भाग 3 -आत्मा से परिचय- श्लोक 16 से 30
परिवर्तन के नियम को समझाने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि दो तरह की वस्तुएँ होती हैं-सत और असत यानी REAL और NOT REAL या UNREAL । श्रीकृष्ण के अनुसार ये तथ्य नया नहीं है बल्कि बहुत पहले से उन लोगों के द्वारा कहे गये हैं जिनको सत्य का ज्ञान रहा। जिनको सत्य का ज्ञान होता है उनको तत्वदर्शी कहते हैं।
सत, असत और तत्वदर्शी शब्दों के अर्थ आपस में जुड़े हुए हैं। इस निरन्तर परिवर्तनशील संसार में हर वो चीज जो निरन्तर परिवर्तनशील होती है वही असत है। परिवर्तनशील वस्तुओं की खाशियत है कि वे सिर्फ वर्तमान में होते हैं, अतीत में और भविष्य में उनका कोई वजूद नहीं होता है। अर्थात अस्थाई ही असत है। लेकिन इस असत का अनुभव तो होता ही है न। आखिर इस तथ्य का कैसे उद्घाटन हो पाता है । परिवर्तनशीलता को समझने के लिए जिसकी आवश्यकता है वही सत है, अर्थात सत हो है जिसका किसी काल में नाश नही होता, जो परिवर्तन के नियम से परे होता है। इसी सत की अनुभूति से असत का ज्ञान हो पाता है। जीवन बाल्यकाल, युवा अवस्था और वृद्धावस्था के अनुभवों का संकलन होता है जो निरन्तर बदलते रहते हैं। इस अनुभव को दो तरह से जीने की विधि होती है। एक है इस परिवर्तन को बिना समझे परिवर्तन को वास्तविकता मान कर जीते जाना जिसमें हम असत को ही जीते जाते हैं। हर परिवर्तन से , उसके अच्छे बुरे प्रभावों से प्रभावित होते कभी सुखी, कभी दुखी होते रहते हैं। इस अवस्था में सत का ज्ञान नहीं होता। दूसरा तरीका है जीवन में घट रहे परिवर्तन को देखते समझते , इन परिवर्तनों के प्रभाव से अलग रहते जीना। इस अवस्था में हमको पता होता है कि जो घट रहा है वह तो मात्र परिवर्तन है। उससे भला क्यों प्रभावित होंना। ये परिवर्तित स्वरूप आज कुछ और है, कल परिवर्तन के कारण कुछ और हो जाएगा और पहले भी कुछ और ही था। इस क्षमता को ही सत कहते हैं। यही हमारा आपका सबका सत है जो हमें परिवर्तनों से परिचित कराता है। ये सत ही आत्मबोध यानी हमारा SELF है। अपने SELF यानी अपने आत्मबोध से परिचित इंसान जीवन को, परिवर्तनों को उनसे विलग रहकर जीता है, उनके साथ रहकर भी उनसे लिप्त नहीं होता है। परिवर्तन यानी असत आते हैं जाते हैं वो हर स्थिति में अपने आत्मबोध से इनको देखता तो है लेकिन अपने आत्मबोध के कारण इनसे अप्रभावित ही रहता है। यानी ऐसा इंसान परिवर्तनों के साथ जीता तो है लेकिन परिवर्तन से विलग अपने स्व यानी अपने आत्मबोध यानी अपने सेल्फ में रहते हुए इन परिवर्तनों के प्रभाव से मुक्त होता है। जो सत और असत के इस भेद को जानता समझता है वही तत्वदर्शी होता है, क्योकि वह मूल तत्व को समझता है।
सत और असत के इस द्वैत यानी DUALITY की समझ ही हमें अपने सत की खोज में बढ़ने के लिए प्रेरित भी करता है।
इस DUALITY यानी द्वैत की समझ से जीवन के कठिन प्रश्नों का समाधान निकल आता है। जब हम समझने लगते हैं कि परिवर्तन अस्थाई है ,इसके प्रभाव भी अस्थाई ही हैं तो फिर इनके परिवर्तन से सूखी या दुखी नहीं होते। समभाव में स्थित रहकर ही अपना आचरण निर्धारित करते हैं।
इस सत-असत की समझ से उत्पन्न समभाव के कारण इंसान अपने वास्तविक रूप में आता है जिसके कारण उसे ज्ञात होता है कि उसमें असीम सम्भावनाएँ हैं जिनके कारण वह उन्नति के अंतिम शिखर , अर्थात जिसके बाद कोई शिखर नहीं होता वँहा तक जा सकता है।
परिवर्तन से अप्रभावित होने का अर्थ आप निष्क्रियता मत निकालें । इस शिक्षा को नहीं समझ पाने का ये खतरा तो है कि हम समझने लगे कि संसार तो निरन्तर परिवर्तनशील है तो फिर इस संसार में घटित घटनाक्रम से हमें क्या लेना देना, हम तो इनसे अप्रभावित रहकर बुद्ध हो गए हैं। इसी भ्रम को मिटाने के लिए श्रीकृष्ण आगे चलकर कर्मयोग का सिद्धांत समझाते हैं। बिना कर्म में प्रवृत्त हुए सत असत के सिद्धांत को आत्मसात करना असम्भव है और विनाशकारी भी।
अब आगे देखेंगे कि सत क्या है और सत को प्राप्त करने का कर्मयोग का सिद्धांत क्या है। ये शिक्षा क्रमिक है, , एक एक कर हम सीखते है, बढ़ते हैं। परिवर्तन के नियम को जानने समझने के बाद हम सत यानी आत्मा के ज्ञान की तरफ बढ़ते हैं और फिर तब कर्मयोग की तरफ।
