गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 6
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न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं
॥6॥
वस्तुस्थिति की स्वीकारोक्ति ही सत्य का मार्ग दिखाती है। हम सच को तब तक नहीं जान पाते जब तक अपने झूठ को नहीं पकड़ लेते। हम आप सही रास्ते पर तब बढ़ते हैं जब हमें पता हो कि दूसरा रास्ता गलत है। लेकिन इस स्थिति तक पहुँचने के ठीक पहले तक हमारे अंदर ये द्वंद्व तो रहता ही है कि न जाने कौन सा रास्ता सही है। अर्जुन तमाम तरह के तर्क देकर अब थका हुआ प्रतीत होता है। मन में उपजा भ्रम जब आपकी योग्यता पर और आपके तकनीकी ज्ञान पर हावी होता है तो आप अपनी योग्यता या ज्ञान के अनुसार निर्णय नहीं ले पाते, बल्कि भ्रम और मोह के अनुसार निर्णय लेते हैं और अनिर्णय की स्थिति में फँस जाते हैं। भ्रम से कार्य के परिणाम की चिंता होती है। जैसे ही आप हम परिणाम के प्रति जागरूक होते हैं, हमारी कार्य दक्षता गिरने लगती है। आप जब इस मनोस्थिति में आते हैं कि आपके फलाना काम का क्या पता क्या परिणाम निकलेगा, अच्छा होगा या बुरा तब आप उस काम को करने से हिचकिचाने लगते हैं। परिणाम की चिंता आपके ज्ञान और दक्षता पर हमेशा ही भारी पड़ जाती है। नतीजा में हम निष्क्रिय होने लगते हैं। क्रियाशीलता का स्थान कुतर्क ले लेता है। यही वह स्थिति होती है जँहा से हम दो में एक मार्ग चुन सकते हैं, भ्रम को सदा सदा के लिए मिटा भी सकते हैं और सदा सदा के लिए अपना भी सकते हैं।
अर्जुन अब स्पष्ट रूप से मानसिक द्वंद्व के इस चरम पर पहुँचता दिख रहा है। वो साफ साफ स्वीकार करता है की वो अनिश्चय और अनिर्णय की हालत में है, युद्ध करना या नहीं करना कौन सा मार्ग सही है उसके लिए वो नहीं समझ पा रहा है। अब तक तो वह युद्ध करने का ही विरोध कर रहा था। अब वह स्वीकार कर रहा है कि उसे नहीं पता कि युद्ध करना सही है कि नहीं करना सही है, क्योंकि परिणाम अनिश्चित है और मारना उनको है जिनके बिना(यानी भीष्म और द्रोण ) वह जीना भी नहीं चाहता। इससे स्पष्ट होता है कि
---अर्जुन युद्ध से अधिक युद्ध के परिणाम को लेकर चिंतित है और उसी सम्भावित परिणाम के अनुसार अपने कर्तव्य तय करना चाहता है,
--- वह युद्ध का उद्देश्य राज और सुख भोग की प्राप्ति समझ रहा है,
----सुख भोग और राज पाट के लिए बन्धु बांधवों को मारना उसकी नजर में गलत है,
-----इस प्रकार उसके मन में युद्ध को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियाँ हैं।
अब आप अपने जीवन में घट रही घटनाओं की समीक्षा कीजियेगा तो पाइए कि हम जीवन का अधिकांश समय अर्जुन की तरह ही उहापोह में गंवा देते हैं। दोस्त, सम्बन्धी के कुकर्मों को जानते हुए भी आँख बंद कर लेते हैं, उनका विरोध नहीं करते, जब कि कर्तव्य निर्वाहन का समय आता है नफा नुकसान का तराजू लेकर बैठ जाते हैं और भूल जाते हैं कि हमारे लिए क्या करना उचित है और अनुचित है। हम सब अर्जुन की तरह दिग्भ्रमित ही बने फिर रहें होते हैं जीवन भर।
लेकिन परिवर्तन का मार्ग तब खुलता है जब हमें आने भ्रमों की स्वीकारोक्ति होती है।