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Showing posts from October, 2020

श्रीमद्भागवद गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण- अध्याय 2 भाग 3 -आत्मा से परिचय- श्लोक 16 से 30

श्रीमद्भागवद गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण- अध्याय 2 भाग 3 -आत्मा से परिचय- श्लोक 16 से 30 गीता अध्याय 2 श्लोक 16 ----------------------------------- नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।  उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥ असत्‌ वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत्‌ का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है  ॥16॥      परिवर्तन के नियम को समझाने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि दो तरह की वस्तुएँ होती हैं-सत और असत यानी REAL और NOT REAL या UNREAL । श्रीकृष्ण के अनुसार ये तथ्य नया नहीं है बल्कि बहुत पहले से उन लोगों के द्वारा कहे गये हैं जिनको सत्य का ज्ञान रहा। जिनको सत्य का ज्ञान होता है उनको तत्वदर्शी कहते हैं।       सत, असत और तत्वदर्शी शब्दों के अर्थ आपस में जुड़े हुए हैं। इस निरन्तर परिवर्तनशील संसार में हर वो चीज जो निरन्तर परिवर्तनशील होती है वही असत है। परिवर्तनशील वस्तुओं की खाशियत है कि वे सिर्फ वर्तमान में होते हैं, अतीत में और भविष्य में उनका कोई वजूद नहीं होता है। अर्थात अस्थ...

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 17

गीता अध्याय 2 श्लोक 17 ---------------------------------- अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌।  विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥ नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्‌- दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है  ॥17॥ अनश्वरता और अवश्यम्भावी  परिवर्तन के सिद्धान्त से जो मूल बात निकल कर सामने आती है वो है इस निरन्तर परिवर्तनशील संसार में कुछ ऐसा भी है जो निरन्तर अपरिवर्तनशील है, सनातन अनश्वर है। यँहा एक बा त बात बहुत मायने रखती है। हम ऊर्जा को देख नहीं सकते, लेकिन ऊर्जा व्याप्त है। ऊर्जा का मेनिफेस्टेशन हम देखते हैं, जैसे अग्नि, विधुत, गति, प्रकाश , स्थिरता आदि। इसे हम जानते भले न हो लेकिन मानते जरूर हैं।  दुनिया के बहुतेरे बातों को जिनको हम समझ नहीं पाते मानते हैं, फिर जैसे जैसे हमारे वैज्ञानिक ज्ञान का स्तर बढ़ता है हम धीरे धीरे गलत से सही को जानने लगते हैं। विज्ञान वह विशेष ज्ञान है जिसके पीछे अकाट्य तर्क होता है, सार्वभौमिक प्रमाण होता है। यह ज्ञान स्वयम में निरन्तरता लिए हुए होता है। इसकी खोज का जो प्रमाणिक तरीका है...

HOW A LEADER BECOMES FEARLESS

Fear is omnipresent and this is the most dangerous element for a a person doing anything, and for example here for a person claimed to be a leader of an organization or of a country itself. A person in the position of leadership is bound to face enormous challenges and if wants to establish his/her leadership he has to prove his /fearlessness.      It's said SELF is eternal. Indian tradition believes so. But it also believes one more thing. U can't realize ur SELF till u r under the cover of illusion and delusion. Illusion and delusion prompt u to believe in the current happenings as real and ever lasting. They are supposed to exist for all the time and under this delusion a leader is vulnerable to the idea of loss. This IDEA OF LOSS extracts all vision and courage to have a vision. Under this influence the leader fails to take a decision and when a leader fails to make decisions he/she loses the charm of his / her leadership.      Then what's the way to co...

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 16

गीता अध्याय 2 श्लोक 16 ----------------------------------- नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।  उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥ असत्‌ वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत्‌ का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है  ॥16॥      परिवर्तन के नियम को समझाने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि दो तरह की वस्तुएँ होती हैं-सत और असत यानी REAL और NOT REAL या UNREAL । श्रीकृष्ण के अनुसार ये तथ्य नया नहीं है बल्कि बहुत पहले से उन लोगों के द्वारा कहे गये हैं जिनको सत्य का ज्ञान रहा। जिनको सत्य का ज्ञान होता है उनको तत्वदर्शी कहते हैं।       सत, असत और तत्वदर्शी शब्दों के अर्थ आपस में जुड़े हुए हैं। इस निरन्तर परिवर्तनशील संसार में हर वो चीज जो निरन्तर परिवर्तनशील होती है वही असत है। परिवर्तनशील वस्तुओं की खाशियत है कि वे सिर्फ वर्तमान में होते हैं, अतीत में और भविष्य में उनका कोई वजूद नहीं होता है। अर्थात अस्थाई ही असत है। लेकिन इस असत का अनुभव तो होता ही है न। आखिर इस तथ्य का कैसे उद्घाटन हो पाता...

