Skip to main content

नागरिक शिक्षा की जरूरत

       नागरिक शिक्षा की जरूरत

 सबेरे से शाम तक हम सूचनाओं से घिरे रह रहे हैं, कई तरह के लोगों के ओपीनियंस को देखते रह रहे हैं और बार बार इन सूचनाओं और विचारों को respond भी करते रहते हैं। यह सब के साथ हो रहा है, छोटे से बच्चे को ले लीजिए या अधेड़ व्यक्ति को, पुरुष को लीजिये या महिला को। हम सब दिन भर कई तरह के स्तर पर सूचना और ओपिनियन के भीड़ में रह रहे होते हैं। किंतु जब  आप थोड़ी देर के लिए इन सब से ब्रेक लेकर अकेले होकर सोचेंगे कि दिन भर की भीड़ में आप कँहा हैं तो जोर का झटका लगता है, क्योंकि हमारे पब्लिक डिस्कोर्स से एक इंसान के रूप में समाज में हमारी कोई जगह नहीं रह गई है। हम उपभोक्ता हैं, हम मतदाता हैं, हम फलाना पंथी हैं, लेकिन बन्धु हम ये नहीं जान पाते हैं कि हम भी इसी समाज के नागरिक भी हैं और नागरिक के रूप में हमारी सिविल जरूरते भी हैं जिसपर कोई बात करता नहीं मिलेगा। लोगों को , खुद आपको भी खुद से ज्यादा किसी अन्य की चिंता होगी, जो आपकी तरह नागरिक नहीं, नागरिक से मतदाता, भक्त, उपभोक्ता बनाने वाला सुपर हीरो है जो हमारे  सिविल पहचान को अपने नफा नुकसान के अनुसार गढ़ रहा होता है और हम उस तरह के बनने की ख्वाइश में खुद के सिविल पहचान को गँवाने के लिए तैयार होते जाते हैं क्योंकि हमारे डिस्कोर्स में हमारी शिक्षा वयवस्था, स्वास्थ्य सुविधा, हमारे नागरिक अधिकार और  नागरिक सुविधाओं, आर्थिक विकास, असमानता, आदि के विषय गायब हो जाते हैं और प्राथमिकता होती है उन विषयों की जो सिर्फ फ़िक्शस ही नहीं fractured भी हैं जैसे हम जन्म आधारित कंप्लीमेंट्स जैसे अपनी जाति(जाति व्यवस्था नहीं) धर्म, राष्ट्रीयता, प्रांतीयता, भाषा आदि से जुड़े होते हैं। इन विषयों का हमारे सिविल existence में कोई स्थान नहीं होना चाहिए था क्योंकि ये हमारे जीवन स्तर को बेहतर बनाने वाले तत्व नहीं होते लेकिन हम इनको तरजीह देकर खुद को प्रोडक्ट के रूप में ही रहने के लिए विवश कर देते हैं और खुद के ऊपर हर तरह की ताकत को हावी होने देते हैं। इन फैक्ट वी हैव बिकम प्रोडक्ट ऑफ द पावरफूल्स ओपिनियन।
       जरूरी है पद, हैसियत, राजनीतिक झुकाव, धार्मिक, /जातीय/राष्ट्रीय/एथनिक पहचान की बातों को दरकिनार कर जनता की तरह, नागरिक बनकर चीजों को देखने समझने की। 
      वस्तुतः हमें तो उस सुकरात की जरूरत है जो विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाता था, जो दरबार का भाँट(नवरत्न) नहीं था बल्कि वो एथेंस की सड़कों और गलियों में घूम घूम कर आम नागरिकों से एथिक्स, मोरल, वैल्यूज, लॉज़ , पॉलिटिक्स पर बहस करता था, उनको शिक्षित और तार्किक बनाता था। हमें नेता नहीं जनता से डायलॉग करने वाला , जनता के सवालों को तार्किक ढंग से उठाने, उनपर खुले में खुल कर बोलने वाला चाहिए, न कि अपने मन की बात करने वाला।
      आज जनता की आवाज का अपहरण कर लिया जा चुका है और ऐसा सिर्फ राजनीति के द्वारा किया गया हो ये भी बात नहीं है। देश के संसाधनों के बल पर देश विदेश में पढ़े और आज दुनिया के  बड़े इंटेलकचुअल्स में शुमार प्रिविलेज्ड नागरिकों  के द्वारा  भी हमारे नागरिक सवालों को बंधक बनाया गया है। समाज के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व निभाने  की जगह उनमें से कई ओपिनियन इंडस्ट्री के माफिया या माफिया के एजेंट हो चुके हैं। एक ऐसा माहौल की आभासी दुनिया रची गई है जिसमें ये समझाया जाता है कि जनता को अपने सवाल नहीं पता हैं सो वे जनता की आवाज बनकर आये हैं। मैं नाम तो नहीं रखूँगा लेकिन वो दिन कँहा गए जब छोटे शहरों के लाइब्रेरी से विचारों की आँधी बाहर आती थी और जनता को झझकोर कर रख जाती थी? वे कौन लोग हैं जो जनता की आवाज के नाम पर जनता को ठग रहे हैं? शहरों और गाँवों की शिक्षा की गुणवत्ता को खा पीकर मेट्रो में ज्ञान का डकार लेने वाले उसी राजनीतिक सत्ता के जाने अनजाने एजेंट बन जाते हैं जो पहले से ही इन सवालो को गौण करने के फेरे में लगी हुई होती है। ऐसे कितने देश हैं जो आजाद होने के बाद खूनी राजनीति उथल पुथल से बचे रहे? भारत इन चुनिंदा देशों में एक रहा है। फिर भी जनता को सही शिक्षा, बढ़िया हेल्थ से वंचित रखकर उसे मात्र उपभोक्ता बनाकर क्यों रखा गया है। याद कीजिये आज से 4 -5 दशक पूर्व छोटे शहरों और गांवों में सूचना की भीड़ भले कम हो, सिलेबस बहुत आधुनिक नही रहा हो, अवसर की घोर असमानता रही हो फिर भी सरकारी संस्थाएँ अध्ययन अध्यापन का कार्य करती थीं। क्यों और किस साजिश से शिक्षा की व्यवस्था से गुणवत्ता और सोचने विमर्श करने की संभावना को छोटे और मझोले शहरों से गायब कर दिया गया। स्कूल ,कॉलेज, यूनिवर्सिटी का शैक्षणिक माहौल खत्म किया गया; पब्लिक लाइब्ररी , वाचनालय, सेमिनार जैसी चीजें जो छोटे शहरों में भी हुआ करती थी उनको अजायबघर भेज दिया गया। जनता को जातिगत और साम्प्रदायिक राजनीति का चस्का लगाया गया। फायदा किसको हुआ और नुकसान किसको?  जो राजनीति में जा सके, जो महँगी और अंग्रेजी शिक्षा को अफ़्फोर्ड कर सके , जो ग्लोबलाइजेशन से पनपी असमानता में मुठ्ठीभर लाभुक बन सके फायदा उनको हुआ, और नुकसान हुआ अधिसंख्य लोगों का। मुगल इतिहास पर मारा मारी करने वालोन और वर्ण व्यवस्था के प्रिविलेज्ड कास्ट और संख्याबल की जातिगत राजनीति करने वालों से पूछिए कि खुद आपकी अपनी ही पीढ़ी के इतिहास से विमर्श का स्थान खाली क्यों हो गया?
   तो ऐसा कैसे सम्भव हो कि जनता के बीच एक बार फिर से सिविक एजुकेशन और सिविक डिस्कोर्स लौट कर आ सके? जरूरत है सुधार आंदोलनों की, जरूरी है बड़े पैमाने पर ऐसे प्रेसर ग्रुप्स को तैयार करने की जो न सिर्फ जनता की आवाज बन सकें बल्कि राजसत्ता और समाज सता इतना दबाव बना सकें कि जनता की आवाज मुठ्ठी भर प्रिविलेज्ड लोगों को सुनाई ही नहीं पड़े बल्कि उनको ये भी लग सके कि यदि शिक्षा, स्वास्थ्य के मसलों को और टाला गया तो सत्ता में परिवर्तन अवश्यम्भावी हो जाएगा। जरूरत ये भी है कि जनता के सामूहिक हित से इतर जो भी डिस्कोर्स है उसे राजनीति से तडिपाड़ कर दिया जाए।
    इन विषयों पर फिर कभी।

