नैतिकता बनाम धर्म (इस आलेख में धर्म का प्रयोग रिलिजन के लिए किया गया है) जब तक नैतिकता व्यवहार से जुड़ी होती है उसके परिणाम अच्छे आते हैं क्योंकि इससे मनुष्य की सोच का स्तर बढ़ता है लेकिन जैसे ही नैतिकता धर्म का आवरण चढ़ा लेती है वैसे ही न सिर्फ विवादित हो जाती है बल्कि मनुष्य के लिए नुकसानदेह भी होने लगती है। व्यवहार का सम्बंध दृश्य और भोगे जाने वाले जीवन से होता है, धर्म पुनर्जन्म की बात करता है या फिर कुछ वैसी ही बातों से जुड़ा होता है। तब आज के व्यवहार का सम्बंध मनुष्य से कम और परा शक्तियों से अधिक हो जाता है, तक व्यक्ति मनुष्य समुदाय से अधिक अदृश्य परा शक्तियों के लिए कर्म करने लगता है। फिर ये भी तो है कि जीव विज्ञान की कसौटी पर जीवन सभी प्राणियों में समान होता है लेकिन धर्म असमानता पर आधारित है क्योंकि सभी एक ही धर्म को मानने वाले नहीं होते हैं, बल्कि धर्म के आधार पर वे आसमान हो जाते हैं। लेकिन आज मनुष्य की दिक्कत ये है कि वह एक विशेष पहचान खोजता है जो उसे राष्ट्र, धर्म, जाति और नस्ल से प्राप्त करना चाहता है क्योंकि ये पहचान पाने मे...