SNIPPETS

1.To empower people and not to power over people. 2.Lead his people to believe in impossible 3, CONFLICTS AND DISAGREEMENT       When you and your coworkers push one another to continually ask if there’s a better approach, that creative friction is likely to lead to new solutions. “Conflict allows the team to come to terms with difficult situations, to synthesize diverse perspectives, and to make sure solutions are well thought-out,” says Liane Davey, cofounder of 3COze Inc. and author of  You First: Inspire Your Team to Grow Up, Get Along, and Get Stuff Done . “Conflict is uncomfortable, but it is the source of true innovation, and also a critical process in identifying and mitigating risks.” And there’s rarely a fixed amount of value to be gained in a disagreement. If you and your colleague are arguing about the best way to roll out a new initiative      Opportunities to learn and grow.  As uncomfortable as it may feel when someone challenges yo...

SHRI MADBHAGWAT GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 15.

गीता अध्याय 2 श्लोक 15 ------------------------ ----------- यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।  समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है  ॥15॥     अभी तक की व्याख्या में श्रीकृष्ण  ने शोक,विषाद एवं हर्ष के कारणों को स्पष्ट कर दिया है। अब  वे दो तथ्य और बताते हैं, पहला की किस प्रकार के व्यक्ति को हर्ष या विषाद नहीं हो पाता और  दूसरा की इस प्रकार के व्यक्ति की क्या उपलब्धि होती है जीवन में।       हमने देखा कि जब इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति और भौतिक चीजों को महसूस करने और उस अनुभव को हमारे मस्तिष्क की अनुभूतियों द्वारा व्यख्या की जाती है तब  हमें सुख या दुख का अनुभव होता है। इन्द्रियों को हम प्रकृति से जितना विलग करेंगे इस सुख दुख की अनुभूति से हम उतना ही दूर होंगे क्योंकि इन्द्रियाँ यानी सेंसेस ही सुख और दुख जैसी भावनाओं की उत्पादक और वाहक हैं। लेकिन ये अचानक नहीं हो सकता। इसके लिए सतत अभ्य...

श्रीमद्भागवद गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण- अध्याय 2 भाग 2 -अनश्वरता और परिवर्तन श्लोक 11 से 15

श्रीमद्भागवद गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण- अध्याय 2 भाग 2 -अनश्वरता और परिवर्तन श्लोक 11 से 15 गीता अध्याय 2 श्लोक 11 ------------------------------------      ( सांख्ययोग का विषय )  श्री भगवानुवाच  अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।  गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥ श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते  ॥11॥        शोकाकुल अर्जुन के दिलोदिमाग पर श्रीकृष्ण की पहली हीं पंक्तियाँ बहुत कड़ी पड़ती है। शब्दों के विन्यास से लगता है कि एक तरह की झिड़की मिलती है अर्जुन को कि वह वैसे लोगों के लिए दुखी हो रहा है जिनके लिए दुखी होने की कोई जरूरत नहीं है। फिर एक बार और कड़े शब्द उसे सुनने को मिलते हैं कि वह बातें तो ज्ञानी सा कर रहा है पर है नहीं ज्ञानी , क्योंकि ज्ञानी न तो मरने वाले के लिए दुखी होते हैं न ही जीने वाले के लिए।       इस प्रका...

