भारतीय समाज के उत्थान के लिए श्रीकृष्ण की शिक्षा का महत्व
आखिर हमने कभी सोचा है कि श्रीमद्भागवद्गीता में श्रीकृष्ण क्यों बार बार समझाते हैं कि ईश्वर कँही बाहरी दुनिया में , किसी अन्य लोक में नहीं होते, बल्कि ईश्वर होना एक अवस्था है जिसे कोई भी व्यक्ति एक निशित तरीके से कर्म कर प्राप्त कर सकता है। यह एक ऐसी शिक्षा है जो मनुष्य की अपार क्षमताओं का सम्मान करती है , मनुष्यों के बीच के भेद-भाव को नकारती है, मनुष्यों को प्रेरित करती है कि वे स्थापित अच्छे गुणों को अपनावें और सामाजिक हित की बात करती है। लेकिन साथ ही हर तरह की कुरीतियों, हर तरह के भेद भाव, अंधविश्वास, अत्याचार, अनाचार, परतंत्रता, असत्य भाषण का खुल कर विरोध करती है श्रीकृष्ण की शिक्षा।
श्रीमद्भागवद्गीता में श्रीकृष्ण की शिक्षाओं का प्रसार होने से अत्याचार, अनाचार, व्यभिचार, स्वार्थपरकता, हिंसा, असत्य , परतंत्रता , संकुचित सामाजिक कुरीतियों पर कुठाराघात होता है और समाज के कॉमन गुड के लिए निःस्वार्थ भाव से कार्य करने की प्रेरणा मिलती है, प्रेरणा मिलती है कि हम स्वयम के स्तर को ऊपर उठाएँ, अपने अंदर अच्छे गुणों जैसे सत्य, अहिंसा, प्रेम, समर्पण, सेवा आदि को विकसित करें ताकि हम तो ऊपर उठ ही सकें , हम समाज के वृहत्त कल्याण के लिए भी प्रयास कर सकें।
श्रीकृष्ण जँहा एक तरफ सामाजिक उत्थान की बात करते हैं वंही साथ में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी बहुत महत्व देते हैं। वे स्पष्ट कर देते हैं कि व्यक्ति स्वयम अपने कर्मों का उत्तरदायी है और एक व्यक्ति का उत्थान तभी सम्भव है जब वह स्वयम प्रयास करे। उसका उत्थान किसी अन्य के द्वारा, यँहा तक कि जिसे ईश्वर कहा जाता है उसके द्वारा भी सम्भव नहीं है। इस प्रकार श्रीकृष्ण एक अद्भुत दार्शनिक और कर्मयोगी के रूप में हमारे सामने आते हैं जो सफलता पूर्वक प्रमाणित करते हैं कि व्यक्ति के विकास से समाज का कल्याण होता है समाज के उत्तम स्वास्थ्य का लाभ व्यक्ति को प्राप्त होता है । इस पूरी प्रक्रिया में वे मनुष्यों के बीच किसी भी प्रकार के भेद भाव का विरोध करते हुए मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वरत्व है जिसे प्राप्त करने का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को है।
यदि हम श्रीकृष्ण के इस दर्शन को समझ कर अपनाते हैं तो भारतीय समाज में चल रही ढेरों परम्पराओं को कुरीति की श्रेणी में रखकर हम उनसे मुक्ति पाकर भारतीय समाज का उत्थान कर सकते हैं। और यही सत्य विश्व के सभी समाजों पर समान रूप से लागू होता है।