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श्रीमद्भागवद गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण- अध्याय 2 भाग 3 -आत्मा से परिचय- श्लोक 16 से 30

श्रीमद्भागवद गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण- अध्याय 2 भाग 3 -आत्मा से परिचय- श्लोक 16 से 30

गीता अध्याय 2 श्लोक 16
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नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
 उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥

असत्‌ वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत्‌ का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है
 ॥16॥

     परिवर्तन के नियम को समझाने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि दो तरह की वस्तुएँ होती हैं-सत और असत यानी REAL और NOT REAL या UNREAL । श्रीकृष्ण के अनुसार ये तथ्य नया नहीं है बल्कि बहुत पहले से उन लोगों के द्वारा कहे गये हैं जिनको सत्य का ज्ञान रहा। जिनको सत्य का ज्ञान होता है उनको तत्वदर्शी कहते हैं।
      सत, असत और तत्वदर्शी शब्दों के अर्थ आपस में जुड़े हुए हैं। इस निरन्तर परिवर्तनशील संसार में हर वो चीज जो निरन्तर परिवर्तनशील होती है वही असत है। परिवर्तनशील वस्तुओं की खाशियत है कि वे सिर्फ वर्तमान में होते हैं, अतीत में और भविष्य में उनका कोई वजूद नहीं होता है। अर्थात अस्थाई ही असत है। लेकिन इस असत का अनुभव तो होता ही है न। आखिर इस तथ्य का कैसे उद्घाटन हो पाता है । परिवर्तनशीलता को समझने के लिए जिसकी आवश्यकता है वही सत है, अर्थात सत हो है जिसका किसी काल में नाश नही होता, जो परिवर्तन के नियम से परे होता है। इसी सत की अनुभूति से असत का ज्ञान हो पाता है। जीवन बाल्यकाल, युवा अवस्था और वृद्धावस्था के अनुभवों का संकलन होता है जो निरन्तर बदलते रहते हैं। इस अनुभव को दो तरह से जीने की विधि होती है। एक है इस परिवर्तन को बिना समझे परिवर्तन को वास्तविकता मान कर जीते जाना जिसमें हम असत को ही जीते जाते हैं। हर परिवर्तन से , उसके अच्छे बुरे प्रभावों से प्रभावित होते कभी सुखी, कभी दुखी होते रहते हैं। इस अवस्था में सत का ज्ञान नहीं होता। दूसरा तरीका है जीवन में घट रहे परिवर्तन को देखते समझते , इन परिवर्तनों के प्रभाव से अलग रहते जीना। इस अवस्था में हमको पता होता है कि जो घट रहा है वह तो मात्र परिवर्तन है। उससे भला क्यों प्रभावित होंना। ये परिवर्तित स्वरूप आज कुछ और है, कल परिवर्तन के कारण कुछ और हो जाएगा और पहले भी कुछ और ही था। इस क्षमता को ही सत कहते हैं। यही हमारा आपका सबका सत है जो हमें परिवर्तनों से परिचित कराता है। ये सत ही आत्मबोध यानी हमारा SELF है। अपने SELF यानी अपने आत्मबोध से परिचित इंसान जीवन को, परिवर्तनों को उनसे विलग रहकर जीता है, उनके साथ रहकर भी उनसे लिप्त नहीं होता है। परिवर्तन यानी असत आते हैं जाते हैं वो हर स्थिति में अपने आत्मबोध से इनको देखता तो है लेकिन अपने आत्मबोध के कारण इनसे अप्रभावित ही रहता है। यानी ऐसा इंसान परिवर्तनों के साथ जीता तो है लेकिन परिवर्तन से विलग अपने स्व यानी अपने आत्मबोध यानी अपने सेल्फ में रहते हुए इन परिवर्तनों के प्रभाव से मुक्त होता है। जो सत और असत के इस भेद को जानता समझता है वही तत्वदर्शी होता है, क्योकि वह मूल तत्व को समझता है।
      सत और असत के इस द्वैत यानी DUALITY की समझ ही हमें अपने सत की खोज में बढ़ने के लिए प्रेरित भी करता है।
     इस DUALITY यानी द्वैत की समझ से जीवन के कठिन प्रश्नों का समाधान निकल आता है। जब हम समझने लगते हैं कि परिवर्तन अस्थाई है ,इसके प्रभाव भी अस्थाई ही हैं तो फिर इनके परिवर्तन से सूखी या दुखी नहीं होते। समभाव में स्थित रहकर ही अपना आचरण निर्धारित करते हैं।
        इस सत-असत की समझ से उत्पन्न समभाव के कारण इंसान अपने वास्तविक रूप में आता है जिसके कारण उसे ज्ञात होता है कि उसमें असीम सम्भावनाएँ हैं जिनके कारण वह उन्नति के अंतिम शिखर , अर्थात जिसके बाद कोई शिखर नहीं होता वँहा तक जा सकता है।
       परिवर्तन से अप्रभावित होने का अर्थ आप निष्क्रियता मत निकालें । इस शिक्षा को नहीं समझ पाने का ये खतरा तो है कि हम समझने लगे कि संसार तो निरन्तर परिवर्तनशील है तो फिर इस संसार में घटित घटनाक्रम से हमें क्या लेना देना, हम तो इनसे अप्रभावित रहकर बुद्ध हो गए हैं। इसी भ्रम को मिटाने के लिए श्रीकृष्ण आगे चलकर कर्मयोग का सिद्धांत समझाते हैं। बिना कर्म में प्रवृत्त हुए सत असत के सिद्धांत को आत्मसात करना असम्भव है और विनाशकारी भी। 
     अब आगे देखेंगे कि सत क्या है और सत को प्राप्त करने का कर्मयोग का सिद्धांत क्या है। ये शिक्षा क्रमिक है, , एक एक कर हम सीखते है, बढ़ते हैं। परिवर्तन के नियम को जानने समझने के बाद हम सत यानी आत्मा के ज्ञान की तरफ बढ़ते हैं और फिर तब कर्मयोग की तरफ।

