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Showing posts from February, 2021
Sanskritization is sociological jargon characterising the cultural movement of India's middle and lower castes and in some cases tribes as well towards higher echelons of caste hierarchy by adopting cultural practises of those castes at higher hierarchy. Recently the same phenomenon is happening in the field of power politics also. Sociological Sanscritization had not only enabled the lower and middle castes to achieve higher cultural bases, but also empowered them politically and economically. In the middle of the last decade with the fall of Congress party majority of political class started shifting towards the BJP which had come in power in center. If it would have been just a political migration for the sake of share in political power only it could be explained in terms of defection but the reality is that for the first time this shift or migration was not only for political gains as commonly misunderstood . BJP represents the rise of Hindu hegemony , hindus for the first tim...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 30

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 30 मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा।  निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥ मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर  ॥30॥ अब श्रीकृष्ण एक बार फिर से कर्म करने की विधि को समझाते हैं। हमने देखा समझा है कि व्यक्ति की  प्रकृति और पुरुष यानी आत्मा से होती है। हम जो भी कर्म करते हैं वो कर्म हमारी प्रकृति के द्वारा किये जाते हैं। हमारे कर्म हमारी प्रकृति के तीन गुणों के ही परिणाम होते हैं जिनके सम्बन्ध में हमें भ्रांति होती है कि उन कर्मों को तो हम कर रहें हैं, कि हम कर्ता हैं। लेकिन हो ज्ञानी हैं, जो समझदार हैं, वे जानते हैं कि हम जो कर्म कर हैं वे हमारी प्रकृति के तीन गुणों के अनुपात के द्वारा हो रहा है और हमारे सेल्फ की उन कर्मों को करने में कोई भूमिका नही है, बल्कि सेल्फ यानी आत्मा यानी पुरुष तो मात्र साक्षी होता है, उसी के समक्ष प्रकृति के गुण कर्म करे होते हैं।        हमने ये भी समझा है कि जिन्हें इस सत्य का बोध नहीं...

नेतृत्व की लोकतांत्रिक विधा

            नेतृत्व की लोकतांत्रिक विधा यदि नेतृत्व करने वाला अपने आचरण और अपनी उपलब्धियों के उदाहरण को अपने अनुयायियों के समक्ष रखकर उनसे उस मार्ग का अनुसरण करने की अपेक्षा करता है तो उसके अनुयायी स्वतः उसके द्वारा बताए मार्ग का अनुसरण करने लगते हैं। ऐसा श्रेष्ठ व्यक्ति समाज के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाता है, उसे लोग रोल मॉडल के रूप में स्वीकार करने लगते हैं और उस व्यक्ति के नेतृत्व में समाज में सद्भाव और उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है और संघर्ष की मात्रा का ह्रास होता है। यही तो नेतृत्व का लोकतांत्रिक सिद्धान्त है जिसमें persuation का विशेष महत्व होता है और दमन का कोई स्थान नहीं होता है। हमें ऐसा लगता है कि यह लोकतांत्रिक व्यवहार आधुनिक दर्शन की देन है लेकिन यदि हम गौर करें तो पाते हैं कि इस लोकतांत्रिक नेतृत्व कला को श्रीमद्भागवद्गीता में बहुत पहले निरूपित किया जा चुका है। श्रीमद्भागवद्गीता के कई श्लोकों में श्रीकृष्ण नेतृत्व की इस विधा को समझाते हैं यथा तीसरे अध्याय के 26 और 29 वाँ श्लोक। इन श्लोकों में  श्रीकृष्ण अर्जुन को इसी नेतृत्व कला की जानकार...