अनश्वरता और अवश्यम्भावी परिवर्तन के सिद्धान्त से जो मूल बात निकल कर सामने आती है वो है इस निरन्तर परिवर्तनशील संसार में कुछ ऐसा भी है जो निरन्तर अपरिवर्तनशील है, सनातन अनश्वर है। यँहा एक बा त बात बहुत मायने रखती है। हम ऊर्जा को देख नहीं सकते, लेकिन ऊर्जा व्याप्त है। ऊर्जा का मेनिफेस्टेशन हम देखते हैं, जैसे अग्नि, विधुत, गति, प्रकाश , स्थिरता आदि। इसे हम जानते भले न हो लेकिन मानते जरूर हैं। दुनिया के बहुतेरे बातों को जिनको हम समझ नहीं पाते मानते हैं, फिर जैसे जैसे हमारे वैज्ञानिक ज्ञान का स्तर बढ़ता है हम धीरे धीरे गलत से सही को जानने लगते हैं। विज्ञान वह विशेष ज्ञान है जिसके पीछे अकाट्य तर्क होता है, सार्वभौमिक प्रमाण होता है। यह ज्ञान स्वयम में निरन्तरता लिए हुए होता है। इसकी खोज का जो प्रमाणिक तरीका है उसके अनुसार सबसे पहले हम अपने अनुभव से, उस अनुभव से जिसमें निरन्तरता होती है उससे एक परिकल्पना यानी HYPOTHESIS गढ़ते हैं।।तत्पश्चात उस परिकल्पना के आधार पर प्रयोग करते हैं । यह प्रयोग हमेशा प्रयोगशालों के नियंत्रित वातावरण में ही हो जरूरी नहीं। कई बार हमारी प्रयोगशाला हमारा मस्तिष्क ही होता है। हम तरह तरह की गणनाएँ उपयोग में लाते हैं, फिर हिट ऐंड ट्रायल के तरीके से हम उन गणनाओं को व्यवस्थित कर एक अंतिम गणितीय सिद्धान्त गढ़ते हैं । तत्पश्चात अलग अलग समय काल और स्थान में उसका उपयोग कर ये देखते हैं कि क्या हमारी गणना का परिणाम हर समय काल और स्थान में एक ही है। यदि ऐसा है तो फिर हम एक सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं जो हर समय काल स्थान में एक समान होता है। यही प्रक्रिया प्रयोगशालाओं के नियंत्रित वातावरण में भी की जाती है, जिनमें हो सकता है कि गणना के अतिरिक्त या उसके बिना सिर्फ पदार्थ का उपयोग किया जाता हो। उसके सर्वव्यापी परिणाम को ही मान्यता दी जाती है। इन प्रक्रियाओं में कुछ तथ्य समान हैं
1.सर्वप्रथम एक परिकल्पना की आवश्यकता होती है जो संसार के निरन्तर पर्यवेक्षण से सम्भव होता है।
2.प्रयोग की विधि निर्धारित होती है।
3.परिणाम सर्वकालिक होता है अर्थात स्थाई होता है निरन्तर परिवर्तित नहीं होता।
ज्ञान प्राप्ति की इसी विधा को जिसमें परिकल्पना, प्रयोग, परिणाम और सर्वकालिकता हो उसे ही विज्ञान कहा जाता है। इसके परिणाम में स्थाई सत्य को प्राप्त किया जाता है जो निरन्तर परिवर्तनीय नही होता बल्कि हमेशा एक ही रहता है।
अब ठीक यही बात जीवन विज्ञान को समझने के लिए भी अपनाई जाती रही है। श्रीकृष्ण ने इसी वैज्ञानिकता का सहारा लिया है अर्जुन को समझाने के लिए। सर्वप्रथम उन्होंने अर्जुन को संसार का पर्यवेक्षण करने के लिए प्रेरित किया यानी उसे ये देखने के लिए प्रेरित किया कि वह स्वयम देखे कि संसार कैसे चलता है। हमने देखा कि पूरा संसार गीता की भाषा में सत और असत में बंटा है। असत यानी जो निरन्तर परिवर्तनीय है। इस असत को हम तब देखने में सक्षम होते हैं जब सत को समझते हैं यानी ये समझते हैं कि कुछ ऐसा है जो परिवर्तित नही होता, जो स्वरूप नहीं बदलता, जो अनश्वर होता है। इसे ऐसे समझे। कोई वस्तु गति में है ये तभी समझा जा सकता है जब हम गतिहीन यानी स्थिर होते हैं।
अब दूसरे स्तर पर हम ये समझते हैं कि इस सम्पूर्ण चलायमान संसार को चलायमान रखने के लिए कोई एक सत्ता तो होगी जो उनकी गति और परिवर्तन का कारण होगी। यही सत्ता सर्व्यापी और सर्वकालिक होती है। अभी आपको ये बात कल्पना लग सकती है, लेकिन लक्षित ज्ञान को जानने समझने के लिए इस कल्पना पर परिकल्पना की तरह आपको भरोसा करना होगा।भरोसा होगा तो आप अन्वेषण के लिए बढ़ेंगे और सत्य को पाएंगे। नही। भरोसा करेंगे तो इस परिकल्पना को कोरी कल्पना मानकर छोड़ देंगे और सत्य का अन्वेषण अधूरा छूट जाएगा, आप कँही नही। पहुंचेंगे। जीवन भर भटकते रह जायेगे। यदि आप इस परिकल्पना पर भरोसा करते हैं तो आप ये देखने में सक्षम होंगे कि इस सर्वकालिक सर्वव्यापी सत्ता ही है जिसके कारण आप खुद को और खुद के बाहर के परिवर्तन को देख समझ पाते हैं। आप इस सत्ता की समझ के कारण सर्वाधिक ऊर्जा संग्रहण के स्थिर अवस्था में आ जाते हैं, परिवर्तन के प्रभाव से एकदम मुक्त। यही तो परम् वैज्ञानिकता है और गीता की भाषा में परम् योग की अवस्था भी।
इस परम् सत्ता को जो पूर्णतः अनश्वर, अविनाशी, अव्यय(जिसका व्यय नहीं होता हो) होती है यही हमारे अंदर से हमारे परिवर्तनशील बुद्धि और भावना को निकालकर हमारे आत्मबोध यानी SELF को बाहर लाता है। यही वह सेल्फ है जो अपरिवर्तनीय अनश्वर अविनाशी है और जो सभी में समान रूप से मौजूद है। यह आत्मा उस परमसत्ता का ही स्वरूप है जिसे आप ब्रह्म, परमब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर, भगवान या फिर अपने धार्मिक-सम्प्रदाय के मतानुसार और भाषानुसार अलग अलग नामों से सम्बोधित करते है और यही सता सब में व्याप्त होकर सभी परिवर्तनों को नियंत्रित करता है।
आत्मा से परिचय कराने के पश्चात श्रीकृष्ण एक बार फिर से सत की तरफ लौटकर समझाते हैं कि सत यानी आत्मा का नाश नहीं होता है, न ही इसका परिवर्तन होता है और न ही ये जानने में आता है। इस बात को समझने में थोड़ी सावधानी बरतनी होगी। आत्मा अनश्वर और अपरिवर्तनीय है ये तो हम हमझे हैं लेकिन ये अप्रमेय है इसे कैसे समझे। अप्रमेय यानी जिसका प्रमाण नहीं होता अर्थात जिसे प्रमाण के द्वारा नहीं जाना जा सकता। तो क्या आत्मा का ज्ञान होना असम्भव है?