Popular posts from this blog

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 47

गीता अध्याय 2 श्लोक 47 ----------------------------------- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो  ॥47॥ कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके।        श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं।       ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं----- 1....

श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक

श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक-- श्रीमद्भागवत गीता की शुरुआत महाभारत का युद्ध वास्तविक रूप से शूरु होने के ठीक पहले होती है और इसके अंत के साथ युद्ध प्रारम्भ होता है। तो क्या गीता युद्ध को उकसाने वाला ग्रंथ है?      इस प्रश्न का उत्तर द्वितीय अध्याय की शुरुआत में ही मिल जाता है। प्रथम अध्याय के अंत में अर्जुन हथियार डाल देता है, साफ साफ मना कर देता है कि वो अपने अंग्रजो, अनुजों, गुरुओं, बंधुओं से नहीं लड़ेगा।।सनद रहे वो डरा नहीं था, उसे  विषाद  हो गया था, वो डिप्रेशन में चला गया था। उस समय उसे उकसाने का सबसे सरल तरीका क्या  हो सकता था? कृष्ण उसे जुआ यानी चौसर की सभा याद दिलाते, द्रौपदी का वस्त्रहरण याद दिलाते, लाक्षागृह याद दिलाते, वनवास के दिन याद दिलाते। तब ज्यादा सम्भावना थी कि अर्जुन हिंसक हो कर युद्ध के लिए ततपर हो उठता। लेकिन तब अर्जुन हिंसक होता, उसमें और कौरवों में कोई फर्क नहीं रह जाता। जैसे को तैसा होता । लेकिन कृष्ण ने उसे आत्मा की अजरता, कर्तव्यबोध, धर्म, कर्म के विषय में बताया। एक बार भी प्रतिशोध की आग नहीं भड़काई उन्होंने, बल्कि उसे सत...
It's a hard fact that more than common masses it's the elite, which ditches idea of India as enshrined in the Indian National Movement and in  the  Indian  Constitution. Role of the judiciaal elite in this context has been more objectionable considering the weight of onus she has to carry to carry on the democracy.     It's the elite which sets the course of actions in most of the cases. And among all elites judicial elites are of paramount importance. In india it's judicial elite which has been responsible for killing of democratic credentials.     And when elite fails masses step in and then elite becomes useless. Farmers movement is it's example. Success of farmers mov is not less than a revolution.