गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 8
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न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥
क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके
॥8॥
प्रश्न प्रस्तुत हो तो उत्तर की उत्कंठा होती ही है। हर सोचने समझने, अच्छा बुरा की परवाह करने वाले के लिए ये जानना अति महत्वपूर्ण होता है कि अच्छा क्या है जो उसे करना होगा। हर विचारवान इंसान बुरा या गलत काम करने से बचना चाहता है और इसी कारण उसे जब भी कोई कार्य करना होता है तो वह पहले सोचता है कि उस कार्य को करना चाहिए या नहीं, उसके मन में ये प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जो वह करना है कँही वो कार्य ही तो गलत नहीं है। सो वह उस कार्य के प्रति तरह तरह से खुद से पहले तर्क करता है। यदि सन्तोषजनक उत्तर उसे अपने अंदर से ही मिल गया तब तो ठीक है, वह उसी के अनुरूप आगे बढ़ता है, लेकिन यदि वह अपने ही उत्तर से संतुष्ट नहीं हो रहा होता है तो वह किसी ज्ञानी को खोजता है जिसे वह गुरु मानकर उससे निर्देश माँगता है। यह प्रक्रिया उसी के मन में होती है जो सही गलत की परवाह करता है। एक पेशवर हत्यारा सुपारी लेकर हत्या करते वक़्त हत्या के सही या गलत होने की परवाह नहीं करता। उसी प्रकार एक ऐसा विद्यार्थी जिसे विषय का ज्ञान नहीं वह उस विषय के प्रश्न से विचलित ही नही होता क्योंकि वह तो पढा ही नहीं है तो फिर कौन सा उत्तर सही होगा, कौन गलत उसे क्या पता, सो जो समझ में आता है उसे ही उत्तर में लिख देता है। एक जागरूक व्यवसायी या कृषक अपने हर कदम को परखता है तब आगे बढ़ता है। जब आपको एक महत्वपूर्ण पालिसी बनानी होती है तो आप उस ज्ञानी, जानकार विशेषज्ञ को खोजते हैं जिसे विषय के सैद्धान्तिक और प्रायौगिक ज्ञान हो। अब भला दुर्योधन को क्या दुविधा होनी है। वह तो सिर्फ एक ही काम जानता है कि छल से राज्य हड़पना है और यह नहीं हुआ तो मारकाट कर हड़पना है लेकिन अर्जुन को राज पाट से ज्यादा चिंता इस बात की है कि जिस विधि से राज पाट लेने के लिए या उसे बचाने के लिए वह युद्ध के मैदान में शस्त्रों को धारण कर के आया हुआ है क्या वो विधी जायज है , धर्म संगत है , सत्य के अनुरूप है अथवा नहीं। उसके लिए साध्य(END) से ज्यादा महत्व साधन(MEANS) का है। उसके अनुसार यदि साधन गलत है तो साध्य भी गलत है। सो वह साधन की शुचिता के बारे में चिंतित है, सो वह पहले तो खुद से , और श्रीकृष्ण को सुनाकर तर्क करता है , ताकि श्रीकृष्ण उसके मत का समर्थन कर दें। हर व्यक्ति यही चाहता है कि लोग बाग उसके ही तर्कों को सही मान लें। सो हर व्यक्ति अपने तर्कों को मित्रों आदि के समक्ष रखता ही है।लेकिन अपने सारे तर्कों से अर्जुन खुद को संतुष्ट नहीं कर पा रहा है तो भला श्रीकृष्ण को क्या संतुष्ट कर पायेगा बेचारा। वह खुद को खुद के तर्कों से संतुष्ट नहीं कर पाता है इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि अपने सारे तर्कों का प्रयोग कर के भी उसे शांति नहीं मिल पा रही है, वह उसी तरह से उद्विग्न है जैसे प्रारम्भ में प्रश्न रखने वक़्त था। यदि उत्तर मिल गया होता , यदि वह अपने उत्तर से अपने को संतुष्ट कर लिया होता तो श्रीकृष्ण की तरफ कभी नहीं देखता। घरबपरिवार, समाज, कार्यक्षेत्र में हम भी तो यही करते है, ऐसे हीं करते हैं। जब सही या गलत हम अपने तर्कों से खुद संतुष्ट होते हैं तब निर्णय लेते वक्त कँहा किसी की परवाह करते हैं। लेकिन जब साध्य से अधिक साधन के महत्व और उसकी शुचिता की चिंता करते हैं तो हम अपने निर्णय को साफ सुथरा, सत्यनिष्ठ, और धर्म आधारित रखना चाहते हैं। इसी सोच का परिणाम है कि अर्जुन के मन में राजपाट, यँहा तक की स्वर्ग का राज मिलने से भी प्रसन्नता नहीं मिल पाने की बात है। यदि साध्य अर्थात लक्ष्य राजपाट होता, यदि लक्ष्य सुख सुविधा को हासिल करना होता तो फिर अर्जुन के मन में कोई शंका नहीं होती, जैसे दुर्योधन को नहीं है। लेकिन एक विचारवान व्यक्ति होने के नाते अर्जुन को लगता है कि जब गलत साधन से राजपाट हासिल किया जाएगा तो फिर भला मन को शांति कँहा से मिलेगी। और जिस लक्ष्य को हासिल कर शांति नहीं मिल सकती उसे हासिल कर ही क्या मिल जाएगा भला। कोई भी वस्तु जो शांति नही दे पाती हो उससे सुख क्या मिलेगा और जिस कार्य स शांति नहीं मिलने वाला उसे वह क्यों करे भला। अर्जुन तय नहीं कर पा रहा है कि वो जो कह रहा है वह सही है भी या नहीं। सो उसकी बेचैनी यथावत बनी हुई है। वह अपने ही तर्कों से हारा हुआ महसूस कर रहा है तभी तो उसकी इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो रहीं है अर्थात उसके SENSES काम नहीं कर रहें हैं और वह अनिर्णय से ग्रस्त हो रहा है। अधूरा ज्ञान पूर्ण होने के लिए छटपटा रहा है ,उसे गुरु की तलाश है जो उसके अधूरे ज्ञान को पूर्णता दे सके।
हर समझदार को अपनी अज्ञानता की जानकारी होनी ही चाहिए। यदि हम खुद को ज्ञानी मानते हैं तो हमारा पहला फर्ज है कि हमें इसका भी ज्ञान हो कि हमारे ज्ञान की सीमा कँहा तक है और हमें गुरु की आवश्यकता कब होगी। हमें जानना चाहिए कि हम जो करने जा रहें हैं, कर रहें हैं क्या उस साधन की सत्यता और शुचिता प्रमाणित है कि नहीं। अगर नहीं जानते तो जानने के लिए किसी की शरण में जाना बुराई नहीं है। जाना ही होगा अन्यथा गलत निर्णय लिए जाने की आशंका बनी रहेगी। लक्ष्य वही सत्य है जिससे हमें आत्मिक शांति मिलती है। धन, सम्पदा शांति नहीं देते। वे शांति के अनिवार्य शर्त नहीं हो सकते यदि उनको पाने का रास्ता असत्य और अधर्म से होकर जाता हो तो । आप खुद देखिये , परखिये अपने जीवन में, समाज के अन्य भागों में कि क्या गलत ढंग से अर्जित सम्पति, मान सम्मान, पद पदवी , डिग्री आदि से आपको या अन्य किसी को शांति नसीब हो रहा है। ये कोई सैद्धान्तिक या कागजी सत्य नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है। आप खुद व्यवहार में देखें।