श्रीकृष्ण की इस शिक्षा को समझने के लिए ये जरूरी है कि पहले हम ये तो समझे कि हमें ज्ञान मिलता कैसे है। ज्ञान प्राप्त करने का हमारा सबसे महत्वपूर्ण साधन हमारी इन्द्रियाँ यानी सेंसेज हैं। बाहरी जानकारी इन्द्रियों के माध्यम से ही हमें प्राप्त होती है। इसके माध्यम निम्न हैं---
1.प्रत्यक्ष प्रमाण, जिसे हम सीधे अपनी इन्द्रियों से ग्रहण करते हैं। (डायरेक्ट इनफार्मेशन)
2.अनुमान, किसी एक चीज के आधार पर हम दूसरी चीज के बारे में परिणाम निकालते हैं यानी
उपलब्ध सूचना के आधार पर कोई राय बनाते हैं या सत्यता का निर्णय करते हैं, से (इनफरेंस)
3.तुलना, दो चीजों की तुलना कर जानकारी इकट्ठा करते हैं(कंपेरिजन)
4.कारण-परिणाम, परिणाम का अध्ययन कर कारण जानने की प्रक्रिया (कॉज-इफ़ेक्ट रिलेशन)
5. अनुपलब्धि, किसी चीज के नही होने का तथ्य जानकर समझना कि वो चीज नहीं है या नहीं होती है(अनवैलबिलिटी)
6.शब्द प्रमाण, स्थापित/विद्वान गुरु के द्वारा कही बात को सही मानकर(वर्ड्स ऑफ ए रियलआइज़्ड मास्टर)
ये सभी माध्यम इन्द्रियों पर निर्भर करते हैं लेकिन इनमें से किसी से भी आत्मा यानी सत यानी सेल्फ का ज्ञान नहीं मिलता है। चूंकि आत्मा/सत/सेल्फ की जानकरी इन्द्रियों से नहीं मिलती सो श्रीकृष्ण इसे अप्रमेय यानी प्रमाण से परे मानते हैं।
तब हम सेल्फ यानी आत्मा को कैसे जानते हैं? दरअसल उपरोक्त सभी प्रकार के माध्यमों से आत्मा/सेल्फ का ज्ञान भले न मिलता हो , होता ये है कि हमारे सेल्फ के ऊपर अज्ञान की जो परत पड़ी होती है वो एक एक कर साफ होती जाती है। इससे अंततः हम ये समझ पाते हैं कि हमारी आत्मा /हमारा सेल्फ वास्तव में क्या है। अर्थात अज्ञान का सम्पूर्ण नाश ही आत्मबोध/आत्मज्ञान/आत्मा का ज्ञान/सेल्फ का ज्ञान देता है। दरअसल ज्ञान प्रकाश है जो अंधकार और उससे पैदा हुए भ्रम को समाप्त कर वास्तविकता को सामने ला देता है। यदि आप कँही जा रहें है या स्थिर बैठे हैं और घोर अंधकार है। आपको लगता है कि सड़क पर कुछ परा हुआ है। आपको लगता है कि अरे ये लम्बी सी चीज तो साँप प्रतीत होता है । आप डर कर पीछे हट जातें हैं और टार्च की रोशनी करते हैं । तब आप पाते हैं कि अरे जिसे मैं साँप समझ रहा था वो तो रस्सी है। दरअसल प्रारम्भ से ही वँहा रस्सी ही है। ये तो अँधकार और उससे उपजा भ्रम था जिसके कारण हम उसे साँप समझ रहे थे। रौशनी होते अँधकार छंटता है यानी भ्रम खत्म होता है और तब आप वास्तविकता देख पाते हैं। ज्ञान ने साँप को रस्सी नहीं बना दिया, बल्कि ज्ञान ने अंधकार और भ्रम को हटा दिया जिससे हम वास्तविकता को जान पाए। इसीप्रकार ज्ञान जब हमारे सारे भ्रमों को मार देता है तब हमको पता चलता है कि हमारा सेल्फ/आत्मबोध/आत्मा क्या है। ज्ञान आत्मा को बनाता नहीं है, उससे परिचय कराता है।
अब ये समझना भी जरूरी है कि आत्मा का निवास कँहा है। दरअसल आत्मा शरीर को धारण करती है। अविनाशी , अपरिवर्तनीय आत्मा का निवास देह है अर्थात इस परिवर्तनीय नाशवान शरीर का अस्तित्व तभी तक है जब तक इसमें अनश्वर अपरिवर्तनीय आत्मा है अन्यथा इसका कोई अस्तित्व नहीं है।
इतनी शिक्षा देने के पश्चात श्रीकृष्ण अर्जुन का आह्वाहन करते हैं कि इन्ही कारणों से तुम युद्ध करो। तो क्या श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए उकसा रहें हैं। जी नहीं। बल्कि वे तो ये कह रहे हैं कि जब तुमको ये बात समझ में आ गई कि आज्ञान का नाश ही सत्य को उद्घाटित करता है, आत्मा से परिचय कराता है सेल्फ यानी आत्मबोध को प्रत्यक्ष करता है तो फिर आज्ञान को हराना ही होगा, उससे युद्ध करके असत के भ्रम को समाप्त तो करना ही होगा। यही युद्ध है जो आज्ञान को पराजित करने के लिए है, सत को उद्घाटित करने के लिए है। ये युद्ध क्या है, इसकी प्रकृति क्या है, ये होता कैसा है, परिणाम में क्या होता है इसे श्रीकृष्ण आगे स्पष्ट करते हैं।
इस प्रकार हम देख रहें हैं कि कैसे आज्ञान के कारण हम अपने कर्तव्य से भागते हैं और आज्ञान वश ही इसी अकर्मण्यता को महान बताने का उपक्रम करते रहते हैं। लेकिन हम तब तक अपनी अकर्मण्यता को और अपने कुतर्कों को नहीं समझ पाते जब तक हम अपने आत्मबोध से दूर होते हैं। "हम हैं" ये तो प्रमाणित है लेकिन "हम क्या है" ये अभी जानते हैं जब हमें अपनी आत्मा का बोध होता है, सेल्फ से परिचित होते हैं, और तभी हमको अपने कर्तव्यों की सही जानकारी भी मिल पाती है।