गीता अध्याय 2 श्लोक 17
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अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌।
 विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥

नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्‌- दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है
 ॥17॥
अनश्वरता और अवश्यम्भावी  परिवर्तन के सिद्धान्त से जो मूल बात निकल कर सामने आती है वो है इस निरन्तर परिवर्तनशील संसार में कुछ ऐसा भी है जो निरन्तर अपरिवर्तनशील है, सनातन अनश्वर है। यँहा एक बा त बात बहुत मायने रखती है। हम ऊर्जा को देख नहीं सकते, लेकिन ऊर्जा व्याप्त है। ऊर्जा का मेनिफेस्टेशन हम देखते हैं, जैसे अग्नि, विधुत, गति, प्रकाश , स्थिरता आदि। इसे हम जानते भले न हो लेकिन मानते जरूर हैं।  दुनिया के बहुतेरे बातों को जिनको हम समझ नहीं पाते मानते हैं, फिर जैसे जैसे हमारे वैज्ञानिक ज्ञान का स्तर बढ़ता है हम धीरे धीरे गलत से सही को जानने लगते हैं। विज्ञान वह विशेष ज्ञान है जिसके पीछे अकाट्य तर्क होता है, सार्वभौमिक प्रमाण होता है। यह ज्ञान स्वयम में निरन्तरता लिए हुए होता है। इसकी खोज का जो प्रमाणिक तरीका है उसके अनुसार सबसे पहले हम अपने अनुभव से, उस अनुभव से जिसमें निरन्तरता होती है उससे एक परिकल्पना यानी HYPOTHESIS गढ़ते हैं।।तत्पश्चात उस परिकल्पना के आधार पर प्रयोग करते हैं । यह प्रयोग हमेशा प्रयोगशालों के नियंत्रित वातावरण में ही हो जरूरी नहीं। कई बार हमारी प्रयोगशाला हमारा मस्तिष्क ही होता है। हम तरह तरह की गणनाएँ उपयोग में लाते हैं, फिर हिट ऐंड ट्रायल के तरीके से हम उन गणनाओं को व्यवस्थित कर एक अंतिम गणितीय सिद्धान्त गढ़ते हैं । तत्पश्चात अलग अलग समय काल और स्थान में उसका उपयोग कर ये देखते हैं कि क्या हमारी गणना का परिणाम हर समय काल और स्थान में एक ही है। यदि ऐसा है तो फिर हम एक सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं जो हर समय काल स्थान में एक समान होता है। यही प्रक्रिया प्रयोगशालाओं के नियंत्रित वातावरण में भी की जाती है, जिनमें हो सकता है कि गणना के अतिरिक्त या उसके बिना सिर्फ पदार्थ का उपयोग किया जाता हो। उसके सर्वव्यापी परिणाम को ही मान्यता दी जाती है। इन प्रक्रियाओं में कुछ तथ्य समान हैं
1.सर्वप्रथम एक परिकल्पना की आवश्यकता होती है जो संसार के निरन्तर पर्यवेक्षण से सम्भव होता है।
2.प्रयोग की विधि निर्धारित होती है।
3.परिणाम सर्वकालिक होता है अर्थात स्थाई होता है निरन्तर परिवर्तित नहीं होता।
             ज्ञान प्राप्ति की इसी विधा को जिसमें परिकल्पना, प्रयोग, परिणाम और सर्वकालिकता हो उसे ही विज्ञान कहा जाता है। इसके परिणाम में स्थाई सत्य को प्राप्त किया जाता है जो निरन्तर परिवर्तनीय नही होता बल्कि हमेशा एक ही रहता है।
    अब ठीक यही बात जीवन विज्ञान को समझने के लिए भी अपनाई जाती रही है। श्रीकृष्ण ने इसी वैज्ञानिकता का सहारा लिया है अर्जुन को समझाने के लिए। सर्वप्रथम उन्होंने अर्जुन को संसार का पर्यवेक्षण करने के लिए प्रेरित किया यानी उसे ये देखने के लिए प्रेरित किया कि वह स्वयम देखे कि संसार कैसे चलता है। हमने देखा कि पूरा संसार गीता की भाषा में सत और असत में बंटा है। असत यानी जो निरन्तर परिवर्तनीय है। इस असत को हम तब देखने में सक्षम होते हैं जब सत को समझते हैं यानी ये समझते हैं कि कुछ ऐसा है जो परिवर्तित नही होता, जो स्वरूप नहीं बदलता, जो अनश्वर होता है। इसे ऐसे समझे। कोई वस्तु गति में है ये तभी समझा जा सकता है जब हम गतिहीन यानी स्थिर होते हैं। 
       अब दूसरे स्तर पर हम ये समझते हैं कि इस सम्पूर्ण चलायमान संसार को चलायमान रखने के लिए कोई एक सत्ता तो होगी जो उनकी गति और परिवर्तन का कारण होगी। यही सत्ता सर्व्यापी और सर्वकालिक होती है। अभी आपको ये बात कल्पना लग सकती है, लेकिन लक्षित ज्ञान को जानने समझने के लिए इस कल्पना पर परिकल्पना की तरह आपको भरोसा करना होगा।भरोसा होगा तो आप अन्वेषण के लिए बढ़ेंगे और सत्य को पाएंगे। नही। भरोसा करेंगे तो इस परिकल्पना को कोरी कल्पना मानकर छोड़ देंगे और सत्य का अन्वेषण अधूरा छूट जाएगा, आप कँही नही। पहुंचेंगे। जीवन भर भटकते रह जायेगे।  यदि आप इस परिकल्पना पर भरोसा करते हैं तो आप ये देखने में सक्षम होंगे कि इस सर्वकालिक सर्वव्यापी सत्ता ही है जिसके कारण आप खुद को और खुद के बाहर के परिवर्तन को देख समझ पाते हैं। आप इस सत्ता की समझ के कारण सर्वाधिक ऊर्जा संग्रहण के स्थिर अवस्था में आ जाते हैं, परिवर्तन के प्रभाव से एकदम मुक्त। यही तो परम् वैज्ञानिकता है और गीता की भाषा में परम् योग की अवस्था भी।
          इस परम् सत्ता को जो पूर्णतः अनश्वर, अविनाशी, अव्यय(जिसका व्यय नहीं होता हो) होती है यही हमारे अंदर से हमारे परिवर्तनशील बुद्धि और भावना को निकालकर हमारे आत्मबोध यानी SELF को बाहर लाता है। यही वह सेल्फ है जो अपरिवर्तनीय अनश्वर अविनाशी है और जो सभी में समान रूप से मौजूद है। यह आत्मा उस परमसत्ता का ही स्वरूप है जिसे आप ब्रह्म, परमब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर, भगवान या फिर अपने धार्मिक-सम्प्रदाय के मतानुसार और भाषानुसार अलग अलग नामों से सम्बोधित करते है और यही सता सब में व्याप्त होकर सभी परिवर्तनों को नियंत्रित करता है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 18
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अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
 अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥

इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर
 ॥18॥
आत्मा से परिचय  कराने के पश्चात श्रीकृष्ण एक बार फिर से सत की तरफ लौटकर समझाते हैं कि सत यानी आत्मा का नाश नहीं होता है, न ही इसका परिवर्तन होता है और न ही ये जानने में आता है। इस बात को समझने में थोड़ी सावधानी बरतनी होगी। आत्मा अनश्वर और अपरिवर्तनीय है ये तो हम हमझे हैं लेकिन ये अप्रमेय है इसे कैसे समझे। अप्रमेय यानी जिसका प्रमाण नहीं होता अर्थात जिसे प्रमाण के द्वारा नहीं जाना जा सकता। तो क्या आत्मा का ज्ञान होना असम्भव है?  
     श्रीकृष्ण की इस शिक्षा को समझने के लिए ये जरूरी है कि पहले हम ये तो समझे कि हमें ज्ञान मिलता कैसे है। ज्ञान प्राप्त करने का हमारा सबसे महत्वपूर्ण साधन हमारी इन्द्रियाँ यानी सेंसेज हैं। बाहरी जानकारी इन्द्रियों के माध्यम से ही हमें प्राप्त होती है। इसके माध्यम निम्न हैं---
1.प्रत्यक्ष प्रमाण, जिसे हम सीधे अपनी इन्द्रियों से ग्रहण करते हैं। (डायरेक्ट इनफार्मेशन)
2.अनुमान, किसी एक चीज के आधार पर हम दूसरी चीज के बारे में परिणाम निकालते हैं यानी 
उपलब्‍ध सूचना के आधार पर कोई राय बनाते हैं  या सत्‍यता का निर्णय करते हैं, से (इनफरेंस)
3.तुलना, दो चीजों की तुलना कर जानकारी इकट्ठा करते हैं(कंपेरिजन)
4.कारण-परिणाम, परिणाम का अध्ययन कर कारण जानने की प्रक्रिया (कॉज-इफ़ेक्ट रिलेशन)
5. अनुपलब्धि, किसी चीज के नही होने का तथ्य जानकर समझना कि वो चीज नहीं है या नहीं होती है(अनवैलबिलिटी)
6.शब्द प्रमाण, स्थापित/विद्वान गुरु के द्वारा कही बात को सही मानकर(वर्ड्स ऑफ ए रियलआइज़्ड मास्टर)
     ये सभी माध्यम इन्द्रियों पर निर्भर करते हैं लेकिन इनमें से किसी से भी आत्मा यानी सत यानी सेल्फ का ज्ञान नहीं मिलता है। चूंकि आत्मा/सत/सेल्फ  की जानकरी इन्द्रियों से नहीं मिलती सो श्रीकृष्ण इसे अप्रमेय यानी प्रमाण से परे मानते हैं। 
         तब हम सेल्फ यानी आत्मा को कैसे जानते हैं? दरअसल उपरोक्त सभी प्रकार के माध्यमों से आत्मा/सेल्फ का ज्ञान भले न मिलता हो , होता ये है कि हमारे सेल्फ के ऊपर अज्ञान की जो परत पड़ी होती है वो एक एक कर साफ होती जाती है। इससे अंततः हम ये समझ पाते हैं कि हमारी आत्मा /हमारा सेल्फ वास्तव में क्या है। अर्थात अज्ञान का सम्पूर्ण नाश ही आत्मबोध/आत्मज्ञान/आत्मा का ज्ञान/सेल्फ का ज्ञान देता है। दरअसल ज्ञान प्रकाश है जो अंधकार और उससे पैदा हुए भ्रम को समाप्त कर वास्तविकता को सामने ला देता है। यदि आप कँही जा रहें है या स्थिर बैठे हैं और घोर अंधकार है। आपको लगता है कि सड़क पर कुछ परा  हुआ है। आपको लगता है कि अरे ये लम्बी सी चीज तो साँप प्रतीत होता है । आप डर कर पीछे हट जातें हैं और टार्च की रोशनी करते हैं । तब आप पाते हैं कि अरे जिसे मैं साँप समझ रहा था वो तो रस्सी है। दरअसल प्रारम्भ से ही वँहा रस्सी ही है। ये तो अँधकार और उससे उपजा भ्रम था जिसके कारण हम उसे साँप समझ रहे थे। रौशनी होते अँधकार छंटता है यानी भ्रम खत्म होता है और तब आप वास्तविकता देख पाते हैं। ज्ञान ने साँप को रस्सी नहीं बना दिया, बल्कि ज्ञान ने अंधकार और भ्रम को हटा दिया जिससे हम वास्तविकता को जान पाए। इसीप्रकार ज्ञान जब हमारे सारे भ्रमों को मार देता है तब हमको पता चलता है कि हमारा सेल्फ/आत्मबोध/आत्मा क्या है। ज्ञान आत्मा को बनाता नहीं है, उससे परिचय कराता है।
    अब ये समझना भी जरूरी है कि आत्मा का निवास कँहा है। दरअसल आत्मा शरीर को धारण करती है। अविनाशी , अपरिवर्तनीय आत्मा का निवास देह है अर्थात इस परिवर्तनीय नाशवान  शरीर का अस्तित्व तभी तक है जब तक इसमें अनश्वर अपरिवर्तनीय आत्मा है अन्यथा इसका कोई अस्तित्व नहीं है। 
इतनी शिक्षा देने के पश्चात श्रीकृष्ण अर्जुन का आह्वाहन करते हैं कि इन्ही कारणों से तुम युद्ध करो। तो क्या श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए उकसा रहें हैं। जी नहीं। बल्कि वे तो ये कह रहे हैं कि जब तुमको ये बात समझ में आ गई कि आज्ञान का नाश ही सत्य को उद्घाटित करता है, आत्मा से परिचय कराता है सेल्फ यानी आत्मबोध को प्रत्यक्ष करता है तो फिर आज्ञान को हराना ही होगा, उससे युद्ध  करके असत के भ्रम को समाप्त तो करना ही होगा। यही युद्ध है जो आज्ञान को पराजित करने के लिए है, सत को उद्घाटित करने के लिए है। ये युद्ध क्या है, इसकी प्रकृति क्या है, ये होता कैसा है, परिणाम में क्या होता है इसे श्रीकृष्ण आगे स्पष्ट करते हैं।
इस प्रकार हम देख रहें हैं कि कैसे आज्ञान के कारण हम अपने कर्तव्य से भागते हैं और आज्ञान वश ही इसी अकर्मण्यता को महान बताने का उपक्रम करते रहते हैं। लेकिन हम तब तक अपनी अकर्मण्यता को और अपने कुतर्कों को नहीं समझ पाते जब तक हम अपने आत्मबोध से दूर होते हैं। "हम हैं" ये तो प्रमाणित है लेकिन "हम क्या है" ये अभी जानते हैं जब हमें अपनी आत्मा का बोध होता है, सेल्फ से परिचित होते हैं, और तभी हमको अपने कर्तव्यों की सही जानकारी भी मिल पाती है।
      गीता अध्याय 2 श्लोक 19
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य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌।
 उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥

जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है
 ॥19॥
एक बार पुनः श्रीकृष्ण स्पष्ट करते है कि आत्मा अनश्वर और अविनाशी है। यह न मारता है न मरता है। इससे स्पष्ट होता है कि आत्मा वास्तव में  किसी भी तरह के कृत्य से मुक्त होता है। हम आप जो भी करते हैं उसमें हमारे आपके विशुद्ध स्वरूप यानी हमारे आत्मस्वरूप यानी सेल्फ का कोई योगदान नहीं होता। हम जो भी करते हैं उसकी जबाबदेही हमारे ईगो पर होती है जो हमारी शारीरिक, मानसिक/भवानात्मक और बौद्धिक गुणों का मिश्रण होता है। हम आगे चलकर पाएंगे कि हमारे कृत्य हमारे गुणों पर निर्भर करते हैं । लेकिन फिलहाल इस श्लोक से स्पष्ट है कि वस्तुतः आत्मा  न तो कर्ता है न कारक। साथ ही स्पष्ट होता है जीवन समाप्त होता है न कि जीवन का सेल्फ। 
      हमारा अस्तित्व हमारा शरीर नहीं होता। पूर्व में ही स्पष्ट हो चुका है कि भौतिक स्वरूप का परिवर्तन अवश्यम्भावी है लेकिन सेल्फ में, आत्मस्वरूप में यानी आत्मा में कोई परिवर्तन नहीं होता। यह जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त होता है। तो फिर किसी की मृत्यु या जन्म के लिए आत्मस्वरूप को कर्ता नहीं ठहराया जा सकता।
आत्मा की उपस्थिति में ही सारी क्रियाएँ होती हैं लेकिन आपका सेल्फ/आपकी आत्मा उसमें लिप्त नहीं होती।  इसे महसूस करने,  समझने के लिए जरूरी है कि हम अपनी आत्मा के ऊपर चढ़े आवरण को एक एक कर हटाएँ। ये कैसे कर सकते हैं इसे आगे समझेंगे। अभी तो इतना ही समझें कि जब श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने का आवाह्न करते हैं तो ये भी समझा देते हैं कि आत्मा का न तो आदि है न अंत, कोई स्वरूप परिवर्तन नहीं है। न ही आत्मा कुछ कर रहा होता है न इसपर कुछ हो रहा होता है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 20
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न जायते म्रियते वा कदाचि-
 न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
 अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-
 न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता
 ॥20॥
   श्रीकृष्ण एक बार फिर से अपनी बात दुहराते हैं। हम जानते हैं कि यदि कोई बात बहुत जरूरी होती है या फिर जिस बात को समझना थोड़ा मुश्किल होता है तो वक्ता उस बात को बार बार कहता है ताकि श्रोता उस बात को और उसके अर्थ एवम महत्व को समझ सके।  आत्मा जन्म मृत्यु से परे है। यह पुरातन  है अर्थात अत्यंत पुराने काल से वर्तमान तक अपरिवर्तनीय ही बना हुआ है जो शरीरों के जन्म मृत्यु से अछूता रहता है। साथ ही आत्मा सनातन भी है, न आदि है न अंत है। अर्जुन जिस सनातन धर्म की बात कह रहा था पूर्व में उससे यह विचार एकदम भिन्न है। वस्तुतः अर्जुन द्वारा जिसे सनातन धर्म कहा जा रहा था वह तो मनुष्य की मृत्यु के साथ छिन्न भिन्न हो जाने वाला था। ऐसी आशंका तो अर्जुन के द्वारा स्वयम व्यक्त की जा रही थी।  उसका सनातन धर्म तो कुलधर्म था। लेकिन यँहा तो  श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहें हैं कि सनातन तो आत्मा है,  देह कँहा से सनातन हो गया। 
   और यह आत्मा सब में समान है। इसका कोई रूप , रंग, आकार, नहीं , इसका कोई निश्चित देह नहीं, यह तो काल से परे है। तो ऐसी स्थिति में वो सभी सनातनी ही हैं तो आत्मा के अन्वेषण मड़इन लगे हैं। इसका सम्बन्ध हमारे जन्म और कुल से नहीं है। यह तो सभी में समान भाव से गुणों से मुक्त है। इसी से  वसुधैव कुटुम्बकम्  निकलता है। फिर अपना कौन पराया कौन। 
गीता अध्याय 2 श्लोक 21
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वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌।
 कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌॥

हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?
 ॥21॥
श्रीकृष्ण ने अबतक आत्मा की विशेषताओं को बताया है। अब वे आत्मा को जानने समझने वाले कि विशेषताओं की चर्चा करते हैं। हमने पहले ही देखा समझा है कि इस संसार में व्यक्ति के द्वारा जो जो कुछ भी किया जाता है वह इंसान के ईगो के द्वारा किया जाता है अर्थात जो कुछ इंसान के द्वारा किया जाता है वह सब उस इंसान के शारीरिक रूप, भावनात्मक स्थिति और बौद्धिक क्षमता के द्वारा किया जाता है और यही तीन किये गया कार्य का प्रभाव भी झेलते हैं या उसका आनंद उठाते हैं। उसकी आत्मा यानी उसका स्व न तो कुछ करता है, न ही कुछ भी करवाता है। इंसान श्रीकृष्ण वर्णित तीन गुणों के अधीन रहकर कुछ न कुछ करते रहते हैं।। 
      जब आत्मा न कुछ करता है न कराता है तो फिर हम कैसे कहते हैं कि मैंने किया। मैं स्व को व्यक्त करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है लेकिन यँहा स्व ईगो के स्थान पर भ्रम वश समझ लिया जाता है।आत्मा न तो कर्ता है न भोक्ता है। आत्मा तो मात्र द्रष्टा है। निर्विकार भाव से चीजों को होते देखता है। स्व की उपस्थिति में हमारा ईगो कुछ न कुछ करते रहता है और प्रभावित होते रहता है। इसे एक छोटे उदाहरण से समझा जा सकता है। सूर्य के उदय के साथ रौशनी आने के साथ ही तरह तरह की गतिविधियाँ प्रारम्भ हो जाती हैं। तो क्या सूर्य इन गतिविधियों को करता है। ये आप भी जानते हैं कि नहीं। सूर्य को आपकी गतिविधि से कोई लेना देना नहीं है। सूर्य की अपनी गति है।  मात्र उसकी उपस्थिति में चीजें घटित होती हैं।  इसी प्रकार आत्मा न कर्त्ता है न भोक्ता है। ऐसी स्थिति में जिसे अपने स्व का ज्ञान है, जिसे आत्मा का ज्ञान है, जिसे आत्मबोध हो चुका है , इसे पता है कि उसका सेल्फ उसके ईगो से भिन्न अपरिवर्तनीय, अविकारी , अजन्मा, पुरातन और सनातन है। उसे यह भी ज्ञात है कि वह न तो कुछ करता है न भोगता है। बस वह तो द्रष्टा मात्र है। लेकिन इस स्थिति में पहुँचा कैसे जाता है ये अभी आगे स्पष्ट करेंगे श्रीकृष्ण।

