गीता अध्याय 2 श्लोक 34, 35, 36
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अकीर्तिं चापि भूतानि
कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
सम्भावितस्य चाकीर्ति-
र्मरणादतिरिच्यते॥
तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है
॥34॥
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥
और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे
॥35॥
अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥
तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख और क्या होगा?
॥36॥
युद्ध से विमुख अर्जुन को कर्तव्य पालन की शिक्षा देते हुए श्रीकृष्ण उसे बताते हैं कि जब व्यक्ति अपने नियत कर्तव्य अर्थात अपने गुणों के अनुसार निर्धारित कर्तव्य से विमुख होता है तो अपकीर्ति और पाप का भागी तो बनता ही है साथ साथ उसकी कीर्ति सदा सदा के लिए धूमिल हो जाती है। आप एक कर्तव्य से भागते हैं तो उससे मिलने वाली बदनामी उसी तक सीमित नहीं रहती बल्कि सामान्य जन मानस से लेकर आपके समकक्षी तक आपकी बदनामी को कहानी बनाकर प्रचारित करते हैं। कर्तव्य पालन से आप भागते एक बार हैं लेकिन उससे आपकी जो छवि बनती है वो हमेशा हमेशा के लिए लोगों के मन मस्तिष्क पर रह जाती है। इस तरह की बदनामी से क्या हासिल होता है? एक ओर तो आप कर्तव्य पालन के दायित्व निर्वहन से च्युत होकर स्वधर्म, पूण्य और कीर्ति तो गँवाते ही हैं साथ साथ दूसरी ओर इसका कलंक जीवन भर ढोते हैं। इस तरह से जीवन पर्यंत तिल तिल कर जिल्लत भरी जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त भी हो जाते हैं। तब आपको लगता है कि इस तरह से जीने से तो ज्यादा अच्छा मर जाना होता।
इस तथ्य को आध्यात्मिक स्तर पर समझें। जब हम अपने दैवी गुणों को गँवाते हैं तो आसुरी गुण ही बढ़ते हैं। ऐसे आसुरी गुण हमारे अंदर के दुर्गणों को उभरते हैं और हम अपने अंदर के दैवी-आसुरी गुणों के बीच के युद्ध से भाग अपनी समझ को आज्ञान से आच्छादित करते हैं। इस कारण हमारे अंदर की आसुरी प्रवृत्तियाँ हमें आत्मसाक्षात्कर से रोकती हैं। इस कारण समाज में अव्यवस्था , अनाचार, अधर्म भी हम फैलाते हैं जिसके कारण हमारे आसुरी गुण हमें अपकीर्ति देते हैं।
अब हम इस प्रसंग के भौतिक पक्ष को देखें।प्रस्तुत प्रसंग युद्ध का है। युद्ध के मैदान से भागे हुए को भला कौन वीर कहेगा। आप लाख तर्क वितर्क कर लें, अहिंसा और धर्म की दुहाई दे लें लेकिन जन समुदाय से लेकर विशिष्ट जन इसे युद्ध में प्रदर्शित कायरता ही कहेंगे। अर्जुन के युद्ध छोड़ देने से क्या युद्ध रुक जाने वाला था? कतई नहीं। दुर्योधन की जिद्द से भीष्म और द्रोण जैसे भले लोगों को भी युद्ध तो करना ही था। इसी प्रकार अन्य योद्धा भी लड़ते ही। तब जो लड़ते वो अर्जुन को क्या कहते? कायर ही न कहते! दूसरी तरफ अर्जुन के नहीं लड़ने से इस बात की भी सम्भावना बढ़ती कि कौरव युद्ध जीत जाते। तब वो विजय अत्याचार, अनाचार, असत्य, छल की विजय होती जिससे पांडव के साथ साथ आम जन भी प्रभावित होते। तब वो सब अत्याचार, अनाचार की वृद्धि के लिए स्वाभाविक रूप से अर्जुन को ही न दोषी मानते!
आप युद्ध की भूमि से बाहर निकल कर अपने आस पास देखें। व्यक्तियों के कर्तव्य पालन से विमुख होने से समाज और उसकी व्यवस्था चरमराती है तब हम उन उत्तरदायी व्यक्तियों को दोषी ठहरा कर वर्तमान और भविष्य के समस्त इतिहास में उन्हें कोसते रहते हैं। भावी पीढ़ियों के द्वारा भी उन कर्तव्य च्युत व्यक्तियों की कर्तव्यहीनता को कोसते रहते हैं। सो अपकीर्ति तात्कालिक नहीं रहकर सर्वकालिक हो जाती है।