एक बार पुनः श्रीकृष्ण स्पष्ट करते है कि आत्मा अनश्वर और अविनाशी है। यह न मारता है न मरता है। इससे स्पष्ट होता है कि आत्मा वास्तव में किसी भी तरह के कृत्य से मुक्त होता है। हम आप जो भी करते हैं उसमें हमारे आपके विशुद्ध स्वरूप यानी हमारे आत्मस्वरूप यानी सेल्फ का कोई योगदान नहीं होता। हम जो भी करते हैं उसकी जबाबदेही हमारे ईगो पर होती है जो हमारी शारीरिक, मानसिक/भवानात्मक और बौद्धिक गुणों का मिश्रण होता है। हम आगे चलकर पाएंगे कि हमारे कृत्य हमारे गुणों पर निर्भर करते हैं । लेकिन फिलहाल इस श्लोक से स्पष्ट है कि वस्तुतः आत्मा न तो कर्ता है न कारक। साथ ही स्पष्ट होता है जीवन समाप्त होता है न कि जीवन का सेल्फ।
हमारा अस्तित्व हमारा शरीर नहीं होता। पूर्व में ही स्पष्ट हो चुका है कि भौतिक स्वरूप का परिवर्तन अवश्यम्भावी है लेकिन सेल्फ में, आत्मस्वरूप में यानी आत्मा में कोई परिवर्तन नहीं होता। यह जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त होता है। तो फिर किसी की मृत्यु या जन्म के लिए आत्मस्वरूप को कर्ता नहीं ठहराया जा सकता।
आत्मा की उपस्थिति में ही सारी क्रियाएँ होती हैं लेकिन आपका सेल्फ/आपकी आत्मा उसमें लिप्त नहीं होती। इसे महसूस करने, समझने के लिए जरूरी है कि हम अपनी आत्मा के ऊपर चढ़े आवरण को एक एक कर हटाएँ। ये कैसे कर सकते हैं इसे आगे समझेंगे। अभी तो इतना ही समझें कि जब श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने का आवाह्न करते हैं तो ये भी समझा देते हैं कि आत्मा का न तो आदि है न अंत, कोई स्वरूप परिवर्तन नहीं है। न ही आत्मा कुछ कर रहा होता है न इसपर कुछ हो रहा होता है।
श्रीकृष्ण एक बार फिर से अपनी बात दुहराते हैं। हम जानते हैं कि यदि कोई बात बहुत जरूरी होती है या फिर जिस बात को समझना थोड़ा मुश्किल होता है तो वक्ता उस बात को बार बार कहता है ताकि श्रोता उस बात को और उसके अर्थ एवम महत्व को समझ सके। आत्मा जन्म मृत्यु से परे है। यह पुरातन है अर्थात अत्यंत पुराने काल से वर्तमान तक अपरिवर्तनीय ही बना हुआ है जो शरीरों के जन्म मृत्यु से अछूता रहता है। साथ ही आत्मा सनातन भी है, न आदि है न अंत है। अर्जुन जिस सनातन धर्म की बात कह रहा था पूर्व में उससे यह विचार एकदम भिन्न है। वस्तुतः अर्जुन द्वारा जिसे सनातन धर्म कहा जा रहा था वह तो मनुष्य की मृत्यु के साथ छिन्न भिन्न हो जाने वाला था। ऐसी आशंका तो अर्जुन के द्वारा स्वयम व्यक्त की जा रही थी। उसका सनातन धर्म तो कुलधर्म था। लेकिन यँहा तो श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहें हैं कि सनातन तो आत्मा है, देह कँहा से सनातन हो गया।
और यह आत्मा सब में समान है। इसका कोई रूप , रंग, आकार, नहीं , इसका कोई निश्चित देह नहीं, यह तो काल से परे है। तो ऐसी स्थिति में वो सभी सनातनी ही हैं तो आत्मा के अन्वेषण मड़इन लगे हैं। इसका सम्बन्ध हमारे जन्म और कुल से नहीं है। यह तो सभी में समान भाव से गुणों से मुक्त है। इसी से वसुधैव कुटुम्बकम् निकलता है। फिर अपना कौन पराया कौन।
श्रीकृष्ण ने अबतक आत्मा की विशेषताओं को बताया है। अब वे आत्मा को जानने समझने वाले कि विशेषताओं की चर्चा करते हैं। हमने पहले ही देखा समझा है कि इस संसार में व्यक्ति के द्वारा जो जो कुछ भी किया जाता है वह इंसान के ईगो के द्वारा किया जाता है अर्थात जो कुछ इंसान के द्वारा किया जाता है वह सब उस इंसान के शारीरिक रूप, भावनात्मक स्थिति और बौद्धिक क्षमता के द्वारा किया जाता है और यही तीन किये गया कार्य का प्रभाव भी झेलते हैं या उसका आनंद उठाते हैं। उसकी आत्मा यानी उसका स्व न तो कुछ करता है, न ही कुछ भी करवाता है। इंसान श्रीकृष्ण वर्णित तीन गुणों के अधीन रहकर कुछ न कुछ करते रहते हैं।।
