गीता अध्याय 2 श्लोक 32
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यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥
हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं
॥32॥
कर्तव्य पालन की आवश्यकता को समझाने के बाद श्रीकृष्ण कर्तव्यपालन के महत्व को बताते हैं। जब हम अपने निर्धारित कर्म को करते हैं तो हमें परम शांति की प्राप्ति होती है। जब हम अपने निर्धारित कर्तव्य को करते हैं तो निश्चित रूप से हम अपनी वर्तमान अवस्था से ऊपर ही उठते हैं और हमारे गुण और ज्यादा परिष्कृत होते हैं । ये तथ्य भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टिकोण से सही है।
यदि भौतिक दृष्टिकोण से देखे तो पाते हैं कि जब हम अपना कर्तव्य पूरा करते हैं तो हम अपने लक्ष्य को हासिल करते हैं और एक कदम आगे ही बढ़ते हैं। इस दृष्टिकोण से देखे तो पाते हैं कि अर्जुन एक क्षत्रिय है जिसका परम् कर्तव्य समाज से अनाचार, अत्याचार को समाप्त करना होता है ओर यदि आवश्यक हुआ तो इसके लिए आतताई का संहार भी करे। कौरव पक्ष छल से पांडवों का हक मारे हैं। ऐसे में अर्जुन और पांडव पक्ष का यही कर्तव्य है कि वे इस अत्याचार, असत्य, अनाचार को समाप्त करने के लिए कौरवों का नाश करें।
दूसरी ओर यदि हम इसके आध्यात्मिक पक्ष को देखें तो पाते हैं कि आसुरी गुणों से युक्त तमोगुण को समाप्त करने हेतु ये आवश्यक है कि देवी सम्पद आसुरी सम्पद को समाप्त करें। जब भी दैवी सम्पद को हम अपने अंदर मजबूत करने का प्रयास करते हैं, क्रोध, मोह, माया, अहंकार, भ्रम आदि आसुरी गुण रास्ते में खड़े हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में इन आसुरी सम्पद का नाश करना ही एकमात्र विकल्प होता है। यही हमारा कर्तव्य भी होता है। जब हम ऐसा करते हैं तो हमारे गुणों का स्तर बढ़ता है और हमारा वर्ण क्रमशः आगे बढ़ते बढ़ते हमें आत्मसाक्षात्कार यानी अपनी आत्मा की प्राप्ति की तरफ ले जाता है। आत्मसाक्षात्कार के पश्चात ही हमें ब्रह्म में प्रवेश की योग्यता मिल पाती है।
अपने कर्तव्यों का पालन कर लक्ष्य की तरफ बढ़ने का अवसर विरले लोगों को ही मिलता है। कई स्थितियों में तो हम पाते हैं कि कर्तव्य का भान रहने के बावजूद भी स्थितियाँ इस तरह से प्रतिकूल होती हैं कि हमें जो करना चाहिए उसे हम कर भी नहीं पाते, सो कर्तव्यपालन का सुअवसर मिलना भी एक बड़ी उपलब्धि होती है।