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SHRIMADBHAGWAT GEETA -CHAPTER 1 SHLOKA 14 TO 19

गीता अध्याय 1 श्लोक 14 से 19
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गीता में शब्दों का चयन परिस्थिति के हिसाब से किया गया है। शब्दों का प्रयोग कई विशेषताओं को व्यक्त करने के लिए किया गया है। प्रतेक विषय की अपनी एक खास तरह की शब्दावली होती है । यही बात गीता में भी है। गीताकार ने विशेष परिस्थिति को समझाने के लिए शब्द विशेष का उपयोग किया है और ये सबसे अधिक श्रीकृष्ण और अर्जुन के नामों के सम्बंध में दिखता है। अलग अलग समय पर इन महापुरुषों के अलग अलग गुणों को समझाने के लिए गीताकार ने इनके अलग अलग नाम बताए हैं जो समय विशेष के अनुसार एकदम सटीक बैठते हैं।
      जब अधर्म क्रियाशील हो ही जाता है, जब वो आपकी अच्छाइयों को मिटाना चाहता  है तब एक ही रास्ता बचता है और वो है अधर्म को समूल नष्ट करना। यही से युद्ध के प्रारम्भ का उद्घोष होता है। 
        भीष्म के सिंहनाद और शंख बजाने से कौरव पक्ष में उत्साह का संचार होता है, अधर्मी, अविवेकी, हिंसक, असत्य की रक्षा करने , माया मोह और अतृप्त रहने वाली इक्षाओं को संवारने वाली शक्तियाँ इकट्ठी होने लगती हैं। ऐसी स्थिति में जरूरी है कि इन आसुरी प्रवृत्तियों(दुर्गुणों) का नाश करने के लिए दैवी प्रवृत्तियाँ आगे आएं और इनका नाश करें।
     अब ध्यान दें।  आसुरी प्रवृत्तियाँ यानी दुर्गुणों को कौन नेतृत्व दे रहा है? भीष्म--यानी भ्रम, जिसे इक्षामृत्यु का वरदान है अर्थात अनंत इक्षाएँ जो भ्रम वश आपको आपके दुर्गुणों से बाँधती है वहीं आपके दुगुणों की नेता होती हैं। अब देखिए जब सद्गुण यानी दैवी गुण यानी सत्य, अहिंसा, विवेक, इत्यादि को पांडवों के पक्ष में कौन नियंत्रित कर रहा है? पहला शंख श्रीकृष्ण बजाते हैं। महाभारत के युद्ध में कृष्ण सारथी की भूमिका में हैं। सारथी आपके रथ को आपके गंतव्य तक ले जाने वाला होता है। वो आपके रथ, आपके घोड़ों, घोड़ों के लगाम को नियंत्रित कर आपको सही पथ पर से ले जाकर  आपके गन्तव्य तक पहुंचाता है। 
   ये एक ऐसा अंतर है जिसको समझना बहुत ही जरूरी है। तभी आप अपनी वृत्तियों को अपने विवेक के नियंत्रण में रख सकते हैं। 
        शरीर रथ है, इन्द्रियाँ इस शरीर को चलाने वाले घोड़े हैं
लगाम मन है और मन को नियंत्रित करने वाला सारथी आपका विवेक है, इन्द्रियों के अंग आपके रास्ते हैं और आत्मा रथी है।
विवेक से नियंत्रित मन इन्द्रियों को बहकने नहीं देता बल्कि उनको उनके प्रमाद के विषय से हटाकर सद्पथ पर ले जाता है। मन की भावनाएँ भ्रम से नियंत्रित हो ही नहीं सकती। भ्रम से तो क्रोध, वासना, ईक्षा , हिंसा आदि ही होंगे। विवेक हमारी प्रवृत्तियाँ को अच्छाई के रास्ते ले जाता है। कृष्ण इन्ही प्रवृत्तियों को सही रास्ते को दिखाने के लिए आगे बढ़कर नेतृत्व देते हैं।
      जब आपके अंदर दैवी गुण जग जाते हैं तब वे संगठित हो कर आपके अंदर की बुराइयों का प्रतिकार करने के लिए पूरे उत्साह से एकत्रित हो जाते हैं। यही कारण है कि श्रीकृष्ण के शंखनाद करते ही अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, सात्यकि, द्रुपद, शिखण्डी, धृष्टधूम्न, द्रौपदीपुत्र और सुभद्रापुत्र सभी शंखनाद करते हैं। विवेक के नेतृत्व में, विवेक के आह्वान पर हमारे अंदर की अच्छाई जाग उठती है, उनमें उत्साह भर जाता है और वे बुराइयों के खात्मे के लिए तैयार हो जाती हैं।
