क्या कामनाएँ सच में वैसी ही बुरी होती हैं जैसा कि धार्मिक ग्रंथों में बतलाया गया है, धार्मिक सिद्धान्तों में गढ़ा गया है? पूरा का पूरा मिथकीय इतिहास और प्रमाणिक इतिहास कबीला से साम्राज्य बनने का इतिहास रहा है और इस विस्तार की प्रक्रिया को सबसे अधिक समर्थन मिला है धर्म और धार्मिक पहचान से और इस पूरी प्रक्रिया को अच्छे-बुरे के द्वैत के बल पर सराहा गया है जिसके कारण मिथकीय और प्रमाणिक इतिहास इंसानों की आपसी रंजिशों और लड़ाइयों से भरे पड़े हैं। इससे स्पष्ट है कि विश्व इतिहास के जिस दौर में कामनाओं को बुराई का नाम देने की प्रथा जोरों पर थी उस काल में भी कामनाओं की पूर्ति के लिए घमासान हिंसक युद्ध हो रहे थे और वही धर्म जो कामनाओं के त्याग की शिक्षा देते हैं , धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य के नाम पर इन संघर्षों को समर्थन भी दे रहे थे। ऐसे में जब कामनाओं के त्याग के लिए समाज का कुलीन वर्ग ही प्रस्तुत नहीं हो रहा था सामान्य जन से इसकी आशा क्यों की जा रही थी, ये भी स्पष्ट है। ऐसे में ये जरूरी हो जाता है कि इंसान ऐसे नैतिक मूल्यों के बाध्यकारी सिद्धान्तों को फिर से गढ़े जिसमें कामनाओं का तिरष्कार न हो बल्कि कामनाओं को नैतिक मूल्यों के साथ साथ जीने के लिए प्रशिक्षित किया जाता हो।
गीता अध्याय 2 श्लोक 47 ----------------------------------- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो ॥47॥ कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके। श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं। ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं----- 1....