गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 5
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गुरूनहत्वा हि महानुभावा-
ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुंजीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥
इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा
॥5॥
जब भी हम किसी कार्य को करने के लिए प्रवृत्त होते हैं तो उस कार्य करने का उद्देश्य हमारे मानस पटल पर स्पष्ट होना अति आवश्यक होता है अन्यथा हम विभन्न प्रकार के संशय के शिकार हो जाते हैं। यदि हमारे कार्य करने का उद्देश्य निजी और अल्पकालीन स्वार्थ होता है तो कार्य का परिणाम कुछ और निकलता है और यदि उसी कार्य का उद्देश्य व्यपक सामाजिक हित हो तो परिणाम एकदम भिन्न होता है। इसके साथ ही हमारे उद्देश्य की प्रकृति के कारण हमारे कार्य करने का उत्साह और तौर तरीके भी भिन्न हो जाते हैं। अर्जुन युद्ध में क्यों खड़ा है? क्या ये तथ्य अर्जुन को स्पष्ट है? यदि अर्जुन का उद्देश्य राज्य और राजपाट से मिलने वाले सुख भोग हैं तो बात और हो जाती है और यदि अर्जुन का उद्देश्य अन्याय, अनाचार, अत्याचार, असत्य का विरोध करना होता है तो दूसरी बात होती है। अर्जुन के तर्क को देखें तो पता चलता है कि उसे लगता है कि वह तो युद्ध में मात्र राजपाट और राजपाट से मिलने वाले सुख, और भोग के लिए आया है। अगर उद्देश्य ये सब हैं तो अर्जुन का तर्क कि भीष्म और द्रोण सरीखे महान गुरुओं की हत्या कर राजपाट लेने से ज्यादा अच्छा तो भीख माँगकर जीवनयापन करना है। लेकिन क्या कुरुक्षेत्र का मैदान मात्र आपसी वैर का हिसाब किताब करने के लिए सजा है? आखिर इतने बड़े युद्ध का उद्देष्य क्या है? यही प्रश्न जीवन में हर घड़ी हम सब के सामने है। हम क्यों कुछ कर रहें हैं? हम क्यों पढ़ाई कर रहें हैं, क्यों नौकरी व्यवसाय कर रहें हैं , क्या कँही हम नौकरी या व्यवसाय या पढ़ाई करते वक़्त निजी सफ़लता को ही अपने जीवन की सफलता असफलता का पैमाना मान रहें हैं या वृत्तर उद्देश्य के प्रति सजग भी हैं आदि आदि। इन्ही सब उद्देश्यों से हमारे आचरण की परीक्षा हर पल हो रही है। हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी गतिविधि में ये प्रश्न खड़ा है। अगर हमारी दृष्टि में व्यक्तिगत लाभ ही सब कुछ है , जीवन का सम्पूर्ण उद्देश्य है तो उद्देश्य के प्रति हमारा आचरण भिन्न हो जाता है और यदि उद्देश्य न्याय , सदाचार, सत्य जैसा बृहत्तर है तो आचरण भिन्न होता है। कार्य की महत्ता उसके उद्देश्य से निर्धारित होती है। अर्जुन अपने उद्देश्य के सम्बंध में भ्रमित है, हम सब भी अधिकांश समय अपने जीवन के उद्देश्यों के प्रति भ्रमित ही होते हैं। कौरव अपने उद्देश्य में निजी स्वार्थ को अधिक महत्व दे रहें है जबकि युद्ध शुरू होने के पूर्व तक पांडवों के लिए राज्य से अधिक न्याय और सत्य का महत्व अधिक था। इस दृष्टिकोण से जो कौरव पक्ष में है वह अन्याय और असत्य की रक्षा के लिए खड़ा है , फिर ये बात गौण हो जाती है कि कौन गुरु है कौन पितामह है। सभी असत्य के रक्षक ही तो हैं। ऐसी स्थिति में यदि अर्जुन को सत्य और न्याय की रक्षा करनी है तो उसे भीष्म और द्रोण से भी लड़ना ही होगा। भीष्म और द्रोण गुरु या पितामह की भूमिका में नहीं हैं। वे तो अन्याय और असत्य के रक्षक की भूमिका में हैं। लड़ाई भीष्म या द्रोण से नहीं है, उनकी प्रवृत्ति और उद्देश्य से है। हमारे जीवन में भी यही महत्वपूर्ण है कि हम किसके साथ खड़े हैं आसुरी प्रवृत्तियों के साथ या दैवी प्रवृत्तियों के साथ। जब हमको इसका ज्ञान हो जाता है तो फिर हम निर्णय भी सही ले पाते हैं। अन्यथा हमारा भी हाल भ्रम में फँसे अर्जुन जैसा ही होता है, माया मोह में लिपटा एक नपुंसक और क्षुद्र प्रवृत्ति वाला इंसान!