लॉकडाउन के नैतिक प्रश्न
राज्य या किसी भी अन्य संस्था अथवा व्यक्ति को ये अधिकार किसी भी कानून या नैतिकता के पाठ के अनुसार है क्या कि वह संस्था या व्यक्ति अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को जीवन जीने के अधिकार से बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के वंचित कर सके अथवा ऐसे व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूह को जीते जी जीने की अनिवार्य आवश्यकताओं से वंचित कर सके? और क्या जीने की अनिवार्य आवश्यकता में मात्र भोजन ही शामिल है अथवा भोजन के अतिरिक्त भी कुछ शामिल है? एक और जुड़ा हुआ प्रश्न है कि क्या किसी सरकार, संस्था या व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को उनके रोजगार से जो उन्हें पूर्व से प्राप्त रहा है उससे बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के वंचित कर सके? क्या व्यक्ति के जीने के अधिकार में, उस हद तक जिस हद तक उसके परिवार के सदस्य अपनी आजीविका के लिए उसपर निर्भर हैं, उस व्यक्ति के परिवार के सदस्यों के जीने के अधिकार नहीं शामिल हैं , जैसे यदि किसी व्यक्ति की आजीविका ले ली जाती है तो क्या यह कृत्य उन लोगों पर जो अपने जीवन यापन के लिए उस व्यक्ति पर निर्भर होते हैं उनके जीवन जीने के अधिकार को नहीं छीन लिया जाता है जबकि ऐसे आश्रितों की उस व्यक्ति को मिलने वाले दंड में कोई भूमिका भी नही। होती है?
ये ऐसे चन्द नैतिक सवाल हैं जिनको किसी भी तरह के एक सामान्य से अधिक समय के लिए लगाए जाने वाले वाले लॉकडाउन के पूर्व सुलझाना नैतिक रूप से तो अनिवार्य है ही, संवैधानिक व्यवस्था के तहत मौलिक अधिकारों की व्यवस्था के अधीन भी अनिवार्य है। यहॉ वह प्रश्न हैं जिनको सुलझाने के लिए किसी भी प्राधिकार को समाज और न्यायालय द्वारा उत्तरदायी बनाया जाना जरूरी है अन्यथा पहले से धनी वर्ग के पक्ष में चली आ रही घोर असमानता में बढोत्तरी ही होगी जिसके कारण सामाजिक अस्थिरता के साथ साथ सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीति अस्थिरता भी होगी।