SHRIMADBHAGWAT GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 14

गीता अध्याय 2 श्लोक 14 -----------------  ----------------- मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।  आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥ हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर  ॥14॥ परिवर्तन संसार का नियम है। आत्मा की अजरता अमरता बताने के पश्चात श्रीकृष्ण अर्जुन को निरन्तरता के महत्व को समझाते हैं। इस संसार में जो भी भौतिक है वह समय के साथ परिवर्तनशील है। इसका अनुभव हमें हमारी इन्द्रियाँ यानी हमारे सेंस कराते हैं। रूप, स्वर, घ्राण, स्वाद और स्पर्श हमारी इन्द्रियों से व्यक्त होती है जो क्रमिक रूप से आँख, कान, नाक जिह्वा और त्वचा से महसूस की जाती हैं। हमारी इन्द्रियाँ भौतिक वस्तुओं को इन इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव करती हैं। तब मस्तिष्क इन अनुभवों की व्याख्या करता है और हम किसी भौतिक वस्तु के प्रति अपनी भावना व्यक्त करते हैं, जैसे यह सुंदर है, दूर है, उसकी आवाज कर्कश है, इसका स्वाद मीठा है, वह गर्म है इत्यादि। इन्द्रियाँ भौतिक तत्व को उसके गुण के अनुसार महस...

SHRIMADBHAGAVAT GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 13

गीता अध्याय 2 श्लोक 13 ------------------------------------ देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।  तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥ जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।13॥ अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण पुनः समझाते हैं कि शरीरों की मृत्यु एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसपर अस्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की जा सकती है। जन्म के पश्चात शरीर की जो विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं उनमें बाल्यावस्था, युवावस्था, बृद्धावस्था तो हैं ही मृत्यु भी एक अवस्था ही है जैसे जन्म और जन्म के पश्चात की अन्य अवस्थाएँ।  देह की समाप्ति से कुछ होता नहीं है। जन्म होने के पश्चात हमारी आपकी एक सामाजिक पहचान बनती है और हम जीवन भर उसी सामाजिक पहचान को जीते हैं एक ईगो यानी अपना एक अहम लेकर। लेकिन इस ईगो यानी अहम के अतिरिक्त एक आत्मबोध भी होता है, एक SELF भी होता है जो हमेशा एक सा ही रहता है चाहे जो अवस्था हो। मृत्यु के पूर्व हमारा स्व एक शरीर विशेष में होता है जिससे हम खुद को बाहरी तौर प...

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 12

गीता आध्याय 2 श्लोक 12 ------------------------------------  त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।  न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥ न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे  ॥12॥ अर्जुन के विषाद को अकारण होने का कारण बताते हुए श्रीकृष्ण पहली बार आत्मा की अमरता और अजरता की तरफ अप्रत्यक्ष रूप से ध्यान खींचते हैं जिसे आगे और स्पष्ट भी करते हैं। विषाद या दुख किसके लिए हो सकता है?  दुख या विषाद हमें तब होता है जब हमें लगता कि कोई चीज हमसे छूट रहा है या छूट गया है या छूट जाएगा। विलगाव का भय हमें दुखी करता है। अर्जुन को भी इसी से दुख है। लेकिन श्रीकृष्ण का कथन है कि हम जिसे विलगाव होना समझ रहें हैं वो दरअसल विलगाव है ही नहीं। निरन्तरता ही सत्य है भले स्वरूप भिन्न हो। हम स्वरूप को ही प्राथमिक समझते हैं , हमें लगता है कि जिसका आकार है, जिसमें स्पंदन है, जिसमें निर्णय लेने की क्षमता है वही मात्र जीवन की पहचान है।  हमारा ज्ञान इतना भर ही है कि शरीर की समाप्ति के साथ जीव का अस्तित्व ...

SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 11

गीता अध्याय 2 श्लोक 11 ------------------------------------      ( सांख्ययोग का विषय )  श्री भगवानुवाच  अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।  गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥ श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते  ॥11॥ शोकाकुल अर्जुन के दिलोदिमाग पर श्रीकृष्ण की पहली हीं पंक्तियाँ बहुत कड़ी पड़ती है। शब्दों के विन्यास से लगता है कि एक तरह की झिड़की मिलती है अर्जुन को कि वह वैसे लोगों के लिए दुखी हो रहा है जिनके लिए दुखी होने की कोई जरूरत नहीं है। फिर एक बार और कड़े शब्द उसे सुनने को मिलते हैं कि वह बातें तो ज्ञानी सा कर रहा है पर है नहीं ज्ञानी , क्योंकि ज्ञानी न तो मरने वाले के लिए दुखी होते हैं न ही जीने वाले के लिए।       इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण पहली ही पँक्ति में अर्जुन की समझ को साफ साफ नकार देते हैं। जीने और मरने वालों के लिए दुख व्यक...