हमने पहले ही देखा है कि गीताकार ने शब्दों का चयन परिस्थितिविशेष को ध्यान में रखकर किया है। श्रीकृष्ण को माधव यानी लक्ष्मीपति और हृषिकेश यानी इन्द्रियों के स्वामी के नाम से सम्बोधित किया गया है। पहला नाम उनकी समृद्धि को दर्शाता है तो दूसरा उनके विवेकशीलता को। जो समृद्ध तो है लेकिन वो समृद्ध इसीलिए है क्योंकि उसे सपनी इन्द्रियों यानी अपनी प्रवृत्तियों पर पूरा नियंत्रण है। ऐसा ही व्यक्ति अच्छाई का नेता हो सकता है। अर्जुन को धनञ्जय नाम से सम्बोधित किया गया है। अर्जुन के पास भौतिक धन के अतिरिक्त दैवी, और आत्मिक धन भी है, वो विज्ञ है सो धनंजय यानी धन का स्वामी है। भीम जिनके कर्म भयानक हैं अर्थात जो बहुत बलशाली हैं वो वृकोदर हैं अर्थात  ऐसा व्यक्ति जिसकी पाचनशक्ति बहुत अच्छी हो। ये गम5 भीम की शक्ति को निरूपित करते हैं। युधिष्ठिर के लिए राजा और कुंतीपुत्र शब्द आये हैं। युधिष्ठिर इन्द्रपस्थ के तो राजा हैं ही साथ ही साथ सभी अच्छाइयों के स्वामी भी हैं।सो वो राजा हैं। वैसे तो सभी पांडव कुन्तीपुर हैं लेकिन युधिष्ठिर को माँ से विशेष लगाव है। वे कभी भी उनकी बात नहीं काटते, कोई तर्क नही करते माँ से, सो उनके लिए यँहा विशेष रूप से कुंतीपुत्र शब्द आया है। दौपदी के पाँच पुत्रों के लिए पृथ्वीपति यानी पृथ्वी पर राज करने वाले और सुभद्रापुत्र अभिमन्यु को महाबाहु यानी महाशक्तिशाली से सम्बोधित किया गया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि देवी सम्पद यानी सद्गुण कितने ताकतवर हैं।
     हम ये भी देखते हैं कि संजय ने अर्जुन के रथ की भव्यता, और महत्वपूर्ण वीरों के शंखों के नाम भी बताए हैं। 
संजय ने  विभिन्न विरो के शंखों के नाम भी कहे हैं जो निम्न प्रकार से हैं
     कृष्ण-पाञ्चजन्य
     अर्जुन-देवदत्त
     भीम-पौंड्र
     युधिष्ठिर--अनंतविजय
     नकुल---सुघोष
     सहदेव---मनीपुष्प
जब दैवी गुण संगठित होकर बुराइयों  का सामना करने के लिए एकजुट हो जाते है तो बुराइयों के अंदर भय का संचार हो जाता है। यही कारण है कि पांडव पक्ष का शंखनाद  जिससे धरती और आसमना भी गुंजायमान हो उठे कौरव पक्ष में डर भर गया।
इस विवरण के पीछे संजय की दो मंशा साफ है। एक तो हम सभी के अंदर अच्छी चीजों की प्रसंसा करने की ललक होती है। हम ऐसी चीजों को जो अच्छी होती हैं उनके बारे में खूब अच्छी अच्छी बातें करते हैं। संजय भी पांडवों से उनके गुणों के कारण प्रभावित है। सो उनके बारे में विस्तार से बताते हैं। दूसरे की सम्भवतः संजय के मन में अभी भी ये आशा बची है कि शायद पांडवों का वैभव जानकर धृतराष्ट्र शायद अब भी युद्ध रोक दें।
       इस विवरण से स्पष्ट है कि जब जब अधर्म, अत्याचार, अनाचार बढ़े और समझाने से भी अधर्मी न समझे और विनाश के लिए तत्पर रहे तब  हमें अपनी अच्छाई पर भरोसा कर पूरे उत्साह से और अपने विवेक के नियंत्रण में रहकर उसका नाश करने के लिए आगे आना चाहिए।

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