गीता अध्याय 2 श्लोक 22
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वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
 नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
 तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
 न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है
 ॥22॥
     श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि शरीर और आत्मा का क्या सम्बन्ध होता है। पहले समझा चुके हैं कि आत्मा अजर, अजन्मा, अपरिवर्तनीय, सनातन, पुरातन है जबकि शरीर निरन्तर परिवर्तनीय है जो जन्म से लेकर मृत्यु तक नित्य परिवर्तित होता रहता है और कहते हैं कि मृत्यु भी मात्र एक परिवर्तन ही है क्योंकि अनश्वर आत्मा को जब प्रतीत होता है कि शरीर जीर्ण हो चुका है तो वह उस शरीर को त्याग कर अन्य नया शरीर धारण कर लेता है। शरीर का अंत हो जाता है लेकिन उस शरीर को धारण करने वाले आत्मा का नहीं। मृत्य अंत नहीं परिवर्तन मात्र है। तो क्या शरीर के अंत से हमारा नाश नहीं होता है?
    वस्तुतः आत्मा की यात्रा शरीर की मृत्यु से रुकती नहीं है। हम जो कुछ करते धरते हैं उनसे हमारे संस्कार संकलित होते जाते हैं। हम देख चुके हैं कि आत्मा न तो कुछ करता है न कराता है। मात्र उसकी उपस्तिति में हमारी भावनाएँ, और बौद्धिकता कुछ न कुछ करती कराती रहती हैं। इससे हमारे संस्कार संकलित होते जाते हैं। शरीरों का जीर्ण होने का तातपर्य शरीर का भौतिक दृष्टि से कमजोर या रुग्ण होने से नहीं है। 
        शरीर आत्मा के वस्त्र की तरह होता है। वस्त्र के पुराने पर जाने पर और विभिन्न अवसरों पर हम अपना वस्त्र बदलते हैं।  लेकिन वस्त्रों के बदलने से हम तो नहीं बदल जाते हैं। हम तो वही रहते हैं हमारा प्रस्तुतिकरण बदल जाता है, लेकिन वास्तविकता में हम वही रहते हैं। इसी प्रकार शरीर के बदलने से आत्मा की वास्तविकता में कोई परिवर्तन नहीं आता।
       अब देखिए कि वस्त्र बदलने पर क्या हमें पीड़ा का अनुभव होता है? यदि उस बदले जाने वाले वस्त्र से हम जुड़ाव महसूस करते हैं तो उसे छोड़ने या बदलने के समय हमें पीड़ा होती है। यदि जुड़ाव नहीं है तो कोई पीड़ा नहीं होती। यही हाल शरीर के परिवर्तन पर भी होता है। जिस शरीर से हम जितना जुड़े रहते हैं उसके मृत्यु या प्रस्थान पर हमें उतनी ही पीड़ा होती है। हमारे घर या इष्ट मित्र आदि के यँहा यदि किसी का देहावसान होता है तो हम कितने दुखी हो जाते हैं , लेकिन रास्ते पर ले जा रहे मृतकों को देख कर हम उन्हें मात्र नाश या शव मानकर नजरअंदाज कर देते हैं । उनसे हमें कोई पीड़ा नहीं होती क्योंकि उनसे हमारा कोई जुड़ाव नहीं होता है। लेकिन नय जन्म पर हम फिर उल्लासित भी होते हैं जैसे नय वस्त्र पाकर। लेकिन ध्यान रहे ये सब भावनात्मक क्रिया प्रतिक्रिया हमारी आत्मा के स्तर पर नहीं होता है बल्कि ये सब हमारे नश्वर इगो के स्तर पर होता है।
     तो प्रश्न उठता है कि आत्मा जीवन को कैसे चुनती है। हम देखते जानते हैं कि हर प्राणी का शरीर मैटर से बना होता है और ये मैटर भी सभी में समान ही होता है। एक प्रजाति में एक ही अनुपात में भी होता है। लेकिन मैटर तो निश्चेष्ट और प्राणविहीन होता है। यदि सभी कुछ समानुपातिक ढंग से उस रूप मरीन ढाल भी दिया जाए तो भी उसमें जीवन का संचार नहीं होता है । इस जीव के संचार को तभी सम्भव किया जा सकता है जब उसमें आत्मा का निवास हो, अन्यथा नहीं। आत्मा और स्थूल शरीर के मध्य सूक्ष्म शरीर होता है जो दिखता तो नहीं है लेकिन स्थूल शरीर को क्रियाशील रखता है। यह सूक्ष्म हमारी बौद्धिकता का परिणाम होता है। आत्मा से मैटर को जीवन मिलता है लेकिन आत्मा स्वयम मैटर नहीं होता है। आत्मा मैटर से भिन्न होता है। मैटर चारो तरफ होता है लेकिन सभी में जीवन नहीं होता है। मैटर जब आत्मा से मिलता है तभी उसमें जीव का प्रवाह हो पाता है। मृत्यु के पश्चात शरीर का अंत होता है, मैटर का नहीं, उसका स्वरूप परिवर्तन सम्भव है।  लेकिन जीवनपर्यंत संचित संस्कार कँही नहीं जाते। वे तो सूक्ष्म अवस्था में बने ही रहते हैं। हम देखते हैं कि एक अमरूद के फल में ढेरों बीज होते हैं। उन बीजों का रंग रूप स्वरूप अमरूद से तो नहीं मिलता लेकिन प्रतेक बीज में एक पेड़ को जन्मने की क्षमता होती है और उस पेड़ से फिर ढेर सारे अमरूद के जन्म लेने की। और पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे ही चलता है। साथ ही पेड़ के प्राकृतिक आवास के आबोहवा के अनुसार परिवर्तन भी संचित होते और स्थानांतरित होते जाते हैं। वैसे ही जैसे संस्कार संचित होते जाते हैं और मैटर का संयोग जब आत्मा से होता है तो वो संस्कार तो आगे जाते ही हैं वो उसी के अनुसार जीव में परिवर्तन भो करते जाते हैं।
  सनद रहे कि आत्मा का विस्तार समझने के लिए आकाश की तरह होता है जो शरीर के समाप्त होने से संकुचित नहीं होता है। उसके विस्तार पर कोई फर्क नहीं पड़ता। 
    इस प्रकार हम समझते हैं कि जब आत्मा एक शरीर को त्याग कर दूसरा शरीर धारण करती है तो वो उन संचित संस्कारों को भी अपने में समाहित कर लेती है।  और आपकी यात्रा उन संचित संस्कारों के आगे से शुरू होती है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 23 & 24
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नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता
 ॥23॥
 एव च।
 नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥

क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है
 ॥24
श्रीकृष्ण आत्मा की विशेषताओं को अर्जुन को समझा चुके हैं। एक बार फिर वे आत्मा की विशिष्टताओं को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि आत्मा प्रकृति से मुक्त है। प्रकृति का आत्मा पर कोई असर नहीं पड़ता है। सो प्रकृति की कोई भी शक्ति आत्मा को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं कर सकती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बार बार समझा चुके हैं कि आत्मा अजर, अनश्वर, अपरिवर्तनीय है । इसी तथ्य को श्रीकृष्ण और भी स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि प्रकृति आत्मा पर कुछ भी असर नहीं डाल पाती है क्योंकि आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है।
आत्मा पुरातन काल से है परन्तु हमेशा नूतन ही है। यह निरन्तर बना हुआ रहता है क्योंकि इसका कोई भूत या वर्तमान नहीं होता है। आत्मा समय से अप्रभावित होता है। समय का भान स्थान और  गति के कारण होता है। हमारी चिंतन प्रक्रिया चलायमान होती है। चिन्तनप्रक्रिया गतिमान होती है। ये एक सिरे से दूसरे सिरे की तरफ गतिशील होता है। स्थान के परिपेक्ष्य में गति समय का भान देती है। यदि गति न हो तो समय भी नहीं है। गति के अभाव में आत्मा हमेशा स्थिर और अचल है। इस कारण  आत्मा भूत और भविष्य से परे हमेशा वर्त्तमान में ही है। इस वजह से आत्मा नित्य है।
   अब इसे ऐसे समझ सकते हैं। श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि आत्मा का कोई स्वरूप नहीं होता, कोई आकार नहीं होता , उसका कोई भौतिक पिण्ड नही  होता। इस प्रकार आत्मा आकारविहीन और प्राकृतिक स्वरूप से मुक्त तो है ही वह प्रकृति की समस्त शक्तियों और उनके प्रभाव से भी परे है। जिसका कोई आकार नहीं, जो अपने स्वरूप के लिए प्रकृति पर निर्भर नही। जिसका कोई आकार नहीं उसकी कोई सीमा भी नहीं है। सो 
निश्चित ही वह आत्मा सर्वत्र है यानी सर्वायापी है। सीमाविहीन , आकार विहीन , सर्वव्यापी आत्मा किसी के अधीन नहीं , बल्कि सारी प्रकृति उसी के अधीन आ जाती है।
समय, काल, स्थान, गति और प्रकृति से मुक्त आत्मा अचल भी है अर्थात जिसमें कोई गति नहीं है। हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण ने आत्मा को समझाते हुए इसे स्थिर और अचल दोनों कहा है। आत्मा स्थिर है क्योंकि इसमें क्षैतिज गति नही है, यह स्थानांतरित नहीं होती एक स्थान से दूसरे स्थान तक। चूँकि आत्मा गति से मुक्त है सो ऊर्ध्व गति भी नहीं होती। इस कारण ऐसा नहीं होता है कि एक स्थान पर स्थिर आत्मा ऊपर की तरफ चलायमान हो अर्थात आत्मा क्षैतिज गति के साथ साथ ऊर्ध्व गति से भी मुक्त होती है, किसी भी दिशा में नहीं चलती यानी अचल है।
 आत्मा सनातन भी है। जैसा कि पहले कहा गया है कि आत्मा पुरातन तो है लेकिन समय की अवधारणा से मुक्त होने के कारण हमेशा नूतन भी है , नित्य भी है सो यह शाश्वत सनातन है।
       इस प्रकार हम देखते हैं कि आत्मा प्रकृति के समस्त गुणों से इतर है, यह प्रकृति की सत्ता से बाहर नित्य, शाश्वत, अपरवर्तनिय, अविकारी और सर्वव्याप्त होकर हर स्थान, काल और प्राणी में है। चूँकि यह स्वरूप विहीन, अपरिवर्तनीय, अविकारी, शाश्वत और सनातन है , सर्वव्यापी है सो यह सभी में समान भी है।

गीता अध्याय 2 श्लोक 25
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अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
 तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥॥

यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे शोक करना उचित नहीं है
 ॥25
अर्जुन को शोक नहीं करने के कारणों को समझाने के क्रम में श्रीकृष्ण उसे आत्मा से सम्बंधित शिक्षा दे रहें हैं। उन्होंने आत्मा की सभी विशिष्टताओं को अर्जुन के सामने रख दिया है। वे बार बार अर्जुन को बता चुके हैं कि आत्मा यानी हमारा स्व यानी सेल्फ ऐसा है जिसे इन्द्रियों /सेंसेज की मदद से नहीं जाना जा सकता है,(अव्यक्त)। 
इसके साथ ही आआत्मा सोचने समझने की परिधि से बाहर है। आकारविहीन, रंगविहीन, रूपविहीन प्रकृति के किसी भी प्रदर्शन से विहीन आआत्मा सोचने समझने से बाहर है(अचिन्त्य)। शब्द, तस्वीर आदि से इसे परिभाषित करना सम्भव नहीं है।
  इसके साथ ही आत्मा   यह जैसा है वैसा ही है अर्थात समय, काल और स्थान आदि से इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता(विकाररहित) है।
   आत्मा की विशेषताओं की व्याख्या से स्पष्ट है कि प्रत्येक जीव का शरीर आत्मा को धारण करता है लेकिन जीव के शरीर की समाप्ति से उसके आत्मा यानी स्व पर कोई भी फर्क नहीं पड़ता। वह जस का तस बना रहता है। 
  उपरोक्त कथनों से स्पष्ट है कि मृत्यु से व्यक्ति का सेल्फ(उसकी आत्मा) का नाश नहीं होता। बल्कि कहें तो मृत्यु के किसी भी प्रभाव से आत्मा अछूती रहती है। तो फिर किसी की मृत्यु का शोक कोई क्यों करे।

गीता अध्याय 2 श्लोक 26,27,28
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अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌।
 तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥

किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है
 ॥26॥

जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
 तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है
 ॥27॥