जब आत्मा न कुछ करता है न कराता है तो फिर हम कैसे कहते हैं कि मैंने किया। मैं स्व को व्यक्त करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है लेकिन यँहा स्व ईगो के स्थान पर भ्रम वश समझ लिया जाता है।आत्मा न तो कर्ता है न भोक्ता है। आत्मा तो मात्र द्रष्टा है। निर्विकार भाव से चीजों को होते देखता है। स्व की उपस्थिति में हमारा ईगो कुछ न कुछ करते रहता है और प्रभावित होते रहता है। इसे एक छोटे उदाहरण से समझा जा सकता है। सूर्य के उदय के साथ रौशनी आने के साथ ही तरह तरह की गतिविधियाँ प्रारम्भ हो जाती हैं। तो क्या सूर्य इन गतिविधियों को करता है। ये आप भी जानते हैं कि नहीं। सूर्य को आपकी गतिविधि से कोई लेना देना नहीं है। सूर्य की अपनी गति है। मात्र उसकी उपस्थिति में चीजें घटित होती हैं। इसी प्रकार आत्मा न कर्त्ता है न भोक्ता है। ऐसी स्थिति में जिसे अपने स्व का ज्ञान है, जिसे आत्मा का ज्ञान है, जिसे आत्मबोध हो चुका है , इसे पता है कि उसका सेल्फ उसके ईगो से भिन्न अपरिवर्तनीय, अविकारी , अजन्मा, पुरातन और सनातन है। उसे यह भी ज्ञात है कि वह न तो कुछ करता है न भोगता है। बस वह तो द्रष्टा मात्र है। लेकिन इस स्थिति में पहुँचा कैसे जाता है ये अभी आगे स्पष्ट करेंगे श्रीकृष्ण।
श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि शरीर और आत्मा का क्या सम्बन्ध होता है। पहले समझा चुके हैं कि आत्मा अजर, अजन्मा, अपरिवर्तनीय, सनातन, पुरातन है जबकि शरीर निरन्तर परिवर्तनीय है जो जन्म से लेकर मृत्यु तक नित्य परिवर्तित होता रहता है और कहते हैं कि मृत्यु भी मात्र एक परिवर्तन ही है क्योंकि अनश्वर आत्मा को जब प्रतीत होता है कि शरीर जीर्ण हो चुका है तो वह उस शरीर को त्याग कर अन्य नया शरीर धारण कर लेता है। शरीर का अंत हो जाता है लेकिन उस शरीर को धारण करने वाले आत्मा का नहीं। मृत्य अंत नहीं परिवर्तन मात्र है। तो क्या शरीर के अंत से हमारा नाश नहीं होता है?
वस्तुतः आत्मा की यात्रा शरीर की मृत्यु से रुकती नहीं है। हम जो कुछ करते धरते हैं उनसे हमारे संस्कार संकलित होते जाते हैं। हम देख चुके हैं कि आत्मा न तो कुछ करता है न कराता है। मात्र उसकी उपस्तिति में हमारी भावनाएँ, और बौद्धिकता कुछ न कुछ करती कराती रहती हैं। इससे हमारे संस्कार संकलित होते जाते हैं। शरीरों का जीर्ण होने का तातपर्य शरीर का भौतिक दृष्टि से कमजोर या रुग्ण होने से नहीं है।
शरीर आत्मा के वस्त्र की तरह होता है। वस्त्र के पुराने पर जाने पर और विभिन्न अवसरों पर हम अपना वस्त्र बदलते हैं। लेकिन वस्त्रों के बदलने से हम तो नहीं बदल जाते हैं। हम तो वही रहते हैं हमारा प्रस्तुतिकरण बदल जाता है, लेकिन वास्तविकता में हम वही रहते हैं। इसी प्रकार शरीर के बदलने से आत्मा की वास्तविकता में कोई परिवर्तन नहीं आता।
अब देखिए कि वस्त्र बदलने पर क्या हमें पीड़ा का अनुभव होता है? यदि उस बदले जाने वाले वस्त्र से हम जुड़ाव महसूस करते हैं तो उसे छोड़ने या बदलने के समय हमें पीड़ा होती है। यदि जुड़ाव नहीं है तो कोई पीड़ा नहीं होती। यही हाल शरीर के परिवर्तन पर भी होता है। जिस शरीर से हम जितना जुड़े रहते हैं उसके मृत्यु या प्रस्थान पर हमें उतनी ही पीड़ा होती है। हमारे घर या इष्ट मित्र आदि के यँहा यदि किसी का देहावसान होता है तो हम कितने दुखी हो जाते हैं , लेकिन रास्ते पर ले जा रहे मृतकों को देख कर हम उन्हें मात्र नाश या शव मानकर नजरअंदाज कर देते हैं । उनसे हमें कोई पीड़ा नहीं होती क्योंकि उनसे हमारा कोई जुड़ाव नहीं होता है। लेकिन नय जन्म पर हम फिर उल्लासित भी होते हैं जैसे नय वस्त्र पाकर। लेकिन ध्यान रहे ये सब भावनात्मक क्रिया प्रतिक्रिया हमारी आत्मा के स्तर पर नहीं होता है बल्कि ये सब हमारे नश्वर इगो के स्तर पर होता है।
