नैतिकता बनाम धर्म
(इस आलेख में धर्म का प्रयोग रिलिजन के लिए किया गया है)
जब तक नैतिकता व्यवहार से जुड़ी होती है उसके परिणाम अच्छे आते हैं क्योंकि इससे मनुष्य की सोच का स्तर बढ़ता है लेकिन जैसे ही नैतिकता धर्म का आवरण चढ़ा लेती है वैसे ही न सिर्फ विवादित हो जाती है बल्कि मनुष्य के लिए नुकसानदेह भी होने लगती है। व्यवहार का सम्बंध दृश्य और भोगे जाने वाले जीवन से होता है, धर्म पुनर्जन्म की बात करता है या फिर कुछ वैसी ही बातों से जुड़ा होता है। तब आज के व्यवहार का सम्बंध मनुष्य से कम और परा शक्तियों से अधिक हो जाता है, तक व्यक्ति मनुष्य समुदाय से अधिक अदृश्य परा शक्तियों के लिए कर्म करने लगता है। फिर ये भी तो है कि जीव विज्ञान की कसौटी पर जीवन सभी प्राणियों में समान होता है लेकिन धर्म असमानता पर आधारित है क्योंकि सभी एक ही धर्म को मानने वाले नहीं होते हैं, बल्कि धर्म के आधार पर वे आसमान हो जाते हैं। लेकिन आज मनुष्य की दिक्कत ये है कि वह एक विशेष पहचान खोजता है जो उसे राष्ट्र, धर्म, जाति और नस्ल से प्राप्त करना चाहता है क्योंकि ये पहचान पाने में उसे अपना कोई योगदान नहीं देना पड़ता, ये पहचान उसे जन्म से मिल जाते हैं जबकि नैतिक होने के लिये उसे अपने प्रयास से एक ऐसा व्यवहार विकसित करना होता है जो समाजोपयोगी हो। आम तौर पर मनुष्य इस प्रयास से बचना चाहता है। जैसे यदि नैतिकता सिखाती है कि क्रोध मत करो तब इस सीख को हासिल करने में इंसान को एक लंबे अभ्यास की जरूरत होती है , न कि किसी भी धर्म विशेष का होने से उसे ये गुण प्राकृतिक रूप से मिल जाता है। साथ ही यदि नैतिक होना अच्छा होना होता है तो धर्म विशेष का होना गुण नही जन्म पर निर्भर होने के कारण व्यक्ति इस विरोधाभास से बच जाने की कोशिश करता है। वह अपने गलत कर्मों को नैतिकता की दुहाई दे कर उनकी वकालत नहीं कर सकता है क्योंकि ये सार्वभौमिक है किंतु धर्म की आड़ लेकर वह गलत कर्मों जैसे हिंसा को भी सफलता पूर्वक सही ठहराया लेता है। नैतिकता की रक्षा के लिए युद्ध नहीं लड़े जाते किन्तु धर्म की रक्षा के नाम पर क्रुसेड से लेकर जिहाद तक छेड़े जाते रहें हैं और उनकी याद में राजनीतिक सत्ता की सौदेबाजी भी होती रही है जो हमेशा ही अनैतिक रहा है। सो नैतिक बनने पर ज्यादा जोड़ होना चाहिए चाहे धार्मिक पहचान कुछ भी क्यों न हो। नैतिकता ही इस धरती को a better place में तब्दील कर सकती है।