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
 अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?
 ॥28॥
 जीवन मूल्यों को देखने का दो दृष्टिकोण होता है। एक आध्यात्मिक जिसे हम अभी तक देखते आये हैं और दूसरा भौतिक। भौतिक दृष्टिकोण से प्रत्येक चीज, प्रत्येक जीवन मात्र पदार्थ(मैटर) और ऊर्जा से बना होता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार प्रत्यक्ष जानकारी ही अर्थात जिस जानकारी को हम इन्द्रियों यानी अपने सेंसेज से प्राप्त करते हैं वही अंतिम सत्य है और जो दिखता नहीं है उसकी कोई चर्चा नहीं होती। अतः इस दृष्टिकोण से आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है। भौतिकवादी दृष्टिकोण के अनुसार आत्मा आपका दृश्य स्व है जो सदा मरता और पैदा होता है। जीवन मृत्यु निरन्तर चलता  रहता है। जन्म लेने वाले कि मृत्यु निशिचित है। अगर इस दृष्टिकोण को भी सही मान लिया जाए तो भी जिसकी मृत्यु होती है उसके लिए किसी तरह का शोक अवांछनीय है क्योंकि ये तो एकदम स्वाभाविक है क्योंकि इसकी मृत्यु तो निश्चित है।
        तत्पश्चात श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जब जन्म लेने वाले की मृत्यु निशिचित है और मरने वाले का जन्म भी निश्चित है तो फिर ये परिवर्तन तो अपरिहार्य है, अटल है। जब ऐसा है तो फिर मरने पर शोक क्यों करना।
     ध्यान देने की बात है कि  आध्यात्म का दृष्टिकोण देह से परे आत्मा की सत्ता को मानता है और मानता है कि एक जन्म के संस्कार संचित होकर सूक्ष्म शरीर के माध्यम से दूसरे जीवन में प्रवेश करता है और इस प्रकार जीव निरन्तर विकास की अवस्था प्राप्त करता अंत में उस स्थिति तक पहुँचता है जँहा वह दृश्य संसार के परे की सत्ता का परिचय प्राप्त कर उसी में विलीन हो जाता है और शरीर की यात्रा का अंत हो जाता है।            इस प्रकार अध्यात्म आत्मा से इतर उन सब को जो प्रकृति से हैं को सदा परिवर्तनीय मानता है और एकमात्र आत्मा ही अपरिवर्तनीय होती है सो मृत्यु शरीर का होता है, स्वरूप का होता है आत्मा का नहीं और संस्कार एक जन्म से दूसरे जन्म में स्थानांतरित होते रहते हैं सो स्व का कभी नाश नहीं होता जब तक वह ब्रह्म में विलीन नहीं होता। इस प्रकार जीव की आत्मा कभी मरती नहीं। दूसरी तरफ भौतिकवाद भी जीवन मृत्यु को एक श्रृंखला में मानता है और मानता है कि जो जन्म लिया है उसकी मृत्यु तय है ओर मृत्यु के बाद फिर जीवन का प्रादुर्भाव होता है। इस प्रकार दोनों ही दृष्टिकोण से शरीर की मृत्यु तो अवश्यम्भावी है सो इस विषय पर शोक क्यों करें भला। शोक करने से निश्चित घटना नहीं टलने वाली है। तो फिर शोक करने से शोक बढ़ेगा ही शोक का कारण मृत्यु नहीं टलेगी। इस स्थिति में शोक करना अर्थहीन है।
    इसी को और स्पष्ट करते हुए श्रीकृष्ण पुनः समझाते हैं कि जन्म लेने और मृत्यु के पश्चात सभी अव्यक्त होते हैं , दिखते नहीं हैं, उनकी उपस्तिति नहीं होती। सिर्फ जन्म से मृत्यु तक के बीच में ही जीव व्यक्त रहता है, और अपने व्यक्तित्व यानी इगो के अनुसार जीवन जीता है। उस जीव के जन्म लेने के पूर्व भी और मृत्यु के पश्चात भी जीवन चलता रहता है। सभी अलग अलग समय पर जन्म लेते हैं , अलग अलग समय पर मृत्यु को प्राप्त होते हैं, परन्तु समय का प्रवाह उनके जन्म के पूर्व भी रहता है और मृत्यु के बाद भी। जीवन काल का समय इसके अनुपात में अत्यल्प ही होता है और यही सत्य भी है।

गीता अध्याय 2 श्लोक 29 & 30
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आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
 माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
 आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
 श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌॥

कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता
 ॥29॥

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
 तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥

हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य (जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है
 ॥30॥
इस प्रकार अर्जुन के विषाद को दूर करने हेतु श्रीकृष्ण ने उसे परिवर्तन के अपरिवर्तनीय सिद्धान्त, शरीर की नश्वरता और आत्मा/सेल्फ की शिक्षा दिया है और इस शिक्षा को पूरी करने के पश्चात अर्जुन को इस शिक्षा की गूढ़ता के सम्बंध में समझाते हैं कि आत्मा की शिक्षा सभी को नहीं मिल पाती। इसका कारण है कि हममें से अधिकांश लोग चाहे धर्म के रास्ते चलने वाले ही क्यों न  हों , आत्मा के अन्वेषण की बिधि नहीं समझ पाते सो इससे दूर ही रहते हैं और जो इस शिक्षा के सम्बंध में सुनते भी हैं वो सांसारिक मोह वश उस ज्ञान को नहीं समझ पाते जो उनके दृश्य इगो के परे होता है। इस कारण से सुनने वाला भी नहीं जान पाता। तब सवाल उठता है कि जानता कौन है। आत्मा यानी अपने सेल्फ जो सभी में समान रूप से एक ही होता है जो मोह को त्यागता है, भ्रम से बाहर निकल पाता है अर्थात जो अवश्यम्भावी परिवर्तन के अपरिवर्तनीय सिद्धान्त को समझ पाता है और ऐसा कोई व्यक्ति विरले ही मिलता है। इस स्तर पर पहुँचने का मार्ग ज्ञानयोग और कर्मयोग है जिसे श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं।
अंत में श्रीकृष्ण अर्जुन को स्मरण कराते हैं कि चूँकि सभी जीवों में अनश्वर, अविकारी आत्मा का वास है जो जीव की मृत्यु से अप्रभावित रहती है सो किसी की मृत्यु पर शोक करना व्यर्थ है।
    इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन के विषाद को दूर करने हेतु आत्मा से सम्बंधित शिक्षा को पूरी करते हैं।


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