तो प्रश्न उठता है कि आत्मा जीवन को कैसे चुनती है। हम देखते जानते हैं कि हर प्राणी का शरीर मैटर से बना होता है और ये मैटर भी सभी में समान ही होता है। एक प्रजाति में एक ही अनुपात में भी होता है। लेकिन मैटर तो निश्चेष्ट और प्राणविहीन होता है। यदि सभी कुछ समानुपातिक ढंग से उस रूप मरीन ढाल भी दिया जाए तो भी उसमें जीवन का संचार नहीं होता है । इस जीव के संचार को तभी सम्भव किया जा सकता है जब उसमें आत्मा का निवास हो, अन्यथा नहीं। आत्मा और स्थूल शरीर के मध्य सूक्ष्म शरीर होता है जो दिखता तो नहीं है लेकिन स्थूल शरीर को क्रियाशील रखता है। यह सूक्ष्म हमारी बौद्धिकता का परिणाम होता है। आत्मा से मैटर को जीवन मिलता है लेकिन आत्मा स्वयम मैटर नहीं होता है। आत्मा मैटर से भिन्न होता है। मैटर चारो तरफ होता है लेकिन सभी में जीवन नहीं होता है। मैटर जब आत्मा से मिलता है तभी उसमें जीव का प्रवाह हो पाता है। मृत्यु के पश्चात शरीर का अंत होता है, मैटर का नहीं, उसका स्वरूप परिवर्तन सम्भव है। लेकिन जीवनपर्यंत संचित संस्कार कँही नहीं जाते। वे तो सूक्ष्म अवस्था में बने ही रहते हैं। हम देखते हैं कि एक अमरूद के फल में ढेरों बीज होते हैं। उन बीजों का रंग रूप स्वरूप अमरूद से तो नहीं मिलता लेकिन प्रतेक बीज में एक पेड़ को जन्मने की क्षमता होती है और उस पेड़ से फिर ढेर सारे अमरूद के जन्म लेने की। और पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे ही चलता है। साथ ही पेड़ के प्राकृतिक आवास के आबोहवा के अनुसार परिवर्तन भी संचित होते और स्थानांतरित होते जाते हैं। वैसे ही जैसे संस्कार संचित होते जाते हैं और मैटर का संयोग जब आत्मा से होता है तो वो संस्कार तो आगे जाते ही हैं वो उसी के अनुसार जीव में परिवर्तन भो करते जाते हैं।
सनद रहे कि आत्मा का विस्तार समझने के लिए आकाश की तरह होता है जो शरीर के समाप्त होने से संकुचित नहीं होता है। उसके विस्तार पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
इस प्रकार हम समझते हैं कि जब आत्मा एक शरीर को त्याग कर दूसरा शरीर धारण करती है तो वो उन संचित संस्कारों को भी अपने में समाहित कर लेती है। और आपकी यात्रा उन संचित संस्कारों के आगे से शुरू होती है।
श्रीकृष्ण आत्मा की विशेषताओं को अर्जुन को समझा चुके हैं। एक बार फिर वे आत्मा की विशिष्टताओं को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि आत्मा प्रकृति से मुक्त है। प्रकृति का आत्मा पर कोई असर नहीं पड़ता है। सो प्रकृति की कोई भी शक्ति आत्मा को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं कर सकती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बार बार समझा चुके हैं कि आत्मा अजर, अनश्वर, अपरिवर्तनीय है । इसी तथ्य को श्रीकृष्ण और भी स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि प्रकृति आत्मा पर कुछ भी असर नहीं डाल पाती है क्योंकि आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है।
आत्मा पुरातन काल से है परन्तु हमेशा नूतन ही है। यह निरन्तर बना हुआ रहता है क्योंकि इसका कोई भूत या वर्तमान नहीं होता है। आत्मा समय से अप्रभावित होता है। समय का भान स्थान और गति के कारण होता है। हमारी चिंतन प्रक्रिया चलायमान होती है। चिन्तनप्रक्रिया गतिमान होती है। ये एक सिरे से दूसरे सिरे की तरफ गतिशील होता है। स्थान के परिपेक्ष्य में गति समय का भान देती है। यदि गति न हो तो समय भी नहीं है। गति के अभाव में आत्मा हमेशा स्थिर और अचल है। इस कारण आत्मा भूत और भविष्य से परे हमेशा वर्त्तमान में ही है। इस वजह से आत्मा नित्य है।
अब इसे ऐसे समझ सकते हैं। श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि आत्मा का कोई स्वरूप नहीं होता, कोई आकार नहीं होता , उसका कोई भौतिक पिण्ड नही होता। इस प्रकार आत्मा आकारविहीन और प्राकृतिक स्वरूप से मुक्त तो है ही वह प्रकृति की समस्त शक्तियों और उनके प्रभाव से भी परे है। जिसका कोई आकार नहीं, जो अपने स्वरूप के लिए प्रकृति पर निर्भर नही। जिसका कोई आकार नहीं उसकी कोई सीमा भी नहीं है। सो
निश्चित ही वह आत्मा सर्वत्र है यानी सर्वायापी है। सीमाविहीन , आकार विहीन , सर्वव्यापी आत्मा किसी के अधीन नहीं , बल्कि सारी प्रकृति उसी के अधीन आ जाती है।
समय, काल, स्थान, गति और प्रकृति से मुक्त आत्मा अचल भी है अर्थात जिसमें कोई गति नहीं है। हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण ने आत्मा को समझाते हुए इसे स्थिर और अचल दोनों कहा है। आत्मा स्थिर है क्योंकि इसमें क्षैतिज गति नही है, यह स्थानांतरित नहीं होती एक स्थान से दूसरे स्थान तक। चूँकि आत्मा गति से मुक्त है सो ऊर्ध्व गति भी नहीं होती। इस कारण ऐसा नहीं होता है कि एक स्थान पर स्थिर आत्मा ऊपर की तरफ चलायमान हो अर्थात आत्मा क्षैतिज गति के साथ साथ ऊर्ध्व गति से भी मुक्त होती है, किसी भी दिशा में नहीं चलती यानी अचल है।
आत्मा सनातन भी है। जैसा कि पहले कहा गया है कि आत्मा पुरातन तो है लेकिन समय की अवधारणा से मुक्त होने के कारण हमेशा नूतन भी है , नित्य भी है सो यह शाश्वत सनातन है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि आत्मा प्रकृति के समस्त गुणों से इतर है, यह प्रकृति की सत्ता से बाहर नित्य, शाश्वत, अपरवर्तनिय, अविकारी और सर्वव्याप्त होकर हर स्थान, काल और प्राणी में है। चूँकि यह स्वरूप विहीन, अपरिवर्तनीय, अविकारी, शाश्वत और सनातन है , सर्वव्यापी है सो यह सभी में समान भी है।
अर्जुन को शोक नहीं करने के कारणों को समझाने के क्रम में श्रीकृष्ण उसे आत्मा से सम्बंधित शिक्षा दे रहें हैं। उन्होंने आत्मा की सभी विशिष्टताओं को अर्जुन के सामने रख दिया है। वे बार बार अर्जुन को बता चुके हैं कि आत्मा यानी हमारा स्व यानी सेल्फ ऐसा है जिसे इन्द्रियों /सेंसेज की मदद से नहीं जाना जा सकता है,(अव्यक्त)।
इसके साथ ही आआत्मा सोचने समझने की परिधि से बाहर है। आकारविहीन, रंगविहीन, रूपविहीन प्रकृति के किसी भी प्रदर्शन से विहीन आआत्मा सोचने समझने से बाहर है(अचिन्त्य)। शब्द, तस्वीर आदि से इसे परिभाषित करना सम्भव नहीं है।
इसके साथ ही आत्मा यह जैसा है वैसा ही है अर्थात समय, काल और स्थान आदि से इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता(विकाररहित) है।
आत्मा की विशेषताओं की व्याख्या से स्पष्ट है कि प्रत्येक जीव का शरीर आत्मा को धारण करता है लेकिन जीव के शरीर की समाप्ति से उसके आत्मा यानी स्व पर कोई भी फर्क नहीं पड़ता। वह जस का तस बना रहता है।
उपरोक्त कथनों से स्पष्ट है कि मृत्यु से व्यक्ति का सेल्फ(उसकी आत्मा) का नाश नहीं होता। बल्कि कहें तो मृत्यु के किसी भी प्रभाव से आत्मा अछूती रहती है। तो फिर किसी की मृत्यु का शोक कोई क्यों करे।
जीवन मूल्यों को देखने का दो दृष्टिकोण होता है। एक आध्यात्मिक जिसे हम अभी तक देखते आये हैं और दूसरा भौतिक। भौतिक दृष्टिकोण से प्रत्येक चीज, प्रत्येक जीवन मात्र पदार्थ(मैटर) और ऊर्जा से बना होता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार प्रत्यक्ष जानकारी ही अर्थात जिस जानकारी को हम इन्द्रियों यानी अपने सेंसेज से प्राप्त करते हैं वही अंतिम सत्य है और जो दिखता नहीं है उसकी कोई चर्चा नहीं होती। अतः इस दृष्टिकोण से आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है। भौतिकवादी दृष्टिकोण के अनुसार आत्मा आपका दृश्य स्व है जो सदा मरता और पैदा होता है। जीवन मृत्यु निरन्तर चलता रहता है। जन्म लेने वाले कि मृत्यु निशिचित है। अगर इस दृष्टिकोण को भी सही मान लिया जाए तो भी जिसकी मृत्यु होती है उसके लिए किसी तरह का शोक अवांछनीय है क्योंकि ये तो एकदम स्वाभाविक है क्योंकि इसकी मृत्यु तो निश्चित है।
तत्पश्चात श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जब जन्म लेने वाले की मृत्यु निशिचित है और मरने वाले का जन्म भी निश्चित है तो फिर ये परिवर्तन तो अपरिहार्य है, अटल है। जब ऐसा है तो फिर मरने पर शोक क्यों करना।
ध्यान देने की बात है कि आध्यात्म का दृष्टिकोण देह से परे आत्मा की सत्ता को मानता है और मानता है कि एक जन्म के संस्कार संचित होकर सूक्ष्म शरीर के माध्यम से दूसरे जीवन में प्रवेश करता है और इस प्रकार जीव निरन्तर विकास की अवस्था प्राप्त करता अंत में उस स्थिति तक पहुँचता है जँहा वह दृश्य संसार के परे की सत्ता का परिचय प्राप्त कर उसी में विलीन हो जाता है और शरीर की यात्रा का अंत हो जाता है। इस प्रकार अध्यात्म आत्मा से इतर उन सब को जो प्रकृति से हैं को सदा परिवर्तनीय मानता है और एकमात्र आत्मा ही अपरिवर्तनीय होती है सो मृत्यु शरीर का होता है, स्वरूप का होता है आत्मा का नहीं और संस्कार एक जन्म से दूसरे जन्म में स्थानांतरित होते रहते हैं सो स्व का कभी नाश नहीं होता जब तक वह ब्रह्म में विलीन नहीं होता। इस प्रकार जीव की आत्मा कभी मरती नहीं। दूसरी तरफ भौतिकवाद भी जीवन मृत्यु को एक श्रृंखला में मानता है और मानता है कि जो जन्म लिया है उसकी मृत्यु तय है ओर मृत्यु के बाद फिर जीवन का प्रादुर्भाव होता है। इस प्रकार दोनों ही दृष्टिकोण से शरीर की मृत्यु तो अवश्यम्भावी है सो इस विषय पर शोक क्यों करें भला। शोक करने से निश्चित घटना नहीं टलने वाली है। तो फिर शोक करने से शोक बढ़ेगा ही शोक का कारण मृत्यु नहीं टलेगी। इस स्थिति में शोक करना अर्थहीन है।
इसी को और स्पष्ट करते हुए श्रीकृष्ण पुनः समझाते हैं कि जन्म लेने और मृत्यु के पश्चात सभी अव्यक्त होते हैं , दिखते नहीं हैं, उनकी उपस्तिति नहीं होती। सिर्फ जन्म से मृत्यु तक के बीच में ही जीव व्यक्त रहता है, और अपने व्यक्तित्व यानी इगो के अनुसार जीवन जीता है। उस जीव के जन्म लेने के पूर्व भी और मृत्यु के पश्चात भी जीवन चलता रहता है। सभी अलग अलग समय पर जन्म लेते हैं , अलग अलग समय पर मृत्यु को प्राप्त होते हैं, परन्तु समय का प्रवाह उनके जन्म के पूर्व भी रहता है और मृत्यु के बाद भी। जीवन काल का समय इसके अनुपात में अत्यल्प ही होता है और यही सत्य भी है।
इस प्रकार अर्जुन के विषाद को दूर करने हेतु श्रीकृष्ण ने उसे परिवर्तन के अपरिवर्तनीय सिद्धान्त, शरीर की नश्वरता और आत्मा/सेल्फ की शिक्षा दिया है और इस शिक्षा को पूरी करने के पश्चात अर्जुन को इस शिक्षा की गूढ़ता के सम्बंध में समझाते हैं कि आत्मा की शिक्षा सभी को नहीं मिल पाती। इसका कारण है कि हममें से अधिकांश लोग चाहे धर्म के रास्ते चलने वाले ही क्यों न हों , आत्मा के अन्वेषण की बिधि नहीं समझ पाते सो इससे दूर ही रहते हैं और जो इस शिक्षा के सम्बंध में सुनते भी हैं वो सांसारिक मोह वश उस ज्ञान को नहीं समझ पाते जो उनके दृश्य इगो के परे होता है। इस कारण से सुनने वाला भी नहीं जान पाता। तब सवाल उठता है कि जानता कौन है। आत्मा यानी अपने सेल्फ जो सभी में समान रूप से एक ही होता है जो मोह को त्यागता है, भ्रम से बाहर निकल पाता है अर्थात जो अवश्यम्भावी परिवर्तन के अपरिवर्तनीय सिद्धान्त को समझ पाता है और ऐसा कोई व्यक्ति विरले ही मिलता है। इस स्तर पर पहुँचने का मार्ग ज्ञानयोग और कर्मयोग है जिसे श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं।
अंत में श्रीकृष्ण अर्जुन को स्मरण कराते हैं कि चूँकि सभी जीवों में अनश्वर, अविकारी आत्मा का वास है जो जीव की मृत्यु से अप्रभावित रहती है सो किसी की मृत्यु पर शोक करना व्यर्थ है।
इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन के विषाद को दूर करने हेतु आत्मा से सम्बंधित शिक्षा को पूरी करते हैं।
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सारांश
श्लोक 11 से 30
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उपरोक्त विवेचना से दो चीजें स्पष्ट है, एक कि प्रकृति के कारण जो कुछ है वो सदा परिवर्तनीय है और दूसरा कि प्रत्येक जड़ चेतन की मूल अभिव्यक्ति उसके सेल्फ यानी आत्मस्वरूप यानी उसकी आत्मा से होती है जो प्रकृति से परे है, अपनिवर्तनिये, अविकारी, अनश्वर, अव्यक्त है और वही जीव का वास्तविक स्वरूप है जो सभी में समान है।
आत्मा के इस स्वरूप का ज्ञान होना सहज नहीं होता है। इसके लिए ज्ञान के क्रमिक विकास के द्वारा अज्ञान को दूर करना होता है। यह ज्ञान इन्द्रीयजनित तो होता है किंतु यह इन्द्रियों के वश में नहीं होता है।
आत्मा के इस स्वरूप का एक अनर्थ भी कई लोग निकाल लेते हैं कि चूँकि सभी भौतिक चीजें नश्वर हैं सो उनको त्याग कर देना चाहिए। अध्यात्म को प्राप्त करने का साधन भौतिक शरीर ही होता है सो इस शरीर से भागना, इस संसार से भागना हमें अध्यात्म से दूर ले जाता है। मोह त्यागने का अर्थ ये नहीं कि हम अपने दायित्वों से भाग जाएँ। आत्मा का ज्ञान इसी संसार में रहकर होगा और इसके लिए श्रीकृष्ण आगे दो वैकल्पिक रास्ते सुझाते हैं, ज्ञानययोग और कर्मयोग। दोनों ही कर्मप्रधान मार्ग हैं । कर्म कर ही हम आत्मसाक्षात्कार कर सकते हैं।