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SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 18

गीता अध्याय 2 श्लोक 18
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अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
 अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥

इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर
 ॥18॥
आत्मा से परिचय  कराने के पश्चात श्रीकृष्ण एक बार फिर से सत की तरफ लौटकर समझाते हैं कि सत यानी आत्मा का नाश नहीं होता है, न ही इसका परिवर्तन होता है और न ही ये जानने में आता है। इस बात को समझने में थोड़ी सावधानी बरतनी होगी। आत्मा अनश्वर और अपरिवर्तनीय है ये तो हम हमझे हैं लेकिन ये अप्रमेय है इसे कैसे समझे। अप्रमेय यानी जिसका प्रमाण नहीं होता अर्थात जिसे प्रमाण के द्वारा नहीं जाना जा सकता। तो क्या आत्मा का ज्ञान होना असम्भव है?  
     श्रीकृष्ण की इस शिक्षा को समझने के लिए ये जरूरी है कि पहले हम ये तो समझे कि हमें ज्ञान मिलता कैसे है। ज्ञान प्राप्त करने का हमारा सबसे महत्वपूर्ण साधन हमारी इन्द्रियाँ यानी सेंसेज हैं। बाहरी जानकारी इन्द्रियों के माध्यम से ही हमें प्राप्त होती है। इसके माध्यम निम्न हैं---
1.प्रत्यक्ष प्रमाण, जिसे हम सीधे अपनी इन्द्रियों से ग्रहण करते हैं। (डायरेक्ट इनफार्मेशन)
2.अनुमान, किसी एक चीज के आधार पर हम दूसरी चीज के बारे में परिणाम निकालते हैं यानी 
उपलब्‍ध सूचना के आधार पर कोई राय बनाते हैं  या सत्‍यता का निर्णय करते हैं, से (इनफरेंस)
3.तुलना, दो चीजों की तुलना कर जानकारी इकट्ठा करते हैं(कंपेरिजन)
4.कारण-परिणाम, परिणाम का अध्ययन कर कारण जानने की प्रक्रिया (कॉज-इफ़ेक्ट रिलेशन)
5. अनुपलब्धि, किसी चीज के नही होने का तथ्य जानकर समझना कि वो चीज नहीं है या नहीं होती है(अनवैलबिलिटी)
6.शब्द प्रमाण, स्थापित/विद्वान गुरु के द्वारा कही बात को सही मानकर(वर्ड्स ऑफ ए रियलआइज़्ड मास्टर)
     ये सभी माध्यम इन्द्रियों पर निर्भर करते हैं लेकिन इनमें से किसी से भी आत्मा यानी सत यानी सेल्फ का ज्ञान नहीं मिलता है। चूंकि आत्मा/सत/सेल्फ  की जानकरी इन्द्रियों से नहीं मिलती सो श्रीकृष्ण इसे अप्रमेय यानी प्रमाण से परे मानते हैं। 
         तब हम सेल्फ यानी आत्मा को कैसे जानते हैं? दरअसल उपरोक्त सभी प्रकार के माध्यमों से आत्मा/सेल्फ का ज्ञान भले न मिलता हो , होता ये है कि हमारे सेल्फ के ऊपर अज्ञान की जो परत पड़ी होती है वो एक एक कर साफ होती जाती है। इससे अंततः हम ये समझ पाते हैं कि हमारी आत्मा /हमारा सेल्फ वास्तव में क्या है। अर्थात अज्ञान का सम्पूर्ण नाश ही आत्मबोध/आत्मज्ञान/आत्मा का ज्ञान/सेल्फ का ज्ञान देता है। दरअसल ज्ञान प्रकाश है जो अंधकार और उससे पैदा हुए भ्रम को समाप्त कर वास्तविकता को सामने ला देता है। यदि आप कँही जा रहें है या स्थिर बैठे हैं और घोर अंधकार है। आपको लगता है कि सड़क पर कुछ परा  हुआ है। आपको लगता है कि अरे ये लम्बी सी चीज तो साँप प्रतीत होता है । आप डर कर पीछे हट जातें हैं और टार्च की रोशनी करते हैं । तब आप पाते हैं कि अरे जिसे मैं साँप समझ रहा था वो तो रस्सी है। दरअसल प्रारम्भ से ही वँहा रस्सी ही है। ये तो अँधकार और उससे उपजा भ्रम था जिसके कारण हम उसे साँप समझ रहे थे। रौशनी होते अँधकार छंटता है यानी भ्रम खत्म होता है और तब आप वास्तविकता देख पाते हैं। ज्ञान ने साँप को रस्सी नहीं बना दिया, बल्कि ज्ञान ने अंधकार और भ्रम को हटा दिया जिससे हम वास्तविकता को जान पाए। इसीप्रकार ज्ञान जब हमारे सारे भ्रमों को मार देता है तब हमको पता चलता है कि हमारा सेल्फ/आत्मबोध/आत्मा क्या है। ज्ञान आत्मा को बनाता नहीं है, उससे परिचय कराता है।
    अब ये समझना भी जरूरी है कि आत्मा का निवास कँहा है। दरअसल आत्मा शरीर को धारण करती है। अविनाशी , अपरिवर्तनीय आत्मा का निवास देह है अर्थात इस परिवर्तनीय नाशवान  शरीर का अस्तित्व तभी तक है जब तक इसमें अनश्वर अपरिवर्तनीय आत्मा है अन्यथा इसका कोई अस्तित्व नहीं है। 
इतनी शिक्षा देने के पश्चात श्रीकृष्ण अर्जुन का आह्वाहन करते हैं कि इन्ही कारणों से तुम युद्ध करो। तो क्या श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए उकसा रहें हैं। जी नहीं। बल्कि वे तो ये कह रहे हैं कि जब तुमको ये बात समझ में आ गई कि आज्ञान का नाश ही सत्य को उद्घाटित करता है, आत्मा से परिचय कराता है सेल्फ यानी आत्मबोध को प्रत्यक्ष करता है तो फिर आज्ञान को हराना ही होगा, उससे युद्ध  करके असत के भ्रम को समाप्त तो करना ही होगा। यही युद्ध है जो आज्ञान को पराजित करने के लिए है, सत को उद्घाटित करने के लिए है। ये युद्ध क्या है, इसकी प्रकृति क्या है, ये होता कैसा है, परिणाम में क्या होता है इसे श्रीकृष्ण आगे स्पष्ट करते हैं।
इस प्रकार हम देख रहें हैं कि कैसे आज्ञान के कारण हम अपने कर्तव्य से भागते हैं और आज्ञान वश ही इसी अकर्मण्यता को महान बताने का उपक्रम करते रहते हैं। लेकिन हम तब तक अपनी अकर्मण्यता को और अपने कुतर्कों को नहीं समझ पाते जब तक हम अपने आत्मबोध से दूर होते हैं। "हम हैं" ये तो प्रमाणित है लेकिन "हम क्या है" ये अभी जानते हैं जब हमें अपनी आत्मा का बोध होता है, सेल्फ से परिचित होते हैं, और तभी हमको अपने कर्तव्यों की सही जानकारी भी मिल पाती है।

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It's a hard fact that more than common masses it's the elite, which ditches idea of India as enshrined in the Indian National Movement and in  the  Indian  Constitution. Role of the judiciaal elite in this context has been more objectionable considering the weight of onus she has to carry to carry on the democracy.     It's the elite which sets the course of actions in most of the cases. And among all elites judicial elites are of paramount importance. In india it's judicial elite which has been responsible for killing of democratic credentials.     And when elite fails masses step in and then elite becomes useless. Farmers movement is it's example. Success of farmers mov